विपक्ष की भूमिका में कमजोर भाजपा, या कहें पूरी तरह से विफल भाजपा?

satish poonia bjp
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रामगोपाल जाट

राज्य की कांग्रेस सरकार को गठित हुए महज 14 महीने ही हुए हैं, किंतु जिस तरह से अपराधों का ग्राफ आसमान पर चढ़ा है, खासकर दलित समुदाय के युवाओं और युवतियों पर अत्यारों की तादात में बढोतरी हुई है, वह वाकई में चौंकाने वाला है।

किंतु सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार की नाकामियों को लेकर विपक्ष के नाते हमलावर रहने के लिए जिम्मेदार भारतीय जनता पार्टी भी अपने कार्यों में पूरी तरह से नाकाम नजर आ रही है।

भाजपा की तरफ से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कभी भी ठीक उसी तरह कभी सड़क पर नहीं आई हैं, जिस तरह से विपक्ष में रहते हुए अशोक गहलोत सड़क पर संघर्ष करने के लिए नहीं आया करते थे। तब भी विपक्ष की सारी जिम्मेदारी निभाने के लिए अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट अकेले ही वसुंधरा राजे सरकार की नाकामियों को लेकर हमलावर रहते थे।

पायलट सड़क पर उतरते थे और एक—दो बार तो पुलिस के डंडे भी खाए थे, लेकिन नाकाम सरकार बताने के बाद भी भाजपा की तरफ से अभी तक ऐसा उग्र प्रदर्शन नहीं किया गया है कि जनता के लिए सड़क पर कोहराम मचाया जा सके।

यही कारण है कि गहलोत सरकार की तमाम नाकामियों के बाद भी उसको कोई समस्या नहीं हो रही है, जबकि वसुंधरा राजे सरकार में 163 विधायकों के मुकाबले अशोक गहलोत सरकार के पास महज 106 विधायक हैं।

भाजपा की तरफ से अध्यक्ष बने सतीश पूनियां अपनी नई टीम की अभी तक घोषणा नहीं कर पाए हैं और पूर्व मंत्री और कुछ नए विधायक, जैसे अशोक लाहोटी खुद को ही बड़ा नेता मानते हैं, तो ऐसे में पूनियां इनको नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। कई मर्तबा ऐसा लगता है कि सतीश पूनियां की लगाम इन पूर्व मंत्री—विधायकों पर कसी नहीं गई है।

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एक दिन पहले ही जिस तरह से सांगानेर के विधायक अशोक लाहोटी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की शान में सार्वजनिक मंच से कसीदे गढ़े हैं, उससे साफ जाहिर है कि सदन में भले ही वो अखबार में छपने के लिए बोलते हों, किंतु उनको सरकार से कोई तकलीफ नहीं है।

खासकर कुछ दिन पहले ही परिवहन विभाग में उजागर हुए करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार के बाद भी लाहोटी ने अशोक गहलोत को भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस का मुख्यमंत्री करार देकर अपनी ही पार्टी की भिद पिटवा ली है। लाहोटी का यह बयान पूर्व सीएम वसुंधरा राजे पर भी परोक्ष हमले के तौर पर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग लाहोटी को गहलोत सरकार में मंत्री बनाए जाने के मीम्स बनाकर मजे ले रहे हैं।

सरकार के गठन के कुछ महीने बाद लोकसभा चुनाव के वक्त अलवर के थानागाजी में दलित परिवार की एक विवाहित लड़की के साथ हुए गैंगरेप और वीडियो वायरल करने की घटना से अपराधों की शुरुआत ने विकराल रुप धारण कर लिया था, वह बदस्तूर जारी है।

बावजूद इसके आजतक भाजपा ने सड़क पर उतरकर कोई आंदोलन कर बड़ा संघर्ष नहीं किया है, बल्कि भाजपा से काफी छोटा दल होने के बावजूद हनुमान बेनीवाल की रालोपा ने ज्यादा उग्र आंदोलन कर अशोक गहलोत सरकार की नाक में दम कर रखा है।

अध्यक्ष होने के बाद भी सतीश पूनियां ने अभी तक एक भी बड़े या छोटे आंदोलन को सड़क से सदन तक ले जाने में सफलता नहीं पाई है। यह बात सही है कि उन्होंने हर बात को अपने फेसबुक और ट्वीटर पर शेयर की और सरकार के खिलाफ ‘हल्ला’ भी यहीं पर बोला, किंतु सोचनीय बात यह है कि सरकार की तमाम नाकामियों के बाद भी वो अपनी टीम को लेकर सड़क पर अबतक ‘हल्ला’ नहीं बोल पाए हैं। विपक्षी पार्टी होने के कारण जनता के लिए यह काफी पी​ड़ादायी है।

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घटनाओं की बात की जाए तो अलवर की घटना के बाद सवाई माधोपुर में दलित लड़की के साथ कुकर्म, अब नागौर में दलित लड़कों के लिए गुप्तांगों में पेट्रोल डालने, बाड़मेर में अल्पसंख्यक युवक के गुप्तांग में सरिया घुसेड़ना, जैसलमेर में मारपीट, वीडियो वायरल करना और जयपुर में एक दलित महिला के साथ मारपीट, जयपुर में छात्राओं के साथ मुस्लिम समाज के आरोपी युवकों द्वारा आए दिन छेड़खानी बाद भी एक मुस्लिम विधायक के दबाव में कानून को पंगु बनाने की प्रक्रिया ने सरकार और पुलिस प्रशासन के तमाम दावों की पोल खोल रखी है।

लेकिन जिस तरह से भाजपा मौन है, उससे यही लगता है सरकार और विपक्ष में ‘पेचअप’ हो गया है। रालोपा के विधायक नारायण बेनीवाल सरकार के खिलाफ सदन के बाहर धरने पर बैठने के बाद बीते तीन दिन से नागौर उपखंड़ पर धरने पर बैठे हैं, जबकि सांसद हनुमान बेनीवाल के आव्हान पर रविवार को सभी जिला मुख्यालयों पर आंशिक धरने के बाद ज्ञापन देने का काम किया गया है। दूसरी तरफ सतीश पूनियां अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की अगुवानी में दो दिन से लगे हुए हैं।

विपक्ष का दायित्व होता है कि सड़क से सदन तक जनता की आवाज बने और बेखबर सरकार को खबर ले, उसको व्यवस्था बनाने के लिए मजबूर कर दे। इस मामले में जहां पूर्व सीएम वसुंधरा राजे ‘महल’ से बाहर नहीं निकलकर ‘प्रमुख विपक्षी’ के नाते पूरी तरह से नाकाम रही हैं, तो अध्यक्ष होने के बावजूद सतीश पूनियां अभी तक सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन नहीं कर पाए हैं।

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यह बात सही है कि सदन में वो अच्छा बोलते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी अच्छा बोलते हैं, किंतु आजतक भाजपा ने अपने दम पर सदन की कार्यवाही को स्थगित करवाने में कामयाबी नहीं पाई है, बल्कि विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी कई बार उनके साथ होकर मंत्रियों को ही डांट पिलाई है।

सत्तापक्ष के लिए जहां अनुकूल माहोल बनाकर पांच साल का वक्त निकालना होता है, वहीं विपक्ष के नाते सरकार की हर नाकामी और हर गलत काम पर उसको नींद से जगाना व जनता के दुख दर्द में साथ निभाना होता है।

किंतु बड़े आश्चर्य का विषय है कि कई धड़ों में बंटी सी नजर आ रही भाजपा वर्तमान में विपक्ष के हर मोर्चे पर पूरी तरह से विफल नजर आ रही है। भाजपा की यही विफलता रालोपा के लिए पक्ष की बात बनती जा रही है। क्योंकि जनता को सरकार की नाकामियों पर साथ देने वाला दल ही पसंद आता है।