एडमा ने की विश्व विरासत स्थल जंतर-मंतर के मूल स्वरूप को बिगाड़ने की तैयारी

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जयपुर।
पुरातत्व विभाग की कार्यकारी एजेंसी आमेर विकास एवं प्रबंधन प्राधिकरण ने प्रदेश के सबसे पहले विश्व विरासत स्थल जंतर-मंतर के मूल स्वरूप को बिगाड़ने की तैयारी कर ली है।

एडमा के अधिकारी अब जंतर-मंतर में पुरातत्व नियमों, यूनेस्को की गाइडलाइन और जयपुर की स्थापत्य शैली के विपरीत यंत्रों की फर्श पर सजावटी पत्थर जड़ने की कवायद में जुटे हैं।

एडमा की ओर से हाल ही में जंतर-मंतर के लिए 1 करोड़ 58 लाख की निविदा जारी की गई है। इस निविदा के तहत यहां के राशि वलय, जंतर-मंतर के बीच में बने चौक और कपाली यंत्र के साथ-साथ कुछ अन्य यंत्रों की चूने की फर्श को उखाड़कर उसकी जगह सजावटी पत्थर के स्लैब, चौके और दासे लगवा रहे हैं।

पुरातत्व के जानकारों का कहना है कि अधिकारी इस निविदा के जरिए यहां के यंत्रों का पूरा स्वरूप बदलने पर तुले हैं। जबकि पुरातत्व नियमों और यूनेस्को की गाइडलाइन के अनुरूप इनका मूल स्वरूप बरकरार रखना जरूरी है।

यदि एडमा के इस कार्य पर यूनेस्को ने संज्ञान ले लिया तो जंतर-मंतर का विश्व विरासत स्थल का दर्जा छिन भी सकता है।

एडमा की ओर से पिछले एक दशक से यंत्रों की फर्श पत्थर से बनाने की कवायद चल रही है। लेकिन, पुरातत्व नियमों और यूनेस्को की गाइडलाइन के कारण वह अभी तक इस कार्य में सफल नहीं हो पाए थे।

अब एडमा ने उच्चाधिकारियों से सांठ-गांठ कर यह निविदा जारी की है। एडमा अधिकारियों का कहना है कि जंतर-मंतर में हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और उनके चलने से चूने की फर्श खराब हो जाती है।

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वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि एडमा में बिना कमीशन कोई काम नहीं होता और इसी कारण से मिलीभगत की फर्श जल्दी टूट जाती है। आमेर महल में जंतर-मंतर से ज्यादा पर्यटक आते हैं तो क्या महल में हर जगह चूने की फर्श को उखाड़कर पत्थर के चौके लगा दिए जाएं?

पर्यटन विभाग ने गत वर्ष जंतर-मंतर के बाहर जयपुर निर्माण शैली के अनुरूप फुटपाथ पर चूने की फर्श बनवाई है, तो क्या पर्यटन विभाग को यह पता नहीं था कि लोगों के चलने से यह फर्श उखड़ जाएगी?

प्राचीन निर्माणों में नहीं है पत्थर का उपयोग
जानकारों का कहना है कि जयपुर और आस-पास के जिलों में प्राचीन निर्माणों में सजावटी पत्थरों का उपयोग बहुत ही सीमित हुआ करता था।

केवल खिड़की दरवाजों, मेहराबों और पायों में पत्थर का उपयोग होता था। दीवारों पर या फर्श में सजावटी पत्थर नहीं लगाया जाता था। इसके स्थान पर दीवारों पर चूने का प्लास्टर और फर्श भी चूने से ही बनाई जाती थी।

इसका प्रमुख कारण प्राचीन समय में जयपुर और इसके आस-पास सजावटी पत्थरों की अनुपलब्धता थी। अब विगत एक दशक से लगभग सभी स्मारकों पर संरक्षण और जीर्णोद्धार के नाम पर बेवजह तोड़-फोड़ की जा रही है।

सजावटी पत्थरों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा किया जा रहा है, जिससे स्मारकों का मूल स्वरूप बिगड़ रहा है। कु छ समय पूर्व ही एडमा ने मनमानी करते हुए प्राचीन स्मारक ईसरलाट पर बेवजह टनों सजावटी पत्थरों का बोझ लाद दिया था।