—पुलवामा के शहीद परिवार की दास्तां:- दुःख दर्द में साथ देंना तो दूर वादे तक पूरे नहीं कर पा रही सरकार
केजे श्रीवत्सन (वरिष्ठ पत्रकार)

आज से ठीक एक साल पहले, 14 फरवरी 2019 को कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों से भरे ट्रकों के जिस काफिले पर आतंकी हमले में जो 40 जवान शाहिद हुए थे, उनमे जयपुर के पास शाहपुरा के रहने वाले जवान रोहिताश लांबा भी शामिल थे।

उनकी बदनसीबी यह थी, कि उस घटना के तीन महीने पहले ही उनके घर में बेटे के जन्म के रूप में खुशियां आई थीं, लेकिन जब वो अपने बेटे का चेहरा भी सही तरीके से नहीं देख पाए थे। आज इस घटना को पूरा एक साल होने हो गया है।

परिवार के लोगों को इस बात का मलाल है कि रोहिताश्व के शहीद होने के बाद परिवार के दुःख—दर्द का ख्याल रखने का दंभ भरने वाली सरकारें या उसके नुमाईंदों ने अब उन्हें नज़रअंदाज ही कर दिया है। देखिये शहीद रोहिताश्व के परिवार की व्यथा—

शहीद रोहिताश्व लांबा और उनकी नवजात बेटी (फाइल फोटो)
शहीद रोहिताश्व लांबा और उनकी नवजात बेटी (फाइल फोटो)

रोहिताश्व लांबा का बेटा, 14 महीने का ध्रुव, जो अपने घर के मुख्य द्वार पर लगे अपने शहीद पिता की तस्वीर को आज भी हर रोज प्रणाम करता है। भले ही ध्रुव को अभी दुनियादारी के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है, लेकिन हर रोज अपने शहीद पिता रोहिताश्व लाम्बा की तस्वीर देखकर दादी से पूछ ही लेता है की पापा कहा हैं?

पुलवामा की घटना को एक साल हो गया है, लेकिन उस घटना में शहीद होने वाले सभी शहीदों के परिवारों की तस्वीर कुछ ऐसी ही हैं। घटना के बाद जयपुर के पास शाहपुरा के गोबिंदपुरा बासडी गांव में उसके घर में रोहिताश्व को श्रदांजलि देने कई बड़े नेता, मंत्री और अधिकारी आये। सब ने शहीद के परिवार को अपनी ओर से सहायता देने का वादा भी किया, लेकिन मानों अब सबने इस ओर ना आना ही मुनासिब समझ लिया है।

शहीद रोहिताश्व की मां घीसी देवी कहतीं हैं, ‘मेरे बेटे ने कहा था कि वह घर के चिराग के साथ जिंदगी के कुछ बेहतरीन पल गुजारने जल्दी ही जरूर वापस आएगा, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था।’

आज भी उसका बेटा अपने पिता की तस्वीर को देखकर हमेशा हम सब से यह पूछ लेता है कि पापा कहां हैं, कब आएंगे? और हम उसको कुछ भी जवाब नहीं दे पाते। हम इस नन्हें फरिश्ते में ही अपने बेटे के चेहरे को देख लेते हैं।’

रोहिताश्व लांबा के शहीद होने के बाद जब उसका पार्थिव शरीर उनके गांव लाया गया था, तो सब लोग मौजूद थे और बढ़—चढ़कर परिवार के दुख—दर्द में हमेशा साथ रहने की कसमें खा रहे थे। कई मंत्री आए, कई अधिकारी भी आए।

उस वक्त सब ने जोर-शोर से ना केवल परिवार की, बल्कि शहीद के इस पूरे गांव की कायाकल्प का जोर—शोर से वादा किया था। लेकिन सरकार की तरह सरकार के नुमाइंदों के वादे भी शायद हकीकत के धरातल से कोसों दूर ही हैं।

दूसरे बड़े वादों को तो चलिए छोडिये, इस शहीद के घर से गुजरने वाली गली-मोहल्ले में पक्की सडक बनाने का वादा भी मंत्री और अधिकारीयों ने किया था। क्योंकि जो भी शहीद को श्रद्धांजलि यहां देने आए थे तो शायद उनकी लक्ज़री गाड़ियों में भी बैठकर गांव के उबड़ खाबड़ रास्तों से यहां तक आने में परेशानी हो तो हुई होगी।

आम जनता द्वारा इलाके मे पक्की सड़क बनाने की बात के लिए कई बार सरकारी दफ्तरों और मंत्रियों के घरों तक चक्कर लगाने के बाद भी मंत्रियों के कानों पर जूं नहीं रेंगी।

लेकिन शहादत को नमन करने इस गांव में आने के दौरान जब परेशानी खुद ही इस कच्ची सड़क के चलते लग्जरी गाड़ी में बैठे होने के बावजूद भी परेशानियां झेलनी पड़ी तो उन्होंने भी जोश जोश में शायद यह यह ऐलान कर दिया कि जल्दी ही इलाके में पक्की सड़क भी बन जाएगी।

पुलवामा में हमले के बाद बदहाल सड़क और इनसेट में रोहिताश्व लांबा की फोटो
पुलवामा में हमले के बाद बदहाल सड़क और इनसेट में रोहिताश्व लांबा की फोटो

लेकिन, मानों रात गई, बात गई! कुछ ऐसा ही यहां पर होता नजर आ रहा है। उस वादे को अब एक साल पूरा हो गया है, किंतु ना तो यहां पर कंक्रीट की पक्की सड़क दिखी और ना ही उसके बारे में अब कोई मंत्री या अधिकारी बात करने को तैयार है।

आज एक साल बाद भी कंकरीट डालकर सडक को आधा अधूरा तैयार कर छोड़ दिया है, क्योंकि ना तो किसी मंत्री के पास यहां आकर अपने वादों की हकीकत को जानने की फुर्सत है और ना ही अधिकारियों के पास यहां आकर शहीद के परिवार की सुध लेने की फुर्सत।

शायद मोटी तनख्वाह लेने वाले संबंधित विभाग के सरकारी अधिकारी भी यह बात अच्छी तरह समझ चुके हैं, कि शहीद तो अब इस दुनिया से ही रुख्सत हो चुका है, ऐसे में भला मंत्री इलाके में दुबारा वापस क्यों आएंगे?

सरकारी वादों की हकीकत की पोल तो उस वक़्त खुल जाती है, जब शहीद के नाम पर बनने वाले स्मारक पर नज़र जाती है। स्मारक को बनाने का मकसद युवाओं के शहीद के प्रति सम्मान और देशभक्ति के लिए उन्हें प्रेरित करने का विचार था, लेकिन यहां का नज़ारा बताने के लिए काफी है, कि स्मारक स्थल का विकास के वादे आज भी वादे ही हैं, ना दीवार बनी, ना पानी आया पेड़ों की हरियाली लाने के लिए।

यहां तक की शहीद की पत्नी और परिवार के लोग ही यहां हर रोज आकर साफ़—सफाई कर जाते हैं। भले ही इस घटना को एक साल हो गया हो, लेकिन रोहिताश्व के घर आज भी मानों मातम ही पसरा हुआ है।

उनकी पत्नी मंजूदेवी का रो—रोकर बुरा हाल है। क्योंकि घटना के करीब एक साल पहले ही 2017 में ही रोहिताश्व की शादी भी हुई थी। आतंकी हमले में शहीद हुए रोहिताश लांबा घटना के दो दिन पहले ही घर से ड्यूटी पर गए थे।

सरकारी रवैये से परेशान परिवार की अब एक ही मांग है, कि उन्हें वो सम्मान मिले, जिसके वो हकदार हैं। रोहिताश्व के भाई जितेन्द्र पढाई के साथ खेतों में काम करके परिवार का खर्च चला रहे हैं। सरकार की ओर से परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा भी हुआ, ताकि परिवार को आर्थिक परेशानी से दूर रखा जा सके।

लेकिन सरकारी अधिकारीयों के चक्कर लगाने के बाद उनके रवैये से परेशान होकर अब यह भाई खुद उन्हें मिली 50 लाख की आर्थिक सहायता लौटाने की पेशकश कर रहे हैं।

मंत्रियों और मुख्यमंत्री के दरवाजे तक दसियों बार चक्कर लगा चुके जितेंद्र को अब सरकारी कागज पर लिखकर साफ शब्दों में राज्य सरकार ने कह दिया है कि उसे नौकरी दिया जाना संभव ही नही है।

ऐसे में परिवार के सभी सदस्य चाहते हैं कि एक मुश्त राशि की बजाय जीवन चलाने के लिए रोजगार मिल जाए, ताकि परिवार का सम्मान बरक़रार रह सके। लेकिन सरकारी रुसवाई ने इस परिवार की रुलाई फिर से फूटने पर मजबूर कर दी है।

यह दास्तां अकेले शायद रोहिताश्व लाम्बा के परिजनों की नहीं होगी, कई और शहीदों के परिजन भी इसी तरह से सरकारी लापरवाही का नतीजा भुगत रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही है, कि शहीदों के लिए सरकार बड़े बड़े दावे तो कर देती है, लेकिन जब वादे पूरे करने का वक़्त आता है तो इनकी फाईलों पर भी अधिकारी कुंडली मारकर बैठ ही जाते हैं।