राजस्थान विश्वविद्यालय बीते कुछ माह से आज दिन तक केवल 6 प्रोफेसरों के भरोसे चल रहा था। राज्य सरकार ने प्रमोशन के थ्रू प्रोफेसर्स के लिए अनुमति प्रदान कर दी है।

लेकिन इसके साथ ही राज्य सरकार ने यह भी कहा है कि जिन शिक्षकों का प्रमोशन कर प्रोफेसर बनाया जा रहा है, उसके बाद पढ़ने वाले आर्थिक भार को वहन करने के लिए भी राजस्थान विश्वविद्यालय को ही सक्षम होना पड़ेगा।

राजस्थान सरकार ने स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि जिन 272 एसोसिएट प्रोफेसर की प्रोफ़ेसर के लिए पदोन्नति होने वाली है, उससे पड़ने वाले आर्थिक भार के लिए राजस्थान विश्वविद्यालय को ही अपने ही संसाधनों से खर्च उठाना होगा।

उच्च शिक्षा मंत्री भंवर सिंह भाटी ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि 32 विभागों में अभी 28 विभाग ऐसे थे, जहां पर एक भी परमिशन नहीं था पूरे विश्वविद्यालय में केवल 6 प्रोफ़ेसर थे। शिक्षक लंबे समय से प्रमोशन की मांग कर रहे थे, लेकिन अनुमति नहीं मिल रही थी।

सरकार ने विवि को चार शर्तों के साथ पदोन्नति के लिए हामी भर दी है। इनमें 2010 के यूजीसी के नियम, नोशनल आधार पर करियर एडवांसमेंट स्कीम का लाभ, सरकार पर वित्तीय भार नहीं डालने और न्यायालयों में निर्णयाधीन के आधार पर सबकुछ तय होगा।

सरकार ने 2012 में शिक्षकों के असिस्टेंट प्रोफेसर से एसोसिएट प्रोफेसर बनने के 8 साल बाद यह महत्त्वपूर्ण फैसला लिया है। इसके लिए विवि 3-4 बार आवेदन मांग चुका है। अब विवि जल्द ही साक्षात्कार के लिए शिक्षकों को बुलाने की बात कह रहा है।

विवि के कुलपति प्रो. आरके कोठारी ने कहा है कि उच्च शिक्षा विभाग की तरफ से पत्र मिल चुका है, जल्द इसपर एक्शन लिया जाएगा।

सरकार के इस फैसले के बाद जहां एक और शिक्षकों में खुशी की लहर है, तो दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के सामने संकट यह है कि जो करोड़ों रुपये का वार्षिक आर्थिक भार पड़ेगा, उसको वहन करने के लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे?

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में ही राजस्थान विश्वविद्यालय आर्थिक बोझ के नीचे दबा हुआ है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की तरफ से समय-समय पर दिया जाने वाला फंड भी अभी रैंकिंग गिरने के कारण काफी कम हो गया है।

यह भी जानना बेहद जरूरी है कि 272 शिक्षकों के प्रोफेसर बनने के बाद कम से कम वार्षिक तौर पर कितने करोड़ का बाहर विश्वविद्यालय के ऊपर पड़ेगा और उसके बाद इस भार को सहन करने के लिए क्या विश्वविद्यालय तैयार है?

इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति प्रोफेसर आरके कोठारी के सामने नया संकट विश्वविद्यालय परिसर में ही उच्च स्तर पर चल रही एसओजी की जांच से सामना करना भी बेहद दिलचस्प हो गया है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा बीते दो-तीन साल के दौरान की गई भर्तियां और शिक्षक भर्ती को लेकर कुलपति प्रोफेसर आरके कोठारी आरोपों के घेरे में हैं, तो दूसरी तरफ एसओजी का कार्यालय विश्वविद्यालय परिसर में खुलने के कारण शिक्षकों की पदोन्नति हेतु साक्षात्कार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।