हनुमान बेनीवाल की नजर कांग्रेस के वोटर्स पर है, आम आदमी पार्टी की तरह बना सकते हैं सरकार!

BJP-RLP-satish poonia hanuman beniwal
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रामगोपाल जाट

तीन बार विधायक और एक बार सांसद बनने के बाद अब हनुमान बेनीवाल की नजर सीधी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। राजस्थान में अब तक दो ही पार्टियां शासन करती रही हैं, किंतु पहली बार समी​करण नई दिशा में जाते हुए नजर आ रहे हैं। भाजपा—कांग्रेस के पांच—पांच साल के शासन ने जनता का विश्वास उठ सा गया है, खासकर राजे—गहलोत की जोडी से। इसी का परिणाम है कि तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट चुनाव के चार साल पहले सुनाई देने लगी है।

जिसकी सबसे मजबूत कड़ी बनकर सामने आ रहे हैं हनुमान बेनीवाल और उनकी पार्टी रालोपा। रालोपा को पिछले साल ही राज्य की पहली क्षेत्रिय पार्टी बनने का गौरव हासिल हुआ था। इसके बाद बेनीवाल ने पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा की और सभी पदाधिकारियों को टास्क देकर मैदान में उतारा हुआ है।

आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली में लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद बेनीवाल का विश्वास और मजबूत हुआ है। वह भी तब, जबकि राज्य में कांग्रेस सरकार को केवल 14 माह का समय गुजरा है, तभी जनता त्राहिमाम—त्राहिमाम कर रही है। इसके चलते बेनीवाल को राज्य में मौका मिलता हुआ नजर आ रहा है।

क्या हैं समीकरण, जिनकी संभावना है?
पहला समीकरण:— अगर भाजपा ने रालोपा को गठबंधन करने के लिए तैयार किया तो रालोपा के लिए कम से कम 20 से 30 सीटें चुनाव लड़ने के लिए छोड़नी होगी। भाजपा को अधिकतम 170—180 सीटों पर चुनाव लड़ना होगा। रालोपा वो सीटें लेगी, जहां पर उसका जनाधार है। जिनमें नागौर, जोधपुर, बाड़मेर, पाली, बीकानेर जैसे जिले शामिल हैं। इस गठबंधन के बाद कम से कम 15—20 सीटें जीतना रालोपा के लिए बेहद जरुरी हो जाएगी, जो उसको गृहमंत्री जैसा पद दिलाने में कामयाब होगा।

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दूसरा समीकरण:—यदि भाजपा के साथ गठबंधन नहीं हुआ तो निश्चित तौर पर रालोपा के लिए आम आदमी पार्टी गठबंधन की पहली प्राथमिकता होगी। केजरीवाल का डंका दिल्ली में बजा है, किंतु राजस्थान जैसे राज्य में अभी उसका कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में उसके लिए रालोपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ना सुनहरा अवसर हो सकता है। ऐसी स्थिति में रालोपा जहां सीकर, नागौर, चूरू, अजमेर, पाली, जोधपुर, राजसमंद, बाड़मेर, बीकानेर समेत आधे राजस्थान में मजबूत नजर आ रही है, वहीं जयपुर, दौसा, अलवर, टोंक जैसे जिलों में दोनों दल मिलकर चुनाव में भाजपा—कांग्रेस को मात दे सकते हैं।

तीसरा समीकरण:— अगर इन दोनों के साथ तालमेल नहीं बैठता है तो बेनीवाल इस बार मायावती से हाथ मिला सकते हैं। क्योंकि बसपा के उम्मीदवार जीतते हैं, किंतु हर बार कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं। वैसे भी बेनीवाल की नजर कांग्रेस के वोटर्स, यानी एससी, एसटी, मुसलमानों और किसान वर्ग पर है, जो कभी कांग्रेस का कोर वोटर हुआ करता था। यह स्थिति पर त्रिकोणीय दिशा की तरह इंगित करती है।

चौथा समीकरण:— जब इनमें से किसी के साथ भी गठबंधन नहीं होगा, तो फिर रालोपा अकेले चुनाव लड़ेगी। ऐसे में रालोपा पूरे राजस्थान में चुनाव के लिए तैयार हो सकती है। जिसके लिए वह दक्षिण राजस्थान में अपना सिक्का जमाने वाली भारतीय ट्राइबल पार्टी के साथ गठबंधन कर भाजपा— कांग्रेस को चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती है।

परिणाम क्या होगा?
अगर इनमें से किसी भी समीकरण में रालोपा को ठीक ठाक कामयाबी मिल गई तो समझिए सत्ता के दरवाजे उसके लिए खुल जाएंगे। यह तो निश्चित ही है कि 2023 के चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर चली जाएगी। ऐसी स्थिति में भाजपा में अगर 2008 की तरह आपसी फूट रही, जो बनती हुई दिख भी रही है, तो जनता तीसरे मोर्चे की तरफ देखने से नहीं चूकेगी। परिणाम यह होगा कि रालोपा, बीटीपी, बसपा जैसे दल सत्ता की चाबी हो सकते हैं।

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यह भी हो सकता है
चर्चा है कि करीब एक साल पहले फिर से भाजपा में शामिल हुए सांसद किरोडीलाल मीणा भी खुद को भाजपा के साथ असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसे में 2023 में किरोडीलाल मीणा भी रालोपा में शामिल हो सकते हैं, तो निश्चित तौर पर माना जा सकता है कि कांग्रेस के सत्ता से बेदखल होने पर भी भाजपा को मौका मिलना आसान नहीं होगा।

बसपा और कांग्रेस का वोट ही रालोपा को मिल सकता है, भाजपा का नहीं
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि फिलहाल कांग्रेस और बसपा को वोट ही रालोपा को मिल सकता है, भाजपा का वोटर अभी भी अपने दल में पूरा भरोसा रखता है। कांग्रेस से उकता चुके लोग विकल्प की तलाश में रहत हैं, जो बसपा जैसे दलों के साथ चले जाते हैं। यही वोटर हैं, जिसपर रालोपा की टेढी नजर है।