सरकार नहीं दे रही भामाशाह के एक हज़ार करोड़ रुपए, निजी अस्पताल आज से धरने पर

सीकर।

दिसंबर 2018 में जब राजस्थान में सरकार बदली, तभी से भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना को लेकर आशंकाएं पैदा हो गई थी।

हालांकि सरकार ने इस मामले में कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरे-धीरे इस बीमा योजना ने दम तोड़ दिया। आखिरकार दिसंबर 2019 में आते-आते भामाशाह बीमा योजना का पैसा देना सरकार ने बंद कर दिया।

देश में मार्च महीने के दौरान कोविड-19 की वैश्विक महामारी के चलते लॉक डाउन शुरू हो गया, उससे पहले प्रदेश भर के निजी अस्पतालों का करीब 1000 करोड रुपए बकाया हो चुका था।

हालांकि अस्पतालों ने कमोबेश तभी से इस योजना के तहत उपचार करना बंद कर दिया था, किंतु अब जबकि अस्पताल दोबारा से शुरू हुए हैं, तब सभी निजी अस्पतालों ने भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत उपचार पर फुलस्टॉप लगा दिया है।

राज्य सरकार की तरफ से भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत रुके हुए 1000 करोड़ रुपये देने को लेकर अभी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की है।

इसके चलते निजी अस्पतालों में भारी रोष है। आज से निजी अस्पताल एसोसिएशन की तरफ से धरना शुरू किया जा रहा है।

निजी अस्पताल एसोसिएशन के प्रवक्ता मनीष त्यागी ने बताया कि न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के द्वारा क्लेम के रुपए नहीं दिए जा रहे हैं।

इसको लेकर जयपुर में आज शेखावाटी के डॉक्टरों के द्वारा सांकेतिक धरना शुरू किया जा रहा है।

इस अनशन की शुरुआत निजी अस्पताल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ बीएल रणवा और संरक्षक डॉ महेंद्र बुडानिया करेंगे।

बताया जा रहा है कि न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के द्वारा प्रस्तुत किए गए बिलों का भुगतान नहीं करने के कारण यह धरना दिया जा रहा है।

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उल्लेखनीय है कि जब राज्य सरकार के द्वारा न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत किस्तों का भुगतान नहीं किया गया तो कंपनी ने आज एक क्लेम देना बंद कर दिया।

अक्टूबर-नवंबर 2019 के दौरान जब यह कहानी शुरू हुई तब राज्य सरकार ने कहा कि यदि कंपनी अस्पतालों को क्लेम नहीं देगी तो सरकार अपने पास से देगी, इसलिए सभी अस्पताल भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत उपचार जारी रखें।

किंतु राज्य सरकार ने दिसंबर 2019 के बाद योजना के तहत निजी अस्पतालों को भीलों का क्लेम देना बंद कर दिया, किसी भी अस्पताल को भुगतान नहीं किया गया और आखिरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के द्वारा 2015 में शुरू की गई यह योजना दम तोड़ने को मजबूर हो गई।

सूत्रों के मुताबिक इस दौरान कुछ अस्पतालों को क्लेम का पैसा दिया भी गया है, लेकिन कहा जा रहा है कि इसके बदले ऊंचे स्तर पर 20% कमीशन लिया गया है। कमीशन का यह खेल बदस्तूर आज भी जारी है।

जबकि अधिकांश निजी अस्पताल 6 महीने से ज्यादा समय गुजरने के बावजूद उपचार किए गए बिलों के भुगतान को लेकर इंतजार कर रहे हैं।

कई छोटे निजी अस्पतालों के द्वारा उपचार किए जाने पर अटके हुए बिलों के कारण स्टाफ को सैलरी देना भी मुश्किल हो रहा है।