52 दिन बाद आई अशोक गहलोत सरकार को भिखारियों की याद, क्या अबतक खाद्यान्न की आस में जीवित होंगे?

नेशनल दुनिया, जयपुर।

राजस्थान सरकार ने कोविड-19 की वैश्विक महामारी के कारण लॉक डाउन की अवधि बढ़ाये जाने की संभावना के चलते ऐसे 26 तरह के वर्ग निर्धारित किए हैं।

ये लोग प्रतिदिन कमाई कर प्रतिदिन आटा खरीद कर भोजन बनाते थे और खाते थे। किन्तु लॉक डाउन के चलते उनको मिलने वाला रोजाना का रोजगार छिन गया और अब उनके खाने के लाले पड़ रहे हैं।

सरकार ने 26 तरह की कैटेगरी बनाकर उनका सर्वे कर चिन्हीकरण करने का काम शुरू किया है। इसके साथ ही दावा कर कहा है कि इन कैटेगरी में शामिल लोगों को अस्थाई तौर पर खाद्यान्न वितरण किया जाएगा।

किंतु सबसे मजेदार बात यह है कि इन 26 कैटेगरी में एक कैटेगरी ऐसी बनाई गई है, जो संभवतः अब तक सरकारी सहायता नहीं मिलती तो राज्य से समाप्त हो चुकी होती।

राज्य सरकार ने जो 26 तरह की कैटेगरी बनाकर सर्वे करने के बाद उनको अनाज देने की बात कही है, उनमें 5वें स्थान पर एक कैटेगरी भिखारियों की भी है।

आप अनुमान लगा सकते हैं कि लॉक डाउन को 52 दिन का समय बीत चुका है और अब राज्य सरकार इनकी कैटेगरी बनाकर चिन्हित खाद्यान्न उपलब्ध करने का काम शुरू करने जा रही है।

सामाजिक संगठनों ने खिलाया खाना

सरकार के कामकाज का आप खुद अनुमान लगा लीजिए, यदि प्रदेश में सड़कों और चौराहों पर अक्सर भीख मांग कर अपना पेट भरने वाले इस कैटेगरी के बदनसीब लोगों को यदि सामाजिक संगठनों के द्वारा प्रतिदिन 52 रोज तक खाना नहीं खिलाया गया होता, तो क्या राज्य सरकार इनका सर्वे करने के लिए इनको ढूंढ भी पाती?

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इससे भी जोरदार बात यह है कि राज्य सरकार समय-समय पर राजस्थान को भिखारी मुक्त प्रदेश बनाने के लिए अभियान चलाती रहती है। इतना ही नहीं, अपितु तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने ही 2012 में कानून बनाकर भिखारियों के पुनर्वास और स्व-रोजगार का दावा कर चुकी है।

किंतु आज भी राज्य सरकार के दिशा निर्देश में यदि भिखारी नाम से कैटेगरी बनी है, तो इसका मतलब स्पष्ट है कि इस मामले में राज्य सरकार लगातार 8 साल तक बिल्कुल नाकाम साबित हुई है।

मजबूरों को भिखारी क्यों लिखा जा रहा है?

एक और सोचने की बात की है की सड़कों और चौराहों पर अक्सर भीख मांग कर पेट भरने वाले लोगों में अधिकांश ऐसे लोग होते हैं, जिनके या तो शारीरिक रूप से कमजोरी होती है।

किसी दुर्घटना में उनके हाथ- पांव कट जाते हैं या फिर ऐसे लोग होते हैं, जिनके परिवार में कमाने वाले जवान लड़के-लड़कियां नहीं होती हैं और मजबूरन उनको चौराहे पर भीख मांगकर पेट भरना पड़ता है।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन!

शारीरिक रूप से अपंग लोगों के लिए केंद्र सरकार ने विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया था। केंद्र के दिशा-निर्देशों के बाद पूरे देश में ऐसे लोगों को दिव्यांग शब्द से संबोधित किया जाता है।

मगर राजस्थान सरकार ने ऐसे लोगों को भिखारी शब्द से संबोधित करके न केवल संघीय सरकार के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन किया है, बल्कि साथ ही ऐसे लोगों का अपमान भी किया है जो शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं।

यह है 26 तरह के लोगों की सूची-

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इस सूची में 5वें नम्बर पर है भिखारी की कैटेगरी।

दिव्यांग को भिखारी कैसे कह सकती है सरकार?

इसके अलावा सबसे गंभीर बात यह है कि राजस्थान की सरकार ऐसे दिव्यांग लोगों के लिए 52 दिन तक क्यों नहीं सोच पाई? जबकि इस कैटेगरी में आने वाले ये लोग प्रतिदिन आम लोगों से भीख मांगकर अपना जीवन-यापन करते हैं।

यदि राज्य की सरकार इतनी ही संवेदनशील है तो, इसका जवाब दे कि 52 दिन तक प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार के द्वारा बनाई गई भिखारी कैटेगरी के लोगों का जीवन कैसे गुजर-बसर हो रहा था?

तत्कालीन गहलोत सरकार ने बनाया था कानून

प्रदेश में वर्ष 2012 में विधानसभा से पारित राजस्थान में भिखारियों या निर्धन व्यक्तियों का पुनर्वास अधिनियम बनाया गया था। इसके अनुसार पुनर्वास केंद्र खोले जाने थे, जहां भिखारियों व निर्धनों को लाकर स्वरोजगार प्रशिक्षण दिया जाना था। यह कानून तब की कांग्रेस सरकार के दौरान बना था।

कानून बनाकर कैसे भूल गई कांग्रेस सरकार

हम सवाल यह खड़ा होता है कि अशोक गहलोत की पूर्वर्ती सरकार के द्वारा जो कानून बनाया गया था। उसके मुताबिक यदि प्रदेश के भिखारियों के लिए पुनर्वास और उनके स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोले गए थे, तो वर्तमान में प्रदेश में भिखारी कैसे हो सकते हैं, जबकि उस कानून को बने 8 साल हो चुके हैं।

52 दिन तक कहां सो रही थी सरकार?

राज्य सरकार के द्वारा इस तरह कैटेगरी बनाकर खदान वितरित किए जाने के लिए सर्वे आरंभ करने को लेकर भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान इकाई अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया ने सवाल खड़े किए हैं।

उनका कहना है कि राजस्थान सरकार 52 दिन से कहां पर सो रही थी? यदि विभिन्न सामाजिक संगठनों के द्वारा इस दौरान भिखारियों को भोजन नहीं दिया जाता, तो क्या राज्य में भिखारी जीवित रह पाते?

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