3500 रूपये चुकाकर घर आने की मजबूरी, श्रेय ले रही है गहलोत सरकार!

श्रीवत्सन

राजस्थान सरकार भले ही प्रवासी श्रमिकों का दुखड़ा सुनाकर उनकी सुरक्षित घर वापसी का दावा कर रही है, लेकिन हकीकत यह है की इन श्रमिकों को राजस्थान से आने और जाने के लिए 3,500 रूपये तक चुकाने पड़ रहे हैं।

पहले से ही लम्बे लोक डाउन के कारन बंध पड़े उद्योग-धंधे और हाथों से जा चुकी नौकरी ऊपर से इतने दिनों तक दुसरे राज्य में रहकर जिंदगी चलाने की चिंता के बाद अब इस तरह रकम चुकाकर आने की मजबूरी।

यदि जमीनी हकीकत यही है तो बड़ा सवाल यह भी है की आखिरकार फिर सरकार इनके दावों पर मरहम लगाने का दावा किस आधार पर करके झूठा श्रेय लेने में जुटी है।

ये है जयपुर का सिन्धी बस अड्डा… कहने को तो यह राजस्थान का सबसे बड़ा बस अड्डा है, लेकिन लोक डाउन के चलते यहाँ पर खड़ी सभी सरकारी बसों के पहिये थमे हुये हैं, फिर भी प्राईवेट बसों का यहाँ चलती नज़र आ रही है।

ये वो बसे हैं जो की राजस्थान से लोगों को सरकारी अनुमति के बाद अन्य राज्यों में ले जा रही है और वापस वहां से प्रवासी श्रमिकों और फसे हुए लोगो को भी रही है।

एक प्राईवेट ट्रेवल की इस बस को देखिये कोटा से यह बस कोचिंग सेंटर के छात्रों और श्रमिकों को लेकर निकली थी।

सरकार ने बच्चों को उनके अभिभावकों तक पहुँचाने के नाम पर जमकर इसके लिए वाहवाही लूटी, लेकिन हकीकत थी की सभी लोगों को इसके लिए भारी रकम भी चुकानी पड़ी।

अब यही बस असम होकर कुछ लोगों को यहाँ लेकर आई है और इन सबसे भी गुवाहाटी से यहाँ तक आने के 3500 रूपये प्रति यात्री वसूले गए।

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जबकि हकीकत यह है की जयपुर से गुवाहाटी के सफ़र को तय करने के लिए आम दिनों में बस में महज 1300 से 1700 रूपये का ही टिकट लगता है।

सफर करने वाला युवक, जो बता रहा है की सही यात्रियों से 3500-3500 रूपये यहाँ तक आने को वसूल किये गए हैं। तभी बस में बैठाया गया उन्हें।

लेकिन ख़ुशी है की मुसीबत में थे। अब घर पहुंचें वाले हैं। इसी कारण इतनी बड़ी रकम देकर वे आने को तैयार हुए।

जब यह प्राईवेट बस कोटा से निकली थी तब भी उनसे रूपये वसूले गए और अब खाली आ रही तभी अब भी रूपये लेकर ही हमें बैठाया गया। फ्री में कुछ नहीं हो रहा है।

राजस्थान सरकार की माने तो विभिन्न राज्यों में फंसे प्रवासियों और मजदूरों की सुगम घर वापसी के लिए अब तक करीब 10 लाख प्रवासियों और श्रमिकों ने अपने गृह स्थान पहुंचने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है।

इनमें से करीब 70 प्रतिशत संख्या राजस्थान आने वालों की है। इन सभी को सरकारी बसों में लाने का दावा किया जा रह है, लेकिन ये प्राईवेट बसें बता रही है कि सरकार के दावें की हकीकत क्या है।

चूँकि सरकार का परिवहन विभाग खुद पिछले कई सालों से घाटे में चल रहा है। ऊपर से इन बसों की हालत भी इतनी सही नहीं है की वह लम्बी दूरी की यात्रा पर जा सके, यही कारण है की प्राईवेट बसों को चलाने की सरकार की मजबूरी है।

अब सरकार रेलवे के अधिकारीयों से बातचीत करके स्पेशल ट्रेने चलाने की बात कह रही है।

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राजस्थान की यातायात मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास कहते हैं कि”हां यह बात सही है कि कोटा में कुछ बच्चों ने अपने खुद के पैसे से घर जाने की इच्छा जताई थी और हमने उनके लिए इन प्राइवेट बसों की व्यवस्था की थी और जब यह बसें वहां से आई तो आश्रम से होकर आई।

जहां पर लोग पैसा देकर इस में बैठ गए। हमारी किसी से पैसा लेने की मंशा नहीं है। हम तो व्यवस्था करने में जुटे हैं, लेकिन केंद्र सरकार को भी समझना चाहिए कि स्पेशल ट्रेन चलाएं, ताकि ऐसे लोगों को राहत मिल सके।

अभी बसों में इन सभी को लाया जाना कोई आसान काम नहीं है। इसीलिए ऐसी कुछ घटनाएं सामने आई है और जो लोग पैसा देकर आना चाह रहे हैं, भी आ रहे हैं।

हम भी चाहते हैं कि जो लोग अपने खुद के वाहन से आना चाहते हैं, केंद्र सरकार उन्हें इजाजत दे, ताकि वे जल्दी से जल्दी अपने घर पहुंच सके इसमें देरी करना सही नहीं है।

जाहिर है की एक तरफ जहाँ सरकार सभी लोगों से इस मुश्किल भरे वक़्त में मानवता दिखाने की अपील कर रही है। कहीं उसका प्राईवेट बसें चलाकर परेशान श्रमिकों और प्रवासियों से इस तरह से रूपये वसूलना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता।