राजस्थान में फिर उठा सियासी तूफान: राज्यसभा चुनाव से पहले सर्जरी में लगे हैं टॉप के नेता

-अशोक गहलोत का बयान यह बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। राज्यसभा चुनाव से पहले भाजपा के टॉप नेता कांग्रेस की सर्जरी में जुटे हुए हैं

नेशनल दुनिया, जयपुर।

लॉक खोलने की शुरुआत होने के साथ ही राजस्थान में सियासी तूफान भी उठ खड़ा हुआ है। इसकी शुरुआत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने की और प्रतिक्रिया भाजपा के अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया ने दी है।

इसी महीने की 19 तारीख को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी और विपक्ष भाजपा के बीच एक बार फिर बयानों से निशाने लगाए जा रहे हैं।

अशोक गहलोत ने 1 दिन पहले ही भारतीय जनता पार्टी पर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया गया था।

इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर्दे के पीछे से राजनीति करता है और संगठन को सामने आकर राजनीति करनी चाहिए।

हमेशा की तरह एक बार फिर से अशोक गहलोत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर लिया तो उसके विरोध में उतरे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया ने बयान जारी करते हुए कहा कि जो संगठन देश में सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को अंजाम देता है, उसके ऊपर अशोक गहलोत हमेशा इसी तरह के उल्टे सीधे बयान देकर सुर्खियां बटोरना चाहते हैं।

इसके साथ ही सतीश पूनियां ने अशोक गहलोत को प्रदेश का असफल मुख्यमंत्री और अपनी ही पार्टी में दो धड़े बनाने वाला राजनेता करार दिया।

आपको बता दें कि राजस्थान में 19 जून को 3 राज्यसभा सीटों के लिए मतदान होगा, जिसकी प्रक्रिया मार्च में शुरू हो गई थी, किंतु देश भर में कोविड-19 की वैश्विक महामारी के चलते लॉक डाउन लगा और चुनाव को स्थगित करना पड़ा था।

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राज्य में संख्या बल के आधार पर देखा जाए तो तीन राज्यसभा सीटों में से 2 पर कांग्रेस के उम्मीदवार जीत सकते हैं और एक सीट भाजपा को मिल सकती है।

निर्वाचन आयोग के द्वारा अब राजस्थान में पुनः राज्यसभा की 3 सीटों के लिए चुनाव कराने की तारीख का ऐलान किया गया है, तभी से सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्ष भाजपा के बीच बयानबाजी फिर से शुरू हो गई है।

इधर, कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए बहुजन समाज पार्टी के 6 विधायकों ने स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि कांग्रेस छोड़कर वो लोग कहीं भी नहीं जाएंगे।

गौरतलब है कि राज्यसभा चुनाव से पहले गुजरात में कांग्रेस के विधायकों द्वारा इस्तीफा दिए जाने का सिलसिला जारी है।

ऐसे में पूर्ण बहुमत से कुछ ही सीटें ज्यादा लेकर सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी को राजस्थान में भी तोड़फोड़ किए जाने की चिंता सता रही है।

सूत्रों का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इस कार्य को राजस्थान में अंजाम दिए जाने का प्रयास किया जा रहा है।

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हालांकि, जिस तरह से अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच सार्वजनिक तौर पर राजनीतिक दूरियां हैं, उससे भाजपा को यह काम करने में अधिक मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इस दरमियान पार्टी के कद्दावर नेता और प्रदेश के पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह के द्वारा लगातार अशोक गहलोत और अपनी ही सरकार को बयानों से सवालों के घेरे में खड़े करने के कारण भी भाजपा के लिए राहत बने हुए हैं।

दूसरी तरफ सचिन पायलट के खेमे से माने जाने वाले विधायक पृथ्वीराज मीणा जैसे ही कई अन्य विधायक भी सचिन पायलट के एक इशारे पर पार्टी छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं।

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माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राज्यसभा की 3 में से 2 सीट जीतने का पक्का भरोसा है, लेकिन इस बीच पार्टी में टूट-फूट होने और क्रॉस वोटिंग का डर भी उनको सता रहा है।

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इस तरह से मध्यप्रदेश में कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने का कार्य किया गया और उसके बाद वहां पर कमलनाथ की सरकार गिरी, तब से राजस्थान में भी कांग्रेस पार्टी खासी चिंतित दिखाई दे रही है।

विधायकों के टूटने की संभावना के चलते ही मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात के कांग्रेस पार्टी के अधिकांश विधायकों को बाड़ाबंदी कर जयपुर की दिल्ली रोड पर स्थित 3-4 होटलों में ठहराया गया था, लेकिन कोविड-19 की वैश्विक महामारी के कारण उनको लॉक डाउन शुरू होने के बाद अपने घर भेज दिया गया था।

अब एक बार फिर से राज्यसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है, ऐसे में कांग्रेस पार्टी चिंतित है गुजरात में जिस तरह से पार्टी के विधायक इस्तीफा देकर पार्टी से जा रहे हैं, उससे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की चिंता और बढ़ गई है।

माना जा रहा है कि एक बार फिर से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कंधों पर गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान के विधायकों को बांधकर रखने की जिम्मेदारी डाली जा सकती है।

जिस तरह से पिछले 3 महीने के दौरान राज्य के उप मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष सचिन पायलट चुप्पी साधे बैठे हुए हैं और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनको बैठकों में नहीं बुलाकर सरकार होने के बाद भी उनको लगभग बाहर दिखा रखा है, उससे उनकी नाराजगी जाहिर तौर पर सामने आ सकती है।

आपको बता दें कि कोरोनावायरस कि वैश्विक महामारी के दौरान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा के द्वारा अधिकारियों के साथ और आपस में जितनी भी बैठक की गईं, उनमें किसी में भी उप मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी सचिन पायलट को आमंत्रित नहीं किया गया।

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दूसरी तरफ अपने तीखे बयानों के कारण चर्चित रहने वाले पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने भी अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े करते हुए अशोक गहलोत को चिंता में डाले रखा है।

उल्लेखनीय है कि विश्वेंद्र सिंह को सचिन पायलट के खेमे से माना जाता है, जबकि उनके साथ खाद्य नागरिक आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा भी लोकसभा चुनाव के बाद अपनी ही सरकार पर बयानों के जरिए हमला कर चुके हैं।

अगर राजस्थान में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी मार्च माह में जीत का दावा कर रही थी, उसी के अनुरूप तीन राज्यसभा सीटों में से उलटफेर होने के बाद 2 सीटें भाजपा जीतने में कामयाब हो जाती है तो यह राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बहुत बड़ी हार मानी जाएगी।

माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए सफलता इस बात में भी है कि कांग्रेस के कुछ विधायकों को क्रॉस वोटिंग के जरिए अपने खेमे में दिखाकर प्रदेश कांग्रेस के भीतर फूट को जगजाहिर किया जाए।

बहरहाल, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान के बाद भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया के द्वारा उनको जवाब देना उसके बाद में प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा के द्वारा सतीश पूनिया को कमजोर और अयोग्य अध्यक्ष बताया जाना और रघु शर्मा के बयान पर भाजपा की तरफ से ताबड़तोड़ रूप से कांग्रेस पर हमलावर हो जाना इस बात के संकेत हैं कि राजस्थान की सियासत में अब कोई बड़ा तूफान सामने आ सकता है।