सुजानगढ़ रालोपा ने हराई, सहाड़ा में सहानुभूति के आगे भाजपा पस्त हुई

-उपचुनाव में चला सहानुभूति कार्ड, दिवंगत विधायकों के परिजन जीते

जयपुर।

प्रदेश की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे लगभग वही आये हैं, जिनका आंकलन किया जा रहा था। सहाड़ा और सुजानगढ़ में जहां सहानुभूति की लहर पर सवार कांग्रेस को जीत मिली तो राजसमंद में उम्मीद से कम, लेकिन भाजपा ने जीत दर्ज की है।

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में जीती कांग्रेस अपनी दोनों सीट बचाने में कामयाब रही। इधर, भाजपा ने भी राजसमंद सीट पर किरण माहेश्वरी के काम और सहानुभूति के सहारे जीत को बरकरार रखा है।

इस विधानसभा की 3 सीटों पर हुए उपचुनाव चुनाव परिणामों पर नजर डाली जाए तो दोनों ही प्रमुख दलों का सहानुभूति कार्ड 100% चला है। भीलवाड़ा की सहाड़ा से दिवंगत विधायक कैलाश त्रिवेदी की पत्नी गायत्री देवी, चुरू जिले की सुजानगढ़ से कांग्रेस के दिवंगत विधायक मास्टर भंवर लाल के बेटे मनोज मेघवाल और राजसमंद से दिवंगत भाजपा विधायक किरन माहेश्वरी की बेटी दीप्ति माहेश्वरी ने जीत दर्ज की है।

प्रदेश की सियासत में पहली बार ऐसा हुआ है, जब सहानुभूति की लहर में तीनों प्रत्याशी जीते हैं। इससे पहले 19 उपचुनाव में 8 बार कांग्रेस, 8 बार भाजपा, 2 बार जनता पार्टी और एक बार एनसीजे ने चुनाव जीता। किन्तु हर बार दिवंगत विधायकों के परिजनों को जनता ने पूरी तरह से नकारा है।

माना जा रहा है कि इन सीटों पर हार के लिए भाजपा में चल रही गुटबाजी और बड़े नेताओं की चुनाव प्रचार से दूरी को वजह माना जा रहा है। हालांकि, राजनीति के कुछ विशेषज्ञ इस बात को सिरे से खारिज करते हैं, उनका कहना है कि सहानुभूति और सरकार होने का फायदा सत्तारूढ़ दल को मिला है।

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सवाल ये भी उठ रहे हैं कि जब स्टार प्रचारक भी बनाए गए तो आखिर ये चुनाव प्रचार मे गए क्यों नहीं? जबकि, कोरोना के कारण बड़े नेता केवल भाजपा के ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के भी खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट भी इन चुनाव से लगभग दूर ही रहे हैं।

भाजपा ने पश्चिमी बंगाल, पुडुचेरी, असम के चुनाव में ज्यादातर नेताओं को भेज दिया गया, जिसकी वजह से बड़े नेता चुनाव प्रचार में नहीं जुट पाए। दो सीटों पर भाजपा की हार व कांग्रेस की जीत में इसको भी कारण माना जा रहा है।

इसे हार की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। हालांकि, इन परिणामों से सीधे तौर पर किसी नेता की सेहत पर कोई असर नहीं होगा, किन्तु भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनियां विरोधी खेमे के लोगों को उम्मीद है कि आलाकमान उनसे से हार को लेकर स्पष्टीकरण मांगेंगे, जबकि पूनियां समर्थकों का मानना है कि पार्टी को लगभग वैसे ही परिणाम मिले हैं, जैसी उम्मीद थी, ऐसे में उपचुनाव की हार ज्यादा मायने नहीं रखती।

वैसी भी पार्टी को यहां कोई नुकसान नहीं हुआ है। राजसमंद सीट भाजपा के पास ही रही है। यह भी चर्चा है कि भाजपा ने 30 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की थी। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी शामिल थी, मगर राजे ने 18 साल में पहली बार प्रचार से दूरी बनाई और वो किसी भी सीट पर चुनाव प्रचार के लिए नहीं पहुंची।

राजे के अलावा सह प्रभारी भारती बेन, केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी, सांसद ओम माथुर, भूपेंद्र यादव, किरोड़ी लाल मीणा, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी, महामंत्री भजन लाल शर्मा, किशनपाल गुर्जर ने प्रचार में नहीं पहुंचे। इसी तरह प्रभारी अरुण सिंह, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत नामांकन वाले दिन तो मौजूद रहे, लेकिन बाद में प्रचार के दौरान नजर नहीं आए।

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भाजपा को सहाड़ा में सबसे बड़ी हार मिली है। ऐसे भाजपा ने रतन लाल जाट को प्रत्याशी बनाया जाना भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि यहां सर्वे में लादुलाल पितलिया का नाम सबसे आगे था, किन्तु राजसमंद में वैश्य समाज से दीप्ति माहेश्वरी को प्रत्याशी बनाने की वजह से पितलिया को टिकट नहीं दिया गया।

इतना ही नहीं, अपितु सहाड़ा सीट पर लादुलाल पितलिया का निर्दलीय नामांकन दाखिल करना और बाद में नामांकन वापस लेना। इस प्रकरण के बाद लगातार ऑडियो वायरल होना भी भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हुआ।

राजसमंद में पार्टी को जीत तो मिली, लेकिन यह भी माना जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया के महाराणा प्रताप को दिए बयान की वजह से राजसमंद में जीत का अंतर कम हुआ है।