हनुमान बेनीवाल के निशाने पर कृष्णा पूनियां क्यों हैं? राठौड़ क्यों राजनीति चमका रहे हैं? क्या पर्दे के पीछे गहलोत हैं?

नेशनल दुनिया, चूरू/ जयपुर /नागौर।

चूरू जिले के सादुलपुर थाना के सर्किल इंचार्ज विष्णुदत्त विश्नोई के द्वारा आत्महत्या किए हुए आज 6 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक भी उनकी आत्महत्या के कारणों का पता नहीं चल पाया है।

इस बीच राजस्थान में राजनीति एक बार फिर से विष्णुदत्त विश्नोई के बहाने किसी एक व्यक्ति को टारगेट करने पर तुली हुई है। उप नेता प्रतिपक्ष और भाजपा के नेता राजेंद्र राठौड़ लगातार स्थानीय विधायक पदमश्री विजेता कृष्णा पूनिया पर आरोप लगा रहे हैं।

पूर्व विधायक मनोज न्यांगली राजेंद्र राठौड़ के साथ खड़े हैं। इसके अलावा पार्टी मेंबर होने के नाते भाजपा के चूरू से सांसद राहुल कसवा भी कहीं न कहीं कृष्णा पूनिया को घेरने का प्रयास कर रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया ने एक बार भी स्थानीय विधायक कृष्णा पूनिया का नाम नहीं लिया है, लेकिन उन्होंने शुरुआत में ही इस मामले की निष्पक्ष जांच करने के लिए राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार से मांग की है।

एक तरफ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक और नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल पूरी तरह से मामले की सीबीआई जांच को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

उन्होंने बुधवार को ही प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर कलेक्टर को ज्ञापन देकर गहलोत सरकार से सीबीआई जांच की मांग करते हुए बड़े और उग्र आंदोलन की चेतावनी भी दी है।

इस प्रकरण में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की भूमिका भी काफी संदिग्ध नजर आ रही है। क्योंकि शनिवार को इस घटनाक्रम के बाद रविवार को जिस तरह से एक स्थानीय डीसीपी रामप्रताप विश्नोई का तबादला किया और जांच सीआईडी सीबी को सौंपी, उससे साफ है कि कहीं ना कहीं गहलोत भी कृष्णा पूनिया को दबाव में लेने का प्रयास कर रहे हैं।

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राजेंद्र राठौड़ से भिड़ गए थे रामप्रताप बिश्नोई

आपको बता दें कि शनिवार को सुसाइड किए जाने के बाद जब विष्णुदत्त विश्नोई का पोस्टमार्टम किया गया था और डेड बॉडी सौंपने की बारी आई तब उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ और सादुलपुर डीसीपी रामप्रताप बिश्नोई के बीच जोरदार तकरार हुई थी।

रामप्रताप बिश्नोई का दूसरे दिन किया गया तबादला

रामप्रताप बिश्नोई और राजेंद्र सिंह राठौड़ के बीच तकरार के बाद अशोक गहलोत ने जनप्रतिनिधि के पक्ष में त्वरित फैसला लेते हुए डीसीपी रामप्रताप विश्नोई को रविवार सुबह ही सादुलपुर से चूरू रवाना कर दिया था।

राजेंद्र राठौड़ खुद जेल की हवा खा चुके हैं

यह बात सही है कि पूर्व में धारासिंह उर्फ दारिया एनकाउंटर मामले में राजेंद्र राठौड़ जेल की हवा खा चुके हैं। वह इस मामले में मुख्य आरोपियों में से एक थे और इसके चलते उनको कई वर्षों तक जांच का सामना करना पड़ा था। बाद में उनको बरी कर दिया गया।

अशोक गहलोत से नजदीकी रिश्ता बताया जाता है राजेंद्र राठौड़ का

राजनीतिक मजबूरियां अलग-अलग पार्टी की हो सकती है, लेकिन जिस तरह से विधानसभा के भीतर और विधानसभा के बाहर राजेंद्र राठौड़ और अशोक गहलोत एक-दूसरे के नजदीक हैं। उससे स्पष्ट है कि इस प्रकरण में में कहीं न कहीं राठौड़ के पक्ष में गहलोत ने फैसला किया है।

जाट समाज के नेताओं के खिलाफ माने जाते हैं अशोक गहलोत

वैसे आमतौर पर राजनीतिक चर्चाएं इस बात की होती है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्थान के जाट समाज के नेताओं के खिलाफ माने जाते हैं उनके द्वारा महिपाल मदेरणा मामले में जिस तरह से सीबीआई जांच की गई और उनको जेल की हवा खिलाई गई।

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उससे पहले महिपाल मदेरणा के पिता परसराम मदेरणा के मुख्यमंत्री बनने के दौरान 1998 के वक्त भी अशोक गहलोत के द्वारा राजनीतिक चालबाजी की गई थी। उसके बाद से स्पष्ट तौर पर अशोक गहलोत को जाट समाज के खिलाफ मानने की एक धारणा बन चुकी है।

कृष्णा पूनिया के बजाय उनके पति पर है राजपूत नेताओं का निशाना

राजेंद्र राठौड़ और मनोज न्यांगली की द्वारा लगातार कृष्णा पूनिया पर हमला किया जाता रहा है, लेकिन इस प्रकरण में उनका निशाना कृष्णा पूनिया के पति और अंतरराष्ट्रीय कोच वीरेंद्र सिंह के पर है, जिनकी भूमिका इस मामले में राजनीतिक दबाव की बताई जा रही है।

जाट-राजपूत एक बार फिर आमने-सामने

नागौर राजस्थान में राजनीति की प्रयोगशाला मानी जाती है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यहां पर जाट और राजपूत जातियों के बीच हमेशा प्रतिस्पर्धा रही है। नागौर के बगल में चूरु है और चूरू के साथ ही सीकर, झुंझुनू, अजमेर, बीकानेर समेत पूरे इलाके में जाट और राजपूत समाज के नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है।

कभी हनुमान बेनीवाल राजपूत नेताओं के निशाने पर रहते थे। बाद में 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त भाजपा और हनुमान बेनीवाल के बीच गठबंधन के वक्त राजपूत नेता हनुमान बेनीवाल के साथ मंच पर नजर आए। उसके बाद माना जा रहा था कि अब शायद जाट और राजपूत नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई है।

चूरू में हुए इस आत्महत्या प्रकरण के बाद एक बार फिर से स्थानीय राजनीति उबाल पर है। यहां पर एक बार फिर से स्थानीय नेता जाट और राजपूत समाज के आमने-सामने होने का दावा कर रहे हैं, जबकि दोनों समाज हमेशा एक साथ रहे हैं। नेताओं के द्वारा ही प्रतिस्पर्धा करवाई जाती रही है।

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हनुमान बेनीवाल चूरू में अपने पैर पसार ना चाहते हैं

जिस तरह से हनुमान बेनीवाल की पार्टी ने सीबीआई जांच को लेकर राजस्थान सरकार पर दबाव बनाया है, उससे स्पष्ट है कि गठबंधन की मजबूरियों से परे हनुमान बेनीवाल नागौर के बाद अब चूरू में भी अपने पैर पसार ना चाहते हैं, जहां पर भाजपा और कांग्रेस का दबदबा है।

शराब तस्करी और मनोज न्यांगली की भी है चर्चा

उल्लेखनीय यह भी है कि इस पूरे इलाके में हरियाणा से आने वाली अवैध शराब की तस्करी पूरे प्रदेश में हमेशा एक नंबर पर रहती है यहां पर शराब तस्करों का दबदबा रहता है। पूर्व विधायक मनोज न्यांगली के परिवार के साथ पहले भी गैंगवार की घटना हो चुकी है।

उनके बड़े भाई की हत्या कर दी गई थी और उनके खुद के ऊपर भी गोली चलाने के कारण उनको सुरक्षा मिली हुई है। वह हमेशा बुलेट प्रूफ जैकेट पहनकर रहते हैं। उनकी आंख पर गोली लगने के कारण एक आंख हमेशा के लिए चली गई थी।

2018 के चुनाव में मनोज न्यांगली कृष्णा पूनिया के सामने चुनाव हार गए थे। इसलिए माना जाता है कि अपनी प्रतिद्वंदी विधायक को कमजोर करने के लिए मनोज न्यांगली किसी भी तरह की हथकंडे को अपना सकते हैं।