श्रम कानून में बदलाव कर श्रमिकों के साथ छलावा करने जा रही है केंद्र व राज्य सरकार

श्रमिक विरोधी कानूनों के खिलाफ श्रमिक विकास संगठन (SVS)का 15 मई को एक दिवसीय सत्याग्रह

-श्रम कानून में बड़ा बदलाव करना केंद्र व् राज्य सरकार का मजदूर विरोधी चेहरा – श्रमिक विकास संगठन (SVS)

नेशनल दुनिया, जयपुर।

कोविड-19 की वैश्विक महामारी के बीच केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा श्रमिक कानूनों में बदलाव किए जाने का विरोध भी शुरू हो गया है। श्रमिक संगठनों ने इसको केंद्र व राज्य सरकारों का छलावा करार दिया है।

कोरोना संकट से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को करीब 2 महीने होने जा रहे हैं। लॉकडाउन की वजह से उद्योग-धंधे ठप हैं, देश और राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो रही है। उद्योगों को पटरी पर लाने के आड में देश के छह राज्य अपने श्रम कानूनों में कई बड़े श्रमिक विरोधी बदलाव कर चुके हैं।

श्रमिक संगठनों का कहना है कि श्रम कानूनों में बदलाव की शुरूआत राजस्थान की गहलोत सरकार ने काम के घंटों में बदलाव को लेकर किया।

राज्य सरकार द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम और कारखाना अधिनियम, ‘पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट 1936’ सहित प्रमुख अधिनियमों में संशोधन किए हैं।

ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 को 3 साल के लिए रोक दिया गया है। श्रमिकों के 38 कानूनों में बदलाव किये हैं, जिससे ILO कन्वेंशन 87), सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार (ILO कन्वेंशन 98), ILO कन्वेंशन 144 और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत आठ घंटे के कार्य दिवस का घोर उल्लंघन हो रहा है।

राज्य सरकार हवाला दे रही है कि कोविड-19 के चलते उद्योग सेक्टर अत्यधिक दबाव में है। जहां आज भी मुख्य हाईवे रोड मजदूर लोग देश के अलग-अलग प्रदेशों से अपने अपने प्रदेश गांव शहर पैदल पैदल चलते देखे जा सकते हैं। जहां एक तरफ कोरोना वायरस की मार से पूरा देश जल रहा है।

यह भी पढ़ें :  Sandeep Tomar clinches thriller for MP Yodha

दूसरी ओर राज्य सरकार उद्योगों की हिस्सेदारी को लेकर चिंतिंत नजर आ रही है, लेकिन श्रमिकों की उद्योगों में योगदान का कोई जिक्र नहीं किया जा रहा है।

जैसा की ज्ञात है, श्रमिक एक अनपढ़ व्यक्ति नहीं होता है। आईटीआई, वोकेशनल ट्रेनिंग, हायर सेकेंडरी करने के पश्चात अर्ध-कुशल, कुशल एवं उच्च -कुशल को श्रमिक विभाग के नियमानुसार किसी भी उद्योग या ठेकेदारी प्रथा में नौकरी दी जाती है।

श्रमिक विकास संगठन के राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य प्रशांत जायसवाल का कहना है कि जिस प्रकार राज्य सरकार ने श्रमिक नियमों में उद्योगों को बढ़ावा देने का हवाला देते हुए नियमों को शिथिल किया है, उससे श्रमिक वर्ग पूरी तरह उद्योगपतियों एवं ठेकेदारी प्रथा के हाथों की कठपुतली बन जाएगा।

क्योंकि राज्य सरकार ने उन तमाम प्रावधानों को समाप्त कर दिया है जिसके माध्यम से उद्योगपतियों ठेकेदारी प्रथा के हाथों पीड़ित होने पर श्रम न्यायालय एवं न्यायालय की शरण में जा सकता था।

जायसवाल के मुताबिक उद्योगपतियों को नियमों के जरिए उद्योग बढ़ावा देने के लिए श्रमिकों से अब 8 घंटे की जगह शिफ्ट को 12 घंटे का कर दिया है।

उद्योगपतियों को यह छूट दी जा रही है कि वह सुविधा के अनुसार पारी (शिफ्ट) में भी बदलाव कर सकते हैं। जिस प्रकार कानून में संशोधन किया गया है, उससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि राज्य सरकार का यह निर्णय पूर्णता: श्रमिक विरोधी है। इसे लागू होने से श्रमिकों के अधिकारों का हनन होगा।

राज्य सरकार द्वारा लेबर कानून के बदलाव से मुख्य संभावित खतरे पैदा हो गए हैं-

-उद्योगों को सरकारी व् यूनियन की जांच और निरीक्षण से मुक्ति देने से कर्मचारियों/ श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा।

यह भी पढ़ें :  गैंगवार पर बनने वाली फिल्म का जयपुर में पोस्टर जारी किया गया

-शिफ्ट व कार्य अवधि में बदलाव की मंजूरी मिलने से कर्मचारियों / श्रमिकों को बिना साप्ताहिक अवकाश के प्रतिदिन 8 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ेगा, जो कि 8 घंटे काम के एक लम्बी लड़ाई के बाद प्राप्त हुए थे।

– श्रमिक यूनियनों को मान्यता न मिलने से कर्मचारियों / श्रमिकों के अधिकारों की आवाज कमजोर होगी और पूंजीपतियों का मनमानापन बढ़ेगा।

-मजदूरों के काम करने की परिस्थिति और उनकी सुविधाओं पर ट्रेड यूनियन कि दखल /निगरानी खत्म हो जाएगी।उद्योग-धंधों को ज्यादा देर खोलने से वहां श्रमिकों को डबल शिफ्ट करनी पड़ेगी जिससे शोषण बढ़ेगा ।

-पहले प्रावधान था कि जिन उद्योग में 100 या ज्यादा मजदूर हैं, उसे बंद करने से पहले श्रमिकों का पक्ष सुनना होगा और अनुमति लेनी होगी, अब ऐसा नहीं होगा। इससे बड़े पैमाने पर श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा| उद्योगों में बड़े पैमाने पर छंटनी और वेतन कटौती शुरू हो सकती है।

-अब कानून में छूट के बाद ग्रेच्युटी देने से बचने के लिए उद्योग, ठेके पर श्रमिकों की हायरिंग बढ़ा सकते हैं, जिससे बड़ी संख्या में बेरोजगारी बढ़ेगी ।

-मालिक श्रमिकों को उचित वेंटिलेशन, शौचालय, बैठने की सुविधा, पीने का पानी, प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स, सुरक्षात्मक उपकरण, कैंटीन, क्रेच, साप्ताहिक अवकाश और आराम के अंतराल प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं होंगे, जो कि श्रमिकों के मूल अधिकार थे।

जायसवाल का कहना है कि श्रमिक विकास संगठन (SVS) असंवैधानिक तरीके से श्रमिक कानून में किए गए बदलाव का पूर्णत: विरोध करता है। साथ ही सरकार के इस कृत्य के विरोध में श्रमिक विकास संगठन (SVS)के सभी पदाधिकारी /सदस्य 15 मई 2020 को देशव्यापी एक दिवसीय सत्याग्रह “सामूहिक उपवास” के द्वारा विरोध दर्ज कराएँगे।

यह भी पढ़ें :  पति, सास को नींद की गोलियां खिला ससुर के साथ भागी बहु