विश्लेषण: पानी के बाहर मछली की तरह छटपटाती वसुंधरा और वजूद ढूंढ़ते उनके खेमे के नेता!

रामगोपाल जाट

“मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है, हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी……”

ऊपर लिखी हुई कविता काफी पुरानी है, लेकिन आज भी हजारों-लाखों लोग ऐसे हैं जिनके ऊपर यह कविता सटीक बैठती है राजस्थान में भी एक दिग्गज नेता ऐसी ही हैं, जिनके ऊपर यह कविता आज काफी हद तक सूट कर रही है।

राजस्थान में तीन राज्यसभा सीटों के लिए 19 जून को मतदान होना है। उससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच लंबे समय से चल रही प्रतिस्पर्धा एक बार फिर से खुलकर सामने आ गई है।

हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप के बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अपनी सरकार डूबती हुई नजर आ रही है और इसके चलते उन्होंने आनन-फानन में राजस्थान की सीमाएं भी सील करवा दीं।

जबकि राजस्थान सरकार की प्रशासनिक असफलता की बानगी की यह है कि 1 घंटे के बाद दिखे राज्य सरकार को अपने आदेश को बदलना पड़ा और अपना बचाव करने के लिए उन्होंने आदेश को संशोधित करके निकाला।

कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी के चलते पिछले करीब ढाई महीने से राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश में राज्यों के द्वारा अपनी सीमाएं सील करने की गतिविधियां की गई है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि “राजनीतिक महामारी” के चलते एक राज्य को अपनी सीमाएं सील करनी पड़ीं।

इस सारी गतिविधि के बीच पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के द्वारा अचानक से अति सक्रिय होते हुए जिस तरह की गतिविधि की जा रही है, उससे स्पष्ट तौर पर ऊपर लिखी हुई कविता उनके ऊपर सटीक बैठती हुई नजर आ रही है।

केवल वसुंधरा राजे की नहीं, बल्कि उनके खास सिपहसालार रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ और पूर्व शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी समेत राज्यवर्धन सिंह राठौड़ भी काफी हद तक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि राजनीतिक तौर पर हमेशा सुर्खियों में रहने वाले राजेंद्र सिंह राठौड़ और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री तक पहुंचने वाले जयपुर ग्रामीण के सांसद राज्यवर्धन सिंह राठौड़ भी आजकल बिना पानी की मछली की तरह छटपटा रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले करीब 18 साल के दौरान हमेशा राजस्थान की सत्ता में या सत्ता के बाहर रहते हुए भी राजनीतिक में केंद्र में रहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इन दिनों केवल धौलपुर स्थित अपने महल या दिल्ली स्थित अपने निजी आवास तक सिमट कर रह गई हैं।

आमतौर पर देखा जाता है कि कोई भी राजनीतिज्ञ या तो सत्ता में रहते हुए खुश रहता है अथवा विपक्ष में रहते हुए भी सत्ता का सुख भोगने जैसी स्थिति में रहने का की आदी हो जाता है, वसुंधरा राजे भी इसी तरह के लोगों में से एक हैं।

18 साल में पहली बार सत्ता ही सुख से पूरी तरह से बाहर

यहां पर उल्लेख करने योग्य बात यह है कि 2003 में राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के तौर पर जब वसुंधरा राज्य को केंद्र से निकालकर राजस्थान में अध्यक्ष बनाकर स्थापित करने का कार्य किया गया था, तब से लेकर अब तक किसी भी तरह से वसुंधरा राजे राजस्थान की सत्ता के केंद्र में रही हैं।

माना जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान में भाजपा के कद्दावर नेता भैरोंसिंह शेखावत के द्वारा रिकमेंडेशन किए जाने के बाद वसुंधरा राजे को ही राजस्थान में पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर नामित किया गया था।

हालांकि बाद में वसुंधरा राजे के तीखे तेवर देखकर उपराष्ट्रपति बने भैरों सिंह शेखावत ने इसको अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल भी कहा था।

2003 में दिलाई थी पूर्ण बहुमत वाली पहली सरकार

वसुंधरा राजे को राजस्थान में अध्यक्ष बनाकर भेजा गया। उन्होंने राज्य में राजनीति की यात्रा की, जिसके बाद लोगों को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कुशासन से मुक्ति मिलने के तौर पर स्पष्ट बहुमत की राज्य में पहली भाजपा सरकार बनाने का गौरव वसुंधरा राजे को हासिल हुआ।

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2008 में मामूली अंतर से सत्ता से बाहर हो गई

हालांकि राज्य में भाजपा सरकार के द्वारा किए गए कार्यों के दम पर राज्य की जनता ने वसुंधरा राजे पर विश्वास जताया लेकिन तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर और वसुंधरा राजे के बीच राजनीतिक खींचतान के चलते आखिरकार पार्टी को मामूली अंतर से सत्ता से बाहर रहना पड़ा।

नेता प्रतिपक्ष के पद पर जमाया अपना सिक्का

जब 2008 में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और भारतीय जनता पार्टी के द्वारा नेता प्रतिपक्ष के तौर पर वसुंधरा राजे को आगे नहीं किया गया तो उन्होंने राज्य में पार्टी तोड़ने तक की नौबत पैदा कर दी।

आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व को वसुंधरा के सामने झुकना पड़ा और उनके अधिकांश समय लंदन में रहने की तमाम आरोपों के बावजूद 5 साल तक नेता प्रतिपक्ष का पद वसुंधरा राजे के पास रहा।

2013 में मोदी लहर में मिला प्रचंड बहुमत

इसके बाद 2013 में जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए और देश भर में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर पूरे देश भर में दौड़ रही थी, उस पर सवार होकर राज्य में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा ने 163 सीटों पर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जिसका सारा श्रेय वसुंधरा राजे आज भी खुद लेती हैं।

5 साल तक लगातार नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ टकराव की स्थिति रही

163 सीटों पर प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने वाले वसुंधरा राजे 2013 से 2018 तक मानव राज्य में अपनी मनमर्जी पर उतर आईं।

केंद्रीय नेतृत्व के द्वारा तमाम तरह के दिशा निर्देश दिए गए लेकिन उन्होंने सभी दिशानिर्देश दरकिनार करते हुए मनमर्जी जारी रखी। आखिरकार दिसंबर 2018 के चुनाव में उनको खुद के नेतृत्व में दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा।

“मोदी तुझसे बैर नहीं वसुंधरा तेरी खैर नहीं

सत्ता की आंधी पर सवार वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ 2016 में ही माहौल बनना शुरू हो गया था, लेकिन 2018 तक आते-आते राज्य में युवाओं, किसानों और मजदूरों वर्ग की तरफ से वसुंधरा राजे के खिलाफ बड़े पैमाने पर समीकरण बन गए। लोगों ने “मोदी तुझसे बैर नहीं वसुंधरा तेरी खैर नहीं” के नारे भी खुद नरेंद्र मोदी की रैलियों में लगाए।

केंद्रीय नेतृत्व के साथ टकराव बना रहा

ऐसा माना जाने लगा था कि 2018 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी वसुंधरा राजे को दरकिनार कर किसी दूसरे चेहरे पर चुनाव लड़ सकती है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ वसुंधरा राजे का टकराव स्पष्ट तौर पर सामने आ गया चर्चा यहां तक शुरू हो गई कि वसुंधरा राजे को हटाए जाने की स्थिति में पार्टी टूट सकती थी। ऐसे में उन्हीं के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और पार्टी केवल 72 सीटों पर सिमट कर रह गई।

नए नेतृत्व को सौंपी जिम्मेदारी, ठंडे बस्ते में चली गई वसुंधरा राजे

लगातार 37 साल तक भारतीय जनता पार्टी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में विभिन्न पदों पर काम करते हुए अपनी सहज, सरल और सौम्य छवि के चलते हमेशा निर्विवाद रहने वाले डॉ सतीश पूनिया को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने 2019 में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी।

प्रदेश प्रदेश में विभिन्न संगठनात्मक पदों पर रहते हुए अपने कुशल नेतृत्व का परिचय देने वाले और जमीन से जुड़े हुए आम कार्यकर्ता की छवि को आत्मसात किए हुए डॉ सतीश पूनिया को राज्य नेतृत्व सौंपा गया।

यह वसुंधरा राजे जैसे स्थापित और कई बार जीतकर कद्दावर नेता बनने का रुतबा हासिल कर चुके नेताओं के लिए पहली बार जीत कर आए सतीश पूनिया को इस तरह से नेतृत्व सौंपा जाना नहीं पचा।

संगठन में भी वसुंधरा राजे यह पसंद दरकिनार

केंद्रीय नेतृत्व ने हमेशा की भांति पूर्व में आंख दिखा चुकी वसुंधरा राजे को न केवल राज्य के संगठन से दूर किया, बल्कि सीढ़ी दर सीढ़ी कमजोर करते हुए संगठन में भी किसी भी पद पर उनके खास माने जाने वाले व्यक्ति को जिम्मेदारी नहीं सौंपी।

नतीजा यह हुआ कि जनता के द्वारा सत्ता से बाहर बिठाई गईं वसुंधरा राजे को भाजपा नेतृत्व ने भी संगठन से भी पूरी तरह से बाहर बैठा दिया। केवल राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसा नाम मात्र का पद सौंपकर सम्भवतः हमेशा के लिए संगठन से उनकी ससम्मान विदाई कर दी।

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वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया

पूरे 5 साल तक वसुंधरा राजे के सबसे खास और विश्वसनीय माने जाने वाले अशोक प्रणामी को प्रदेश का अध्यक्ष बनाकर सत्ता और संगठन दोनों वसुंधरा राजे के हवाले कर दिए गए, लेकिन सत्ता से बाहर होने के साथ ही अशोक परनामी को इस्तीफा देना पड़ा।

हालांकि राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते कद्दावर नेता मानी जाने वाली वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर राज्य से बाहर ले जाने का पहला कदम भाजपा के द्वारा 2019 के शुरुआत में उठाया गया।

18 साल में पहली बार सत्ता और संगठन दोनों से बाहर

यह पहला अवसर है जब वसुंधरा राजे पिछले 18 साल में पहली बार राजस्थान की सत्ता और संगठन दोनों से पूरी तरह से बाहर हैं। राज्य का संगठन डॉक्टर सतीश पूनिया के हाथ में है, जबकि नेता प्रतिपक्ष पूर्व कैबिनेट मंत्री गुलाबचंद कटारिया को बनाया गया गुलाबचंद कटारिया आरएसएस पृष्ठभूमि के होने के कारण निर्विवाद और हमेशा संगठनमुखी माने जाते रहे हैं।

जबकि उप नेता प्रतिपक्ष के तौर पर कभी वसुंधरा राजे सरकार में नंबर एक मंत्री माने जाने वाले राजेंद्र सिंह राठौड़ हैं, लेकिन अपनी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के चलते वसुंधरा राजे के विश्वास पात्रों से दूर हुए राजेंद्र सिंह राठौड़ इंदिरा संगठन के करीबी बनने की कोशिशों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है……

जो कविता शुरुआत में हमने इस आर्टिकल में लिखी है, उसका निचोड़ यहां पर सामने आ रहा है राजस्थान की सत्ता और संगठन से दरकिनार कर दी गईं।

वसुंधरा राजे आज कल उस मछली की तरह नजर आ रही हैं, जिसको पानी के बाहर निकाल दिया जाता है और वह जीवन बचाने के लिए बुरी तरह से झटपटाती है।

वसुंधरा के विपक्षी सतीश पूनिया के साथ

साल 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले जोधपुर के सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत और राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच राजनीतिक तलवारें खिंच गई थीं।

ऐसा माना जा रहा था कि गजेंद्र सिंह शेखावत को राजस्थान में मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा सकता है। जिसके चलते दोनों नेताओं के बीच बड़ी राजनीतिक दूरियां स्थापित हो गईं।

अब स्थितियां बिल्कुल उलट गई हैं। गजेंद्र सिंह शेखावत आज केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में सबसे पावरफुल मंत्रालय में से एक जल शक्ति मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री हैं और राज्य में संगठन भी आरएसएस के सबसे विश्वसनीय व्यक्ति डॉक्टर सतीश पूनिया के हाथ में है। ऐसे में गजेंद्र सिंह शेखावत और डॉ सतीश पूनिया के बीच बेहतरीन तालमेल देखने को मिल रहा है।

पिछले सप्ताह जब गजेंद्र सिंह शेखावत जयपुर में निर्माण नगर स्थित डॉक्टर सतीश पूनिया के निजी आवास पर पहुंचे और इत्मीनान से करीब 1 घंटे से अधिक समय तक दोनों दिग्गज नेताओं के बीच गुप्त मंत्रणा हुई, तो इससे पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बुरी तरह से छटपटा गईं।

दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है!

चाय राजनीति हो या फिर आम जीवन, हमेशा यह कहावत चरितार्थ होती है कि “दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।” इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए वसुंधरा राजे के विपक्षी के तौर पर माने जाने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत जब वसुंधरा राजे के धुर विरोधी खेमे की लीडरशिप रखने वाले डॉ सतीश पूनिया की मुलाकात हुई तो एक बार फिर से स्पष्ट हो गया कि “दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।”

जिला अध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों को वसुंधरा राजे कर रही हैं संपर्क!

समय की ताकत देखिए, पिछले 18 साल में जो वसुंधरा राजे राज्य की सत्ता और संगठन के केंद्र में रहीं हैं, उनको आज खुद राजस्थान में जिला अध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों को फोन करके जानकारी जुटाने का कार्य करना पड़ रहा है। सूत्रों का दावा है कि वसुंधरा राजे द्वारा जिला अध्यक्षों को खुद के जिला संगठन में उनके लोगों को भी तवज्जो दिए जाने की अपील की जा रही है।

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वसुंधरा की विदाई का यह है आखरी सबूत

वैसे तो दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी की हार के साथ ही राज्य से वसुंधरा राजे की राजनीतिक विदाई की यात्रा शुरू हो गई थी, लेकिन इस वक्त जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार संकट में है।

कथित तौर पर भाजपा के द्वारा यह संकट खड़ा किया जा रहा है, तब पार्टी का नेतृत्व डॉ. सतीश पूनिया के हाथ में है, और केंद्रीय नेतृत्व से लेकर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तक सीधे डॉ. सतीश पूनिया से बातचीत कर रहे हैं।

सुनने में यहां तक आया है कि पिछले डेढ़ साल के दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं आया, जब केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री के द्वारा डॉ सतीश पूनिया से विचार-विमर्श किए बिना राजस्थान में कोई भी राजनीतिक गतिविधि को अंजाम दिया गया हो।

मजेदार बात यह है कि 18 साल से राजस्थान में सत्ता और संगठन का केंद्र रहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के द्वारा गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बार-बार अपील किए जाने के बावजूद मिलने का समय नहीं दिया जा रहा है।

वसुंधरा राजे के लिए इससे भी गंभीर बात यह है कि गहलोत सरकार के इस सियासी संकट के दौर में भाजपा अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया लगातार, हर दिन राष्ट्रीय स्तर के तीनों दिग्गज नेताओं के साथ संपर्क में हैं और अब सारी कमान डॉ. सतीश पूनिया के हाथ में सौंप दी गई है।

आगे की संभावनाओं पर भी विचार हो

आने वाले समय में कांग्रेस तो अपने ही अंतर्विरोधों के चलते राज्य में अपनी प्रासंगिकता खो देगी और बहुत से कांग्रेसी नेता भाजपा में अपना भविष्य खोजेंगे।

इसी प्रकार पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राज्य की सियासत में महत्वहीन हो जाने के कारण उनके समर्थक भी पार्टी की मुख्य धारा में जुड़ जाएंगे।

भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां की सौम्य और स्वच्छ छवि के कारण तथा सर्वसमाज में स्वीकार्यता के कारण आगामी चुनाव में उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में पार्टी प्रोजेक्ट करेगी।

यद्यपि कांग्रेस से त्रस्त जनता भाजपा में स्वाभाविक विकल्प देखेगी, किंतु पार्टी यदि राज्य के भावी विकास का रोडमैप तैयार कर जनता के सामने ईमानदारी से नहीं जायेगी तो यह सत्ता प्राप्ति का मार्ग इतना सरल भी नहीं है।

कुछेक धनबल तथा सांप्रदायिक व जातीय विभाजन की राजनीति करने वाले अपना पुराना खेल खेलने की कोशिश करेंगे, जिसका प्रतिकार ईमानदारी से जनता के बीच जाकर अपनी मौलिक सोच और विकास की नीति का भरोसा दिलाने से ही संभव होगा। कुछ वरिष्ठ अवसरवादी नेताओं से सूझबूझ के साथ चलना होगा, अवसर आने पर वो वहीं करेंगे, जो अपेक्षित है।

भाजपा अध्यक्ष को अपने साथ जनता से जुड़े युवा नेताओं व बौद्धिक रूप से प्रखर सलाहकारों को जोड़ना होगा। यदि डाॅ. पूनिया ऐसा कर सकें तो दिसम्बर 2023 में वे राजस्थान के मुख्यमंत्री पद हेतु जनता की स्वाभाविक पसंद होंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री और अब भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे को राजस्थान से पूरी तरह से बाहर किए जाने का यही सबसे बड़ा सबूत है। यही कारण है कि वसुंधरा राजे आज जल से बाहर निकाली गई उस मछली की तरह छटपटा रही हैं, जिसको अपना जीवन बचाना है!

अंततः नए युग की शुरुआत हुई

अंततः यह कहा जा सकता है कि जिस तरह से कभी सत्ता और संगठन के केंद्र में भैरों सिंह शेखावत रहे, उसी तरह लगातार 18 साल तक वसुंधरा राजे ने राजस्थान में सत्ता और संगठन का सुख भोगा। अब समय डॉ. सतीश पूनिया का शुरू हो गया है।

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हालांकि 2008 के आसपास लगभग यही स्थिति ओम प्रकाश माथुर की थी, लेकिन वह वसुंधरा राजे के राजनीतिक जाल में उलझ कर रह गए और आज उनकी राजनीति अंतिम दिन गिन रही है। देखना दिलचस्प और बेहद रोचक होगा कि डॉ सतीश पूनिया अपने योग्य राजनीतिक युग की शुरुआत को लंबा खींच पाते हैं या नहीं?