छवि चमकाने के लिए अशोक गहलोत सरकार एजेंसी को हर महीने एक करोड़ रुपए देगी, वो भी पूरे 2 साल तक

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– सवाल यह उठता है कि क्या यह एजेंसी केवल मुख्यमंत्री और उनके चेहरे मंत्रियों की छवि साफ-सुथरी करेगी या फिर मुख्यमंत्री सचिन पायलट भी उस काम के दायरे में आएंगे?

लगता है राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अंततः यह मान लिया है कि उनकी सरकार का गठन होने के 1 वर्ष बाद ही सरकार की छवि चिथड़े-चिथड़े हो गई है, पार्टी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं उत्साह अब तक के सबसे निम्न स्तर पर है, प्रशासन के नाम पर नहीं के बराबर काम हो रहा है और अपने उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट से छुटकारा पाने का जुनून उनको कुछ और सोचने नहीं दे रहा है।

खबरों के अनुसार राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार अपना कायाकल्प करवाना चाहती है और इसके लिए वह एक राष्ट्रीय जनसंपर्क एजेंसी को 2 वर्ष के लिए प्रतिमाह एक करोड़ की मोटी धनराशि देगी। यह एजेंसी सरकार के कामकाज और उसकी छवि को सकारात्मक अंदाज में पेश करेगी।

सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि अपने बारे में सकारात्मक खबरों के लिए विभिन्न मीडिया संस्थानों को विज्ञापन के रूप में मोटी रकम देने के बावजूद उनकी सरकार का नकारात्मक प्रचार हो रहा है।

अब तक सरकार का जो भरी नकारात्मक प्रचार होता रहा है, उसका प्रत्युत्तर देने के लिए एजेंसी की सेवाएं लेने का विचार सामने आया है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके की जनता को प्रबुद्धजनों से सरकार को सकारात्मक फीडबैक प्राप्त हो सके।

कांग्रेस पदाधिकारियों के अनुसार यद्यपि सरकार के पास सरकार की उपलब्धियों और कार्यों को रेखांकित करने के लिए अपने जनसंपर्क निदेशालय के अधिकारी हैं। फिर भी गहलोत सरकार ने एक विशाल प्रचार का बयान का विकल्प चुना है, जबकि राज्य धन की भारी कमी से जूझ रहा है।

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यह जनसंपर्क एजेंसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के साक्षात्कारों को सरल एवं कारगर बनाकर राज्य सरकार को नया रूप देने के लिए तमाम सकारात्मक खबरों का प्रचार करेगी।

भारतीय जनता पार्टी प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा है कि कांग्रेस सरकार के कामकाज का रिकार्ड इतना खराब है कि जनसंपर्क एजेंसी भी उनका मेकओवर करने में मदद नहीं कर सकती है। राज्य में बढ़ती अराजकता अपराधों की बढ़ती दर और सभी योजनाओं की दयनीय स्थिति को देखिए यह लोग जो कह रहे हैं, जनता उस पर नजर रखे हुए है। जनसंपर्क एजेंसी उन्हें जनाक्रोश से नहीं बचा पाएगी।

सूत्रों का कहना है कि अशोक गहलोत दिल्ली के नेतृत्व किया जबरदस्त दबाव में देखे जा रहे हैं। जिसका मानना है कि यह काम नहीं कर पा रहे हैं तथा परिणाम भी नहीं दे पा रहे हैं।

अशोक गहलोत की दूसरी समस्या यह है सचिन पायलट! जिनके साथ तुलना और उनको नियंत्रित करने में उनकी अधिकांश ऊर्जा खर्च हो रही है। पीसीसी अध्यक्ष के बदलने और उनका प्रभाव कम करने के लिए और एक उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने के हेतु दिल्ली के साथ लॉबिंग करने में गहलोत का समय जाया हो रहा है।

गहलोत यह सुनिश्चित करने में व्यस्त रहते हैं कि सचिन पायलट एक प्रभावी मंत्री के रूप में काम नहीं कर पाए तथा उपमुख्यमंत्री पर नजर रखने और उनकी सभी गतिविधियों की जानकारी मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचने के लिए वरिष्ठ अफसर तैनात कर रखे हैं।

ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या जनसंपर्क एजेंसी उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के मंत्रालय के बारे में भी सकारात्मक खबरें देगी, अन्यथा यह सिर्फ मुख्यमंत्री और उनके पसंदीदा मंत्रियों के लिए होगी, जिनमें से कइयों को नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट के रूप में देखा जाता है।

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