महात्मा गांधी अस्पताल द्वारा किया जा रहा है खेल: जिन डायग्नोस्टिक लैब्स को सैंपल कलेक्ट करने का अधिकार नहीं, वो कोरोनावायरस की टेस्टिंग कर रहे हैं

– जिन लैब कर्मचारियों को टेस्टिंग का अनुभव नहीं, वह कोरोनावायरस की टेस्ट रिपोर्ट अपने हस्ताक्षर से जारी कर रहे हैं

– “राष्ट्रदूत अखबार” ने महात्मा गांधी अस्पताल की खोली पोल

राष्ट्रदूत अखबार ने अपने 1 जून के प्रकाशन में प्रथम पेज पर खबर प्रकाशित करते हुए लिखा है कि राज्य सरकार या इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर से जिन लोगों को कोरोनावायरस के सैंपल कलेक्ट करने का अधिकार प्राप्त नहीं है, वह भी कोरोनावायरस की टेस्टिंग कर रही है।

साथ ही जिन स्वास्थ्य कर्मियों के पास में तो कोरोना वायरस का टेस्ट करने की शैक्षिक योग्यता है और नहीं अधिकार है, वह भी टेस्ट रिपोर्ट जारी कर रहे हैं।

अखबार लिखता है कि कोरोनावायरस बीमारी की टेस्टिंग कोई खिलौने से खेलने जैसी बात नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक महामारी की टेस्टिंग है जिसने आज के आधुनिक मानव को भी हिला कर रख दिया है और मेडिकल कॉलेज मापदंडों पर खरा पाया जाने वाला टेस्ट इसके लिए जरूरी है।

मानव जाति अब तक इस बीमारी का कोई उपचार नहीं ढूंढ सकी है। इन हालात में कॉमन सेंस यह है कि जो इसके इलाज उपचार और टेस्टिंग की जांच निर्देशिका वैज्ञानिकों ने तथा डॉक्टरों ने मरीजों के लिए जारी की है, उसका अक्षर से पालन होना चाहिए।

निर्देशिका ब्लड शुगर या फोड़े-फुंसी की टेस्टिंग के बारे में नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के सामने आज की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती के बारे में है और अगर अनाधिकृत टेस्टिंग के कारण कोरोना से संक्रमित कोई भी मरीज नेगेटिव घोषित कर दिया गया तो यह मरीज जनता के बीच जाकर कितने और लोगों को संक्रमित कर सकता है, उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

उदाहरण के लिए एम जैनिक्स डायग्नोस्टिक लैब में नहीं, बल्कि मार्च के महीने से नहीं मई से कोरोना कर रही थी। जैसा की विधित है अजमेर रोड पर स्थित है और लैब के द्वारा मार्च महीने में जारी की गई कोरोनावायरस रिपोर्ट एक वरिष्ठ डॉक्टर ने राष्ट्रदूत को दी।

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गौरतलब है कि मार्च में आईसीएमआर ने पूरे देश में किसी भी प्राइवेट लैब टेस्टिंग करने की अनुमति नहीं दी थी। यहां एक और गौर फरमाने योग्य बात है कि डायग्नोस्टिक द्वारा जारी की गई रिपोर्ट शिवेश सिंह तोमर द्वारा हस्ताक्षरित है।

रिपोर्ट के अनुसार शिवेश सिंह तोमर एमडी माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं, परंतु उनका कोई भी रिकॉर्ड एमसीआई के पास राजस्थान मेडिकल काउंसिल के पास है।

इसे एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि जिस लैब को कानूनी तौर पर कोरोना की रिपोर्ट जारी करने की अनुमति नहीं थी, वह पॉजिटिव रिपोर्ट जारी करेगी।

राज्य सरकार के पास इस लैब के टेस्ट रिपोर्ट में पॉजिटिव पाए गए मरीजों का क्या ब्यौरा है? वहीं एम जैनिनक्स डायग्नोस्टिक जारी की गई थी, उसे डॉक्टर आदित्य मिश्रा और डॉक्टर पुष्पेंद्र सारस्वत हस्ताक्षरित किया है।

इन दोनों का भी राजस्थान मेडिकल काउंसिल में कोई रिकॉर्ड नहीं है। कारण यह दोनों ही एमएससी पीएचडी हैं, लेकिन एमबीबीएस नहीं हैं।

इसलिए इनकी कोई मेडिकोलीगल जिम्मेदारी नहीं है। महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में वैसे भी कई एमडी माइक्रो बायोलॉजिस्ट ऑर्थोलॉजिस्ट मरीजों के लिए जारी टेस्ट रिपोर्ट पर भी आदित्य मिश्रा और पर हस्ताक्षर कर रहे हैं।

महात्मा गांधी अस्पताल में कार्यरत हैं। इसकी पुष्टि हुई कि पुष्पेंद्र और कॉलेज में पीएचडी हैं, इसलिए उन्होंने अपने नाम के सामने डॉक्टर लगाया हुआ है। वहीं कई डॉक्टरों ने बताया कि आदित्य मिश्रा माइक्रोबायोलॉजी में एमएससी हैं और इस वर्ष भी उन्होंने माइक्रोबायोलॉजी में पीएचडी करने के लिए थीसिस प्रस्तुत की है।

सूत्रों के अनुसार आदित्य मिश्रा महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज से भी पीएचडी कर रहे हैं। गौरतलब है कि आदित्य मिश्रा ने फेसबुक प्रोफाइल पर लिखा है कि वह राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस से माइक्रोबायोलॉजी के विषय पर पीएचडी हासिल कर चुके हैं।

परंतु राजस्थान यूनिवर्सिटी मेडिकल साइंस की वेबसाइट से पीएचडी प्राप्त अभ्यार्थियों की लिस्ट में उनका नाम कहीं नहीं है, पर क्या क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट रूल के तहत यह दोनों डॉक्टर कोरोनावायरस की टेस्ट रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं और इस पर हस्ताक्षर भी कर सकते हैं।

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गौरतलब है कि 14 फरवरी को ही केंद्र सरकार ने एक गजट अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत एमडी पैथोलॉजी और एमडी माइक्रोबायोलॉजी के अलावा कोई भी डॉक्टर के पास पैथोलॉजी बायोकेमेस्ट्री और जेनेटिक्स में एमएससी की डिग्री हो, लैब रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर सकता है।

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लेकिन इसमें भी शर्त यह है कि इसके बाद लैब टेस्टिंग कम से कम 3 वर्ष का अनुभव भी होना चाहिए। एक डॉक्टर ने बताया कि हाल ही केंद्र सरकार द्वारा 14 फरवरी को जारी की गई अधिसूचना सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2017 को दिए गए आदेश का उल्लंघन है। क्योंकि आदेश के अनुसार केवल एक पैथोलॉजिस्ट या एडवांस्ड लैब की रिपोर्ट पर सकता है और में जारी रिपोर्ट के लिए न तो पुष्पेंद्र सारस्वत जवाबदेह होता है और नई आदित्य मिश्रा की रिपोर्ट करने के लिए अधिकृत हैं।

और इनके पास उपरोक्त डिग्री नहीं है। काम करने का 3 साल का उपयुक्त अनुभव नहीं है। जिस डॉक्टर द्वारा टेस्ट रिपोर्ट हस्ताक्षरित की जाती है, वह उसकी सत्यता को प्रमाणित करता है।

इसलिए आवश्यक होता है कि एक शैक्षणिक योग्यता प्राप्त डॉक्टर ही रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करें, परंतु एक आयोग द्वारा हस्ताक्षरित की सत्यता की पुष्टि नहीं होती है और यह भी पुष्टि नहीं की जा सकती है कि लैब में सभी न्यूनतम मापदंडों की पालना की गई है।

विकास स्वर्णकार, जो कि अस्पताल के मालिकों में से एक हैं, ने कहा कि जिन डॉक्टरों ने यह रिपोर्ट हस्ताक्षरित की है वे दोनों ही डिग्री होल्डर हैं और साथ ही पीएचडी कर चुके हैं।

अखबार को उन्होंने आगे बताया कि देशभर में एडवांस लैब्स में सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार पहले ही केवल एक एमडी पैथोलॉजिस्ट या माइक्रोबायोलॉजिस्ट हस्ताक्षर कर सकते थे, परंतु 2017 के बाद से ऐसा नहीं हो रहा है और एक पीएचडी भी लैब रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर सकता है।

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यह पूछे जाने पर कि महात्मा गांधी अस्पताल में कोरोना के कितने टेस्ट होते हैं? उन्होंने कहा कि हर रोज 400 से 500 टेस्ट होते हैं। राज्य सरकार भी हमें एक हफ्ते में 1000 से 1500 सैंपल भेजती है।

यहां गौर फरमाने योग्य यह है कि अगर शैक्षिक योग्यता प्राप्त डॉक्टर महात्मा गांधी अस्पताल में टेस्ट करवाने आए लोगों की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर भी करते हैं, तो क्या सैंपल की टेस्टिंग भी निष्पक्ष हो रही है?

एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी ने अखबार को कहा कि राज्य सरकार केवल सैम्पल्स को उपकरण में डालकर महात्मा गांधी अस्पताल में भेजती है। वहां एक फॉर्म में सैम्पल्स की संख्या और सैंपल लेकर जाने वाले अधिकारियों का नाम रिकॉर्ड किया जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि महात्मा गांधी अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी हर सैम्पल को एक सीआर कोड देते हैं, जिसकी सूचना राज्य सरकार को दे दी जाती है।

हर सैम्पल, जो अलग-अलग व्यक्तियों से लिया गया होता है, उसका सीआर कोड अलग होता है। राज्य सरकार को सैंपल के रिजल्ट की एक एक्सेल सहित पर सीआर कोड के साथ दिए जाते हैं।

एक सूत्र ने आगे बताया कि राज्य सरकार तीन प्राइवेट लैब जिन्हें आईसीएमआर द्वारा टेस्टिंग की अनुमति दी गई है, केवल महात्मा गांधी से जुड़ी लेवल भेजती है। राज्य सरकार महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में टेस्टिंग किट भी सप्लाई करती है, परंतु यह लैब टेस्टिंग की प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार है।

इस पूरे प्रकरण में यह बात उजागर हुई है कि के दौरान डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की भूमिका काफी प्रशंसनीय है, परंतु प्रशासनिक निगरानी व रणनीति घटती रही है, जिससे मेडिकल उपकरण व दवाइयां और टेस्ट कई गंभीर त्रुटियां रही है।