लॉक डाउन के चलते सैनेटरी नैपकिन बिना गर्ल्स, राजस्थान के आदिवासी जिलों की भयावह तस्वीर

रामगोपाल जाट

कोविड-19 के चलते राजस्थान समेत पूरा भारत बंद है। भारत को बंद हुए आज पूरे 18 दिन हो चुके हैं। एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोरोनावायरस को लेकर समीक्षा बैठक हुई, जिसमें अधिकांश मुख्यमंत्रियों ने लॉक डाउन का समय बढ़ाने पर सहमति जताई। करीब आधा दर्जन राज्यों ने 1 मई तक लोग डाउन बड़ा भी दिया है।

देश के तमाम इलाकों से कोविड-19 के बाद लगे लोग डाउन और कई जगह लगे कर्फ्यू के बाद लोगों के पास खाने-पीने की वस्तुएं पहुंचना बेहद जटिल कार्य हो चुका है। इसके चलते गुजरात के सूरत में मजदूरों ने दो दिन पहले ही अग्निकांड भी किया है। इसी तरह से पंजाब के पटियाला से भी आज एक डरावनी खबर सामने आई है, जहां पर कुछ सरदारों ने पुलिस पर हमला बोल दिया।

इस बीच नेशनल दुनिया की पड़ताल में सामने आया कि राजस्थान में करीब 7 लाख से ज्यादा स्कूल जाने वाली बच्चियां सेनेटरी नैपकिन के कारण परेशानी का सामना कर रही हैं। खासतौर से आदिवासी इलाकों में जहां पर मेडिकल स्टोर और अस्पताल काफी दूर हैं, ऐसी जगह पर बच्चियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

उदयपुर, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, पाली, राजसमंद, कोटा, बूंदी, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, अजमेर, सवाई माधोपुर, हनुमानगढ़, चूरू, नागौर समेत कुछ जिले हैं, जहां पर क्षेत्रफल बड़ा है, लेकिन आबादी कम है शहर काफी दूर हैं। ऐसे में बच्चियों को, महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन नहीं मिल रहे हैं।

उदयपुर के नजदीक कोटड़ा की रहने वाली दिपिका (बदला हुआ नाम) कहतीं हैं, पहले हमको स्कूल से मिल जाया करते थे, लेकिन अब लाना मुश्किल हो गया है। कहतीं हैं, हमारे गांव से मेडिकल स्टोर भी दूर है, जिसके चलते हम परेशान हैं।

यह भी पढ़ें :  6 नगर निगमों के 560 वार्डों के लिए 2903 उम्मीदवारों ने किए 3216 नामांकन पत्र दाखिल

इसी तरह की व्यथा नागौर के डीडवाना के पास वाले गांव की रहने वाली संतरा (बदला हुआ नाम) कहतीं हैं, मैं 12वीं कक्षा में पढ़ती हूं, मेरे को 2 अप्रैल को सेनेटरी नैपकिन की जरूरत थी, पर उपलब्ध नहीं होने पर मैंने कपड़े से ही काम चलाया है।

कमोबेश यही कहानी सवाई माधोपुर की बसन्ती, कोटा के दूर गांव की रेखा, जयपुर में फागी के 30 किलोमीटर दूर रहने वाली अनिता, जोधपुर की रहने वाली मधुमति की है। (सभी नाम बदले हुए हैं।) जिनका कहना है कि आज उनको पता चला है कि सेनेटरी नैपकिन किसलिए एडवांस रखने चाहिए।

उदयपुर की जिला कलेक्टर आनंदी ने बताया कि जिले में स्कूल जाने वाली करीब 25 से लेकर 30 हज़ार लड़कियां ऐसी हैं, जिनको स्कूल और आंगनवाड़ी के माध्यम से सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध करवाई जाती थी, लेकिन बीते 18 दिन से सब कुछ बंद होने के कारण दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

जिला कलेक्टर ने बताया कि छात्राओं की इसी समस्या को देखते हुए तय किया गया है कि सीएमएचओ और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के द्वारा घर घर जाकर बच्चियों को सेनेटरी नैपकिन देने के लिए कार्य शुरू किया गया है।

छात्रों के साथ सेनेटरी नैपकिन की समस्या केवल उदयपुर-बांसवाड़ा जैसे आदिवासी जिलों में ही नहीं है, अपितु राजधानी जयपुर जिले की सीमा, जो कि शहर की सीमा से बाहर है, वहां पर भी ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चियों के साथ यह समस्या बहुत जटिल होती जा रही है।

उल्लेखनीय है कि स्कूल जाने वाली 12 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को स्कूलों के माध्यम से और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध करवाए जाते हैं। इसके अलावा इस उम्र की प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियां भी हैं, जो सेनेटरी नैपकिन नहीं होने के कारण दिक्कतों का सामना कर रही हैं।

यह भी पढ़ें :  अशोक गहलोत को 27 सितंबर को हाई कोर्ट में तलब, किसानों के मामले में लगा झटका

जिस तरह बच्चियों को सेनेटरी नैपकिन नहीं होने के कारण दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, ठीक उसी तरह से दूरदराज के गांवों में मेडिकल स्टोर नहीं होने, शहर तक नहीं पहुंचने और लॉक डाउन व कर्फ्यू के चलते कस्बों से दूर रहने के कारण महिलाओं को भी ऐसे मुश्किल वक्त में दिक्कतें हो रही है।