झूठा मामला: दो महिलाओं से वसूले 2 लाख रुपए

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कि महिला के साथ दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता को ₹100000 की सहायता राशि दी जाती है, लेकिन कई बार पीड़ित पक्षद्रोही हो जाती है। ऐसी स्थिति में क्या पीड़िता से ₹100000 की वसूली होनी चाहिए?

इसी तरह के 2 प्रकरण सामने आए हैं। झुंझुनू की अदालत में जहां पर अदालत ने कलेक्टर को आदेश दिया है कि दोनों महिलाओं से ₹200000 की वसूली की जाए।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून के मुताबिक किसी महिला को अपमानित करने या सामाजिक बहिष्कार की धमकी दिए जाने पर सरकार की तरफ से तुरन्त ₹100000 की सहायता राशि मुहैया करवाई जाती है।

इतना ही नहीं, आरोपी के द्वारा ऐसी महिला का पीछा किए जाने पर उसको ₹200000 की सहायता राशि दिए जाने का प्रावधान है, किंतु पीड़ित कई बार पक्षद्रोही हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में उसको दी गई सहायता राशि वापस ली जा सकती है।

सामाजिक विश्लेषक राजन चौधरी का कहना है कि इस तरह के मामलों में पैसा वापस होना ही चाहिए, क्योंकि जब पीड़ित पक्षद्रोही हो जाती है तो इसका मतलब यह है कि सामने वाले व्यक्ति ने उसको ज्यादा पैसा दे दिया है या दुष्कर्म हुआ ही नहीं, इसलिए वह अपने बयानों से पलट रही है।

इतना ही नहीं है राजन चौधरी का कहना है कि इस तरह के मामलों में इंटरेस्ट के साथ पैसा वापस लेना चाहिए, ताकि इस तरह के प्रकरण में महिला पक्षद्रोही नहीं हो और अगर हो जाती है तो कम से कम सरकारी खजाने की लूट नहीं हो।

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अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के महिला के साथ दुष्कर्म के मामले में ₹400000 की सहायता राशि दिए जाने का प्रावधान है, जिसका मामला दर्ज होते ही उसको 25% राशि तुरंत प्रभाव से दे दी जाती है।

किंतु उसी पीड़ित महिला के द्वारा बयान पलटने और मामला झूठा पाए जाने के बाद यह पैसा वापस लिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है, जिसके चलते सरकारी खजाने को चपत लग रही है।

लोक अभियोजक लोकेंद्र सिंह शेखावत का इस मामले में मानना स्पष्ट है कि जब महिला पलट जाती है तो इसका मतलब यह है कि उसके साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ है।

झुंझुनूं के जिला न्यायालय में इसी तरह के दो मामलों में कोर्ट ने जिला कलेक्टर को दोनों पीड़ित महिलाओं से रुपए वापस वसूलने के आदेश दिए।

लोकेंद्र सिंह शेखावत बताते हैं कि महिला इसलिए पलट गई, क्योंकि उसका कहना है कि किसी ने कह दिया कि उसके घर में कोई घुस गया और इस आधार पर उसने f.i.r. करवा दी थी।

इस तरह के प्रकरण में कोर्ट ने पाया कि पीड़ित महिला को ₹50000 दिए जा चुके थे, जबकि उसने अपने बयान बदल दिए। उसने कहा कि उसके साथ इस तरह का कोई घटना हुई ही नहीं, तो कोर्ट ने कलेक्टर को निर्देश दिया कि पीड़िता को जो पैसे दिए गए हैं, उसकी वसूली की जाए।

इस तरह के मामलों में चालान पेश होने तक पीड़िता को तय राशि के 75 फ़ीसदी हिस्से दे दिए जाते हैं, जिसके चलते मामला अटक जाता है। क्योंकि जब महिला पलट जाती है तो इस पैसे की रिकवरी के कोई प्रावधान नहीं है।

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झुंझुनू की अदालत में एससी एसटी आयोग को लिखा है कि इस तरह से यदि कोई महिला अपने किए गए मुकदमे से मुकर जाती है तो उससे वसूली करने के लिए नियम होने चाहिए।