एक मंत्री से बढ़कर कोई हैसियत नहीं उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की राजस्थान सरकार में!

नेशनल दुनिया, जयपुर।

राजस्थान में साल 2013 के वक्त जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने सत्ता गंवा दी थी, तब राज्य में फिर से कांग्रेस को खड़ा करने के लिए केंद्रीय आलाकमान ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट को राज्य कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए सचिन पायलट ने न केवल 5 साल तक प्रचंड बहुमत के कारण सत्ता में राज करने वाली वसुंधरा सरकार को चारों खाने गिरने का प्रयास किया, बल्कि दिसंबर 2018 के चुनाव में वसुंधरा को सत्ता से बाहर भी कर दिया।

हालांकि सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच राजनीतिक प्रतियोगिता तभी शुरू हो गई थी, जब राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर होने के कारण साल 2016 में “मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं” के नारे लगने शुरू हो गए थे।

दोनों नेताओं के बीच धीरे-धीरे यह प्रतियोगिता आगे बढ़ते हुए 1 दिन इस मुकाम पर पहुंच गई कि सत्ता में आने से पहले ही खुद को मुख्यमंत्री घोषित किए जाने की मांग खुलेआम किए जाने लगे। पूर्व मुख्यमंत्री रहते हुए अशोक गहलोत ने खुद को सुबह घोषित रूप से नैसर्गिक रूप से मुख्यमंत्री होने का सबसे योग्य उम्मीदवार घोषित कर दिया।

इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि सचिन पायलट के नाम पर राजस्थान के गुर्जर समुदाय ने पहली बार कांग्रेस को संपूर्ण वोटिंग की और उसी के दम पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए कांग्रेस पार्टी के आलाकमान पर भी काफी दबाव बढ़ गया था।

दिसंबर 2018 में जैसे ही चुनाव का परिणाम सामने आया और कांग्रेस पार्टी को 99 सीटों पर जीत हासिल हुई, तो एक बार फिर से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 1998 की तरह केंद्रीय आलाकमान के समक्ष खुद को सबसे योग्य मुख्यमंत्री बताते हुए तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का दावा कर दिया।

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आपको यह जानना जरूरी है कि 1998 के वक्त जब राजस्थान कांग्रेस को परसराम मदेरणा के नाम से जाना जाता था और कहा जाता है कि तब कांग्रेस पार्टी को 152 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत केवल इसीलिए मिला था, क्योंकि उन्होंने परसराम मदेरणा को मुख्यमंत्री उम्मीदवार अघोषित रूप से कर दिया था।

सिद्धांतों के पक्के परसराम मदेरणा जहां खुद को आलाकमान की तरफ से मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर आराम से बैठे थे, वही तत्कालीन लोकसभा सदस्य अशोक गहलोत ने कांग्रेस आलाकमान के समक्ष खुद को सक्षम मुख्यमंत्री होने का दावा करते हुए सारी तिकड़म बैठाई।

अब आपको बताते हैं दिसंबर 2018 का वह वाकया, जब सबसे ज्यादा उम्मीदों के साथ पहली बार मुख्यमंत्री बनने की तैयारी कर रहे सचिन पायलेट को तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आलाकमान के सामने दूसरे नंबर का नेता घोषित कर दिया।

दरअसल कांग्रेस पार्टी के समक्ष दिसंबर 2018 को असमंजस की ऐसी स्थिति आ गई थी, जब 5 साल से पीसीसी अध्यक्ष लेते हुए राज्य में कांग्रेस को अपने खड़ी करने वाले सचिन पायलट और दो बार के मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत में से किसी एक को चुनना था।

खुद के मुंह से खुद को जादूगर कहने वाले अशोक गहलोत ने यहां पर एक बार फिर से कांग्रेस आलाकमान के समक्ष अपना जादू चलाया और खुद को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने और पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाए जाने पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा को राजी कर लिया।

सचिन पायलट को हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से अभी तक भी नहीं हटाया गया है। लेकिन उनको पंचायती राज विकास मंत्री का पद देकर नाम के लिए उपमुख्यमंत्री का पद भी दे दिया। संवैधानिक तौर पर उपमुख्यमंत्री का कोई स्थान नहीं होता है, किन्तु राजनीतिक तौर पर किसी को ओब्लाइज किए जाने के लिए इस पद को सृजित किया गया है।

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जब दिसंबर 2018 में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे, तब ऐसा माना जा रहा था कि मई 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के वक्त यदि कांग्रेस पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा।

तमाम तरह की चर्चाओं और धारणाओं को धत्ता बताते हुए कांग्रेस पार्टी मई 2019 के चुनाव में लगातार दूसरी बार राज्य की सभी 25 लोकसभा सीटों को हार गई। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद अपने बेटे वैभव गहलोत को जिताने में कामयाब नहीं हो पाए।

राजस्थान कांग्रेस की तरफ से सभी 25 सीटों पर लगभग मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के चहेते लोगों को टिकट दिया गया था। लेकिन एक भी सीट नहीं जीतने के कारण सचिन पायलट हावी होते हुए नजर आए। ऐसे समय में अशोक गहलोत ने एक बार फिर से अपना जादू दिखाया और आलाकमान को खुद का आगे का कार्यकाल कंटिन्यू रखने के लिए राजी कर लिया।

अशोक गहलोत ने अपने 2008 से 2013 के कार्यकाल की तरह एक बार फिर से बसपा के 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करके अपनी जादूगरी दिखाने का कार्य किया और अपनी सरकार को 5 साल के लिए स्थिर कर दिया।

तब से लेकर अब तक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच भले ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की बात की जाती रही हो, लेकिन हर बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही हावी रहे हैं। सचिन पायलट को हर बार राजनीतिक तौर पर अशोक गहलोत के सामने हार का सामना करना पड़ा है।

मार्च में शुरू हुई कोविड-19 की वैश्विक महामारी के बाद एक तरफ जहां पूरी सरकार और अफसरशाही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इशारे पर चलती रही, तो उप मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनको किसी भी मीटिंग में शामिल होने का अवसर नहीं दिया।

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चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा समेत कई अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मीटिंग की। लेकिन एक भी ऐसी मीटिंग नहीं थी जिसमें उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट शामिल हुए हो, हालांकि बीच-बीच में सचिन पायलट पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए नरेगा को लेकर काम दिए जाने के कारण सुर्खियों में आने का प्रयास करते रहे हैं।

इस तरह से देखा जाए तो राजस्थान में उपमुख्यमंत्री होने के बावजूद इस वैश्विक महामारी के वक्त भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को सरकार में से लगभग गायब ही कर दिया।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते कांग्रेस के पूर्व नेताओं की जयंती पर और उनकी पुण्यतिथि पर कांग्रेस कार्यालय में श्रद्धांजलि अर्पित करने के अलावा ऐसा लग रहा है कि सचिन पायलट की हैसियत केवल एक सामान्य से मंत्री के अधिक कुछ भी नहीं है!