कलेक्टर के आदेश से पत्रकारों में उबाल, जार ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, मीडिया पर सेंसरशिप क्यों?

—पत्रकारों का सवाल: क्या सोशल मीडिया के बहाने पत्रकारिता पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहे हैं धौलपुर कलेक्टर?

नेशनल दुनिया, जयपुर।
धौलपुर कलेक्टर की तरफ से जारी किया गया मीडिया के लिए, खासकर डिजीटल मीडिया के पत्रकारों के लिए एक चेतावनी पत्र सामने आया है।

इस पत्र में उन्होंने महामारी एक्ट का हवाला देते हुए डिजीटल मीडिया को टारगेट किया है और ‘आपदा प्रबन्धन अधिनियम 2005’ का हवाला देते हुए डिजीटल मीडिया की खबरों की सत्यता पर सवाल उठाया है।

कलेक्टर की तरफ से 6 पेज का यह आदेश सामने आते ही पत्रकारों ने इसका कड़ा प्रतिकार किया है। इसको लेकर ‘जर्नलिस्ट एसोशिएन राजस्थान’, यानी ‘जार’ ने कड़ा ऐतराज जताते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखा है।

जार की तरफ से अध्यक्ष राकेश शर्मा और महासचिव संजय सैनी का पत्र सीएम गहलोत को भेजा गया है। जिसमें लिखा है कि ‘न्यूज पोर्टल/वेबसाइट/सोशल मीडिया पर अकुंश लगाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा मनमाना आदेश निकाला गया है’, उसपर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जाए।

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जार ने लिखा है, न्यूज पोर्टल/वेबसाइट/सोशल मीडिया पर अकुंश लगाने के लिए प्रशासन द्वारा निकाले जा रहे मनमाने आदेश पर रोक लगाने के संबंध में। प्रतिष्ठा में,
श्री अशोक गहलोत
माननीय मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार।
विषय: न्यूज पोर्टल/वेबसाइट/सोशल मीडिया पर अकुंश लगाने के लिए प्रशासन द्वारा निकाले जा रहे मनमाने आदेश पर रोक लगाने के संबंध में।
महोदय,
डिजिटल मीडिया के इस युग में न्यूज पोर्टल, न्यूज वेबसाइट को केन्द्र और राज्य सरकारें मान्यता देने में लगी है। गत कुछ साल से भारत सरकार के डीएवीपी से विज्ञापन मान्यता भी मिल चुकी है। राजस्थान सरकार भी न्यूज वेबसाइट व पोर्टल की मान्यता के लिए नियम बना रही है। दिल्ली, मध्यप्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश में इन्हें विज्ञापन मान्यता दी जा चुकी है। प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पंजीयन के लिए भारत सरकार की ओर से नियम बने हुए हैं। आरएनआई, डीएवीपी पंजीयन और विज्ञापन मान्यता देती है।
डिजिटल युग में न्यूज वेब-पोर्टल, वेब चैनल और न्यूज वेबसाइट स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हो रही है। कोरोना संकटकाल में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत समेत देश व राज्यों के तमाम अफसर, मंत्री डिजिटल मीडिया (फेसबुक, वाट्सअप, ट्विटर आदि) के माध्यम से ही प्रशासनिक कार्यों को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे डिजिटल युग में राजस्थान के कुछ प्रशासनिक अफसर अपने मनमाने आदेश से स्वतंत्र पत्रकारिता पर अकुंश लगाने में लगे हुए हैं। धौलपुर के जिला कलक्टर ने 6 मई, 2020 को एक ऐसा आदेश निकालकर पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास किया है। (पत्र संलग्न है)
इनका तर्क है कि सोशल मीडिया पर भ्रामक व गलत सूचनाएं दी जा रही है। लेकिन यह सच्चाई नहीं है। कुछ लोगों की सोशल मीडिया पर भ्रामक और गलत सूचनाएं प्रेषित कर देने से पूरे पत्रकार समाज पर उंगली उठाना ठीक नहीं है। जिन लोगों का कभी पत्रकारिता से कभी वास्ता नहीं रहा, ऐसे लोग गलत भ्रामक खबरें देकर पूरी पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं। हम भी चाहते हैं कि जिनका पत्रकारिता से संबंध नहीं रहा और जो गलत खबरें देकर समाज और प्रशासन को भ्रमित करते रहते हैं, ऐसे लोगों पर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। ऐसे कुछ लोगों की गलती का खामियाजा पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों व न्यूज पोर्टल पर निकालना गलत है।
आपसे निवेदन है कि पत्रकारिता से जुड़े न्यूज पोर्टल, वेबसाइट, वेब चैनल को दबाने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा निकाले जा रहे मनमाने आदेशों पर रोक लगाई जाए।
07/05/2020

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राकेश कुमार शर्मा (प्रदेश अध्यक्ष), संजय सैनी (प्रदेश महासचिव)

प्रतिलिपि:
1.मुख्य सचिव राजस्थान सरकार
2. आयुक्त सूचना एवं जनसंपर्क विभाग

उल्लेखनीय है कि धौलपुर जिला कलेक्टर आरके जायसवाल की तरफ से एक दिन पहले ही एक आदेश जारी किया गया था, जिसमें उन्होंने न्यूज पॉर्टल, वेबपॉर्टल, यू ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, व्हाट्सएप, ट्वीटर, टेलीग्राम और अन्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष डिजीटल माध्यमों पर खबरों की सत्यता पर सवाल खड़ा करते हुए दंड़नीय अपराध करार दिया था।

इतना ही नहीं, अपितु जिला कलेक्टर ने अपने पत्र में लिखा है, ‘उच्चतम न्यायालय की पिटीशन 468.2020 व 469.2020 में पारित निर्णय दिनांक 31.03.2020 अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम यूनियन ऑफ इंडिया बगैर में कोरोना महामारी के संदर्भ में प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया के बाबत महत्वपूर्ण निर्देश पारित किये गए हैं, जिन्हें वर्तमान प्रकरण में उल्लेखित किया समझा जाना चाहिए।’

कलेक्टर ने, ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 54’ का उल्लेख किया है। कलेक्टर ने एक तरह से डिजीटल मीडिया पर सेंसरशिप लगाते हुए कहा है कि, ‘इस अवस्था में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 188 में दण्ड के प्रावधान आकर्षित होते हैं तथा यह उपेक्षा की गई है, कि समस्त पब्लिक अथोरिटी, भारत सरकार, राज्य सरकार के द्वारा आमजन के लिए समय समय पर जारी हैल्थ एडवाइजरी के निर्देशों का पालन किया जाएगा।

साथ ही कलेक्टर ने लिखा है, ‘जो कोई भी व्यक्ति आपदा या इसकी गम्भीरता के संबंध में झूठी चेतावनी को प्रसारित करता है, जिसके परिणामस्वरुप समाज में लोगों के बीच घबराहट फैलती है, ऐसी झूठी चेतावनी फैलाने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक की कारावास की सजा और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।’

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उन्होंने अंत में लिखा है, ‘यह आदेश आज दिनांक 06.05.2020 से अग्रिम आदेश तक प्रभावी रहेगा। हालांकि, अभी तक केवल धौलपुर कलेक्टर के द्वारा ही ऐसा आदेश दिया गया है, किंतु माना जा रहा है कि इस तरह के प्रतिबंध और भी जिलों के कलेक्टर लगा सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भारत की सरकार बीते 6 साल से लगातार डिजीटल इंडिया पर फोकस कर रही है।

आज जब प्रिंट मीडिया कोरोनावायरस की बीमारी के चलते घर घर तक नहीं पहुंच पा रहा है, तब डिजीटल जर्नलिज्म ही हर व्यक्ति तक खबरें पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।

ऐसे समय में राजस्थान सरकार के एक जिला कलेक्टर द्वारा इस तरह का फरमान सुनाया जाना क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत उन तमाम लोगों के सपनों पर नियंत्रण लगाया जाना प्रतीत नहीं हो रहा है, जो डिजीटल मीडिया का समर्थन करते हैं?