ज़मीन समाधि सत्याग्रह के द्वारा 1250 बीघा बेशकीमती ज़मीन को बचाने में जुटे हैं अन्नदाता

जयपुर।

कई दिनों तक ज़मीन में खुद को गाढ़कर प्रशासन के सामने अपील कर रहे हैं। जयपुर जिले में बीते 10 साल से किसान अपनी ही ज़मीन सरकार से लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सरकार के साथ कई दौर की वार्ता भी विफल है। लगातार 53 दिन से ज़मीन पर ही बस गए हैं, खुद की ज़मीन से बेदखल किये गए किसान मालिक। जेडीए हज़ारों करोड़ कमाने पर तुला है। किसान के बच्चों की शादी की रश्में भी यहीं पर पूरी की जा रही है।

जेडीए 2010 से पहले के जमीन अधिग्रहण कानून के मुताबिक मुआवजा देने चाहता है, जबकि किसान 2013 के बाद या 25% विकसित भूमि के लिए अड़े हुए हैं।

तमाम पहलू और कानूनी जानकारों के साथ ही पीड़ित किसानों, जेडीए अधिकारियों, प्रबुद्धजनों, वकीलों, एनजीओ के लोगों, कॉलोनी वासियों के बयान लेकर इस खबर को तथ्यात्मक तरीके से तैयार किया गया है।

दरअसल साल 2010 में राज्य सरकार ने नींदड़ गांव की 1250 बीघा जमीन लावा पीके ऑर्डर निकाले थे। 2013 में जमीन के अवार्ड भी जारी कर दिए थे, लेकिन किसानों ने जमीन देने से इनकार कर दिया।

साल 2013-2014 के दौरान नया भूमि अधिग्रहण कानून लागू हो गया। जिसके मुताबिक किसान की जमीन अधिग्रहण करने के बाद उसको डीएलसी की चार गुना रेट दी जाएगी, अथवा बाजार भाव पर ही जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है।

जयपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि 2010 में ही किसानों को अवार्ड जारी कर दिए गए थे, इसलिए जमीन की कीमत 2013 के बाद वाले अधिग्रहण कानून के मुताबिक नहीं दी जा सकती है। जयपुर विकास प्राधिकरण किसानों को विकसित भूमि देने के लिए भी तैयार है, परंतु वह भी पुरानी दरों पर।

यह भी पढ़ें :  नवलगढ़ पीड़िता के पक्ष में VHP, बजरंग दल, शिवसेना और RLP की प्रतिभा सिंह उतरीं राजकुमार शर्मा के खिलाफ-

दूसरी तरफ पीड़ित किसानों का कहना है कि उन्होंने अभी तक भी जेडीए के द्वारा जारी किए गए अवार्ड उसकी जान ले गया, इसलिए उनको 2014 के बाद लागू हुए नए जमीन अधिग्रहण कानून के अनुसार डीएलसी की चार गुणा रेट मिलनी चाहिए।