रैपिड टेस्ट किट फेल नहीं है, बल्कि लोगों को जानकारी नहीं है, देखिए क्या है सच

पिछले दिनों रैपिड टेस्ट किट को लेकर राजस्थान से उठा तूफान पूरे देश भर में फैल चुका है। बताया जा रहा है कि राजस्थान सरकार ने अपने सभी रैपिड टेस्ट किट वापस भेज दिए, जबकि केंद्र सरकार ने चीन से मंगवाए गए आठ लाख रैपिड टेस्ट किट कैंसिल कर दिये।

रैपिड टेस्ट किट ऑनलाइन में होने वाले कोरोनावायरस जांच में 95% से लेकर 54% तक का भेदभाव सामने आया है। राज्य सरकार ने राजस्थान में 168 लोगों का रैपिड टेस्ट किट किया था और इन सभी का लैब में भी टेस्ट करवाया दोनों में केवल 5.4% ही समानता पाई गई है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह समानता 54% तक है।

राजस्थान सरकार ने पहले ही दिन रैपिड टेस्ट किट कि इस असफलता को केंद्र सरकार के माथे मंढते हुए कहा कि यहां पर रैपिड टेस्ट से कोई टेस्टिंग नहीं की जाएगी और सभी जांच पहले से की जा रही लैब में की जाएगी। इसके बाद राजस्थान सरकार ने एक भी टेस्ट रैपिड टेस्ट किट से नहीं किया।

क्या कारण है रैपिड टेस्ट कित फेल है?

राजस्थान के एसएमएस अस्पताल की डॉक्टर बताते हैं कि रैपिड टेस्ट किट फेल नहीं है बल्कि इससे किए जा रहे सैंपल इन गलत वक्त पर किए जा रहे हैं। दरअसल होता क्या है रैपिड टेस्ट किट मानव बॉडी में वर्तमान में जो भी वायरस मौजूद है उसका टेस्ट करती है।

जबकि लैब में कोरोनावायरस का जो सैंपल लिया जाता है, उसके बाद उसके वायरस को बड़ा किया जाता है। मतलब उस वायरस को इतना बड़ा किया जाता है कि वह जांच में पॉजिटिव या नेगेटिव इसका पता लग सके।

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डॉक्टर सरल भाषा में बताते हैं कि जिस तरह से एड्स का एक इंजेक्शन किसी दूसरे व्यक्ति के लगाए जाने पर अगले 90 दिन तक उस मरीज के एड्स के पॉजिटिव होने के लक्षण या फिर जांच में ऐसा कुछ भी नहीं आएगा। ठीक उसी तरह से कोरोनावायरस का पॉजिटिव या नेगेटिव आना है।

रैपिड टेस्ट किट मनुष्य के शरीर में वर्तमान में मौजूद वायरस की वास्तविक स्थिति बताता है क्योंकि कोविड-19 तब काफी शिशुकाल में होता है। जिसके चलते उसकी पहचान नहीं हो पाती है, यानी कि रैपिड टेस्ट किट तब नेगेटिव दिखाता है, लेकिन उसी मरीज की उसी रैपिड टेस्ट किट से 8 दिन बाद जांच की जाएगी तो वही मरीज पॉजिटिव दिखाया जाएगा।

दूसरी तरफ लैब में जो जांच की जाती है, उससे पहले कोरोनावायरस या अन्य किसी भी तरह के वायरस की जांच किए जाने से पहले उस वायरस को शिशुकाल से बाहर निकाल कर युवावस्था में प्रवेश करवाया जाता है, ताकि उसके पॉजिटिव या नेगेटिव होने की वास्तविक स्थिति को जांचा जा सके।

डॉक्टरों के अनुसार इस तरह के शिशु काल में मिलने वाले वायरस रोक की पॉजिटिव होने के लक्षण नहीं मिल सकते, जबकि उसको लैब में खिला-पिला कर बड़ा किया जाता है और इसके बाद उसकी वास्तविक स्थिति सामने आती है। यही कारण है कि रैपिड टेस्ट किट वायरस के शिशुकाल के समय में उसके पॉजिटिव लक्षण नहीं बता पाती है

भारत की प्रशासनिक स्थिति यह है कि सभी उच्च पदों पर आईएएस और आईपीएस अधिकारी बैठे हुए जिनको विशेषज्ञ सेवाओं के बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे में जो जानकार डॉक्टर हैं उनसे राय लिए बिना ही इस तरह की राय सरकार को दे दी जाती है। परिणाम यह निकलता है कि रैपिड टेस्ट किट को फेल करार दे दिया जाता है।

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डॉक्टर तो यहां तक कहते हैं कि भारत में आज की तारीख में कोरोनावायरस के पॉजिटिव मरीजों की संख्या एक लाख से अधिक है, लेकिन प्रत्येक की जांच लैब में नहीं हो पाई है। इसलिए जानकारी नहीं मिल रही है अगर बड़े पैमाने पर जांच हो तो भारत में मरीजों को रखने के लिए अस्पतालों के बेड भी कम पड़ जाएंगे।