पंचायती राज की जन्मस्थली नागौर में बन रहे हैं नए राजनीतिक समीकरण, सत्ता की धुरी में इस हैं बेनीवाल बंधु

hanuman beniwal RLP
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2 अक्टूबर 1965 को जब भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नागौर से पंचायती राज की शुरुआत की थी, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि नागौर आने वाले वक्त में सबसे बड़ी राजनीतिक धुरी बन जायेगा।

कभी मिर्धा परिवार की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत माने जाने वाले नागौर जिला आजकल बेनीवाल बंधुओं (हनुमान-नारायण) की राजनीति का गढ़ बन गया है। चूरू, सीकर, अजमेर, जोधपुर और बाड़मेर भी यहीं की सियासत से प्रभावित होते हैं। कह सकते हैं कि पूरा पश्चिमी राजस्थान बेनीवाल बधुओं की गिरफ्त में आता जा रहा है।

कभी मिर्धाओं के नाम से नागौर की पहचान होती थी, किन्तु आज यहां पर मिर्धा परिवार को पूछने वाला भी नहीं है। लगातार तीन हार झेलने के बाद पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा और उनके भाई पूर्व विधायक हरेंद्र मिर्धा अब यहां की राजनीति में बीते जमाने के हो चले हैं।

नागौर से संचालित होने वाले छोटे से छोटे और बड़े से बड़े राजनैतिक परिवर्तन के बीच में अब हनुमान बेनीवाल ही रहते हैं। किसी ज़माने में हनुमान बेनीवाल मिर्धा परिवार की गाड़ी चलाते थे और उनके यहां पर कार्यकर्ता के तौर पर दरी उठाया करते थे। यह दावा खुद ज्योति मिर्धा ही करतीं हैं।

जबकि हनुमान बेनीवाल के पिता रामदेव बेनीवाल यहां की एक विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं। उनका 1999 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले निधन हो गया था। उनके बाद विरासत संभालने आगे बढ़े हनुमान बेनीवाल की राह में कांटे बिछे थे, जिनसे बचना और उनको साफ़ करना उन्हीं का काम था।

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साल 2003 में हनुमान बेनीवाल पहली बार निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। पांच साल बाद बेनीवाल ने भाजपा के टिकट पर 2008 में दूसरी बार चुनाव लड़ा और जीत का स्वाद चखा।

फिर 2013, 2018 और 2019 का लोकसभा चुनाव और 2019 में ही छोटे भाई नारायण बेनीवाल को खींवसर से विधायक बनाकर हनुमान ने मिर्धा परिवार को नागौर की राजनीति में इतिहास बना डाला।

आज राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के बैनर तले सांसद हनुमान बेनीवाल ने अपनी सेना का गठन कर लिया है। राजस्थान में रालोपा पहली क्षेत्रीय पार्टी बनी है, जबकि अब तक यहां पर भाजपा और कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है।