– जैसा की विधित है और इसी के तहत कई राज्य सरकारों और संस्थाओं द्वारा अक्षय ऊर्जा के उत्पादन में निवेश किया गया था परंतु उन्हें अप्रैल 2019 में से राज्य सरकार द्वारा बिजली उत्पादन के लिए भुगतान नहीं किया गया है।

राजस्थान हाईकोर्ट में रिन्यूएबल एनर्जी सर्टिफिकेट, यानी आरईसी स्कीम के तहत सोलर एवं विंडमिल फॉर्म निर्माण का करें। राज्य सरकार की बिजली को बिजली बेच रही संस्थाओं को बिजली उत्पादन के लिए भुगतान नहीं किए जाने के खिलाफ दायर याचिका में मंगलवार को अदालत ने सेंट्रल रेगुलेटरी इलेक्ट्रिसिटी कमिशन, यानी सीआरपीसी को पक्षकार बनाने का फैसला किया है और कमिश्नर को 1 सप्ताह में अपना जवाब पेश करने के आदेश भी दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश इंद्रजीत मोहंती और न्यायाधीश अशोक गोयल की खंडपीठ ने यह आदेश देते हुए एडीशनल एडवोकेट जनरल को निर्देश दिए हैं कि केंद्र सरकार को इस मामले में अदालत को सहायता देनी चाहिए, ताकि कोर्ट सही निर्णय पर पहुंच सके।

अदालत ने सभी ने याचिकाकर्ताओं को भी आदेश दिए हैं कि वे राज्य सरकार की 2019 में लाई गई एनर्जी पॉलिसी के खिलाफ आवेदन भी दायर करें। इसके साथ ही इस मामले में अगली तारीख 17 मार्च तय की गई है।

जैसा की विदित ही है आरईसी स्कीम 2010 में केंद्र सरकार के द्वारा लाई गई थी, ताकि भारत अपने अंतरराष्ट्रीय समझौतों की अनुपालना में कार्बन फुटप्रिंट यानी प्रदूषण कम करें और ऊर्जा में निवेश को बढ़ावा दें।

इस स्कीम के तहत कई राज्य सरकारों और सरकारी संस्थाओं को राजस्थान जैसे प्रदेश सोलर व विंड ऊर्जा बहुतायत में निवेश करने के लिए बनाया गया था इस स्कीम के तहत भारत में विभिन्न संस्थाएं व राज्य सरकारें अंतरराष्ट्रीय मामलों के तहत तय किए गए रिन्यूएबल एनर्जी पब्लिकेशन, यानी अक्षय ऊर्जा के तहत बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के अनुबंधों को पूरा कर सकती है।

गत सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता द्वारा अदालत को बताया गया कि आरईसी के स्कीम के तहत बिजली खरीदना राज्य सरकार को बहुत महंगा पड़ रहा है, क्योंकि टेंडर के जरिए विंड मिल और सोलर फार्म के बड़े प्लांट से राज्य सरकार कर्म से 2.55 और 2.80 प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद सकती है।

उन्होंने अदालत को आगे बताया कि आरईसी स्कीम के तहत बड़े रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादक राज्य सरकार को करीब 3.80 प्रति यूनिट की दर से बिजली बेचना चाहती है।

गौरतलब है कि राज्य सरकार ने अप्रैल 2019 से आरईसी स्कीम के तहत बने सोलर विंड मिल फार्म ली जा बिजली का भुगतान नहीं किया है। यहां पर यह भी गौर फरमाने योग्य है कि राजस्थान सरकार को थर्मल पावर प्लांट से बिजली खरीदने के प्रति यूनिट 4.5 रूपए की लागत आती है, जो स्कीम के तहत बने उत्पादों से भी ज्यादा है के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश हुए।

अफसरों से पूछा कि राज्य सरकार सरप्लस बिजली को वहां भेजती है और उसे सरकार को कितना मुनाफा होता है। वह मौजूद अधिकारियों ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार को साथ में डिमांड और सप्लाई के आधार पर कई महीने सर प्लस पावर मिलती है, जिसे राज्य सरकार दिल्ली में स्थित पावरएक्सचेंज में भेजती है।

उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार को वर्ष 2019 में पावरएक्सचेंज में बिजली बेचने से करीब 1000 करोड़ रुपए की राजस्व की प्राप्ति हुई थी। अदालत ने अधिकारी को कहा कि आज भी स्कीम के तहत बने पावर प्लांट राज्य के पावर ग्रिड डाल रहे हैं तो जाहिर है कि राज्य सरकार इन प्लांट द्वारा बनाएगी।

बिजली पावर एक्सचेंज में बेच रहे हैं। अदालत ने पूछा कि क्या राज्य सरकारी स्कीम के तहत बने पावर प्लांट का लेखा-जोखा रखा है, जिस पर महाधिवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार का स्कीम के तहत बने पावर प्लांट से बिजली खरीदने का अप्रैल 2019 में खत्म हो गया था और उसका नवीनीकरण नहीं किया गया है।

उन्होंने आगे कहा कि इन सभी संस्थाओं को ओपन मार्केट में निवेश के लिए पावर प्लांट बनाकर राज्य सरकार को बिजली बेचने चाहिए, ताकि राज्य सरकार को कम दाम पर बिजली मिल सके अदालत ने महाधिवक्ता से पूछा कि क्यों राज्य सरकार थर्मल पावर प्लांट पावर प्लांट से बिजली नहीं खरीदी है।

प्रवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार काफी ज्यादा मात्रा में थर्मल पावर प्लांट से बिजली खरीदी है, जिसे स्कीम के तहत बने पावर प्लांट पूरा नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि सोलर तथा विंड एनर्जी से सालभर निरंतर एक ही मात्रा में बिजली प्राप्त नहीं होती है और अगर राज्य सरकार थर्मल पावर प्लांट से बिजली नहीं खरीदे तो उसी एनर्जी सरप्लस स्टेट का दर्जा खोना पड़ेगा।

आयोग ने भी इन सभी पार्टियों को कहा था कि राज्य सरकार हर वर्ष इन्हीं पार्टियों से बिजली खरीदने के लिए नहीं है। इसलिए इन पार्टियों को निविदा के मार्फत ही बिजली सरकार को भेजनी होगी, वहीं कोर्ट में मौखिक टिप्पणी ने कहा कि स्कीम को यूं ही बंद नहीं कर सकता और न ही बिजली खरीदने की कोर्ट ने अपने आदेश में सभी याचिकाकर्ताओं को राज्य सरकार द्वारा 2019 में एनर्जी पॉलिसी के उन धाराओं को हटाए जाने के खिलाफ आवेदन दायर करने की छूट दी है।

जिसके तहत राज्य सरकार को आरईसी स्कीम के तहत एक निरंतर दर पर बिजली खरीदने का आश्वासन दिया था। राज्य सरकार के पक्ष को समझाते हुए एक सूत्र ने कहा कि आई सी स्कीम के दो पहलू हैं। पहला तो एनर्जी सर्टिफिकेट जिसकी प्रति यूनिट होती है और दूसरा होती है ने कहा कि राज्य सरकार की 2 रुपये प्रति यूनिट देने को तैयार है, परंतु इन संस्थाओं को पूल रेट कम करना होगा, ताकि राज्य सरकार को कुछ फायदा पहुंचे।

उन्होंने कहा कि यह दर 2.76 रुपये प्रति यूनिट को होगी। गौरतलब है कि आयोग ने सभी आरईसी स्कीम के तहत बने प्लांट को उसके द्वारा मांगी गई दर 3.,80 प्रति यूनिट से कम थी।