वसुंधरा की केन्द्रीय नेतृत्व को खुली चुनौती, जेपी नड्‌डा की नसीहत भी दरकिनार?

-पार्टी के वरिष्ठ नेता सदन और चुनावों में लगे हैं, वसुंधरा दवाब की राजनीति से संगठन को धमकी दे रहीं। क्या यह वसुंधरा के नये दल के गठन की आहट है, ओमप्रकाश हुडला, राजेन्द्र गुढ़ा की मौजूदगी की भी चर्चा

जयपुर। राजस्थान में भाजपा के समानान्तर ‘टीम वसुंधरा राजे’ नाम से संगठन चल रहा है, इसकी जानकारी भाजपा नेतृत्व को भी है। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने 8 मार्च को जन्मदिन पर भरतपुर के आदिबद्रीनाथ धाम में जो संबोधन दिया।

उस एजेंडे में राजमाता विजयाराजे सिंधिया और अपने कार्यकाल की प्रसंशा के अलावा भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार की नीतियों का जिक्र तक नहीं किया गया था।

यह एक नोटिस करने वाली बात है, जिसको सियासी लोगों ने नोटिस किया भी है और भाजपा के कार्यकर्ता इसको लेकर चर्चा भी कर रहे हैं।

वसुंधरा राजे अपने भाषण में राज्य सरकार द्वारा विकास का मार्ग अवरुद्ध किए जाने का जिक्र तो करती हैं, किंतु मजेदार बात यह है कि राज्य के भाषण में एक बार भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम नहीं लिया जाता है।

इससे सवाल खड़ा यह होता है कि राज्य की सरकार के मुखिया का नाम लिए बगैर वसुंधरा राजे कैसे सरकार पर हमला कर सकती हैं?

दूसरी तरफ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, उपनेता राजेन्द्र राठौड़ पार्टी के कार्यक्रमों से लेकर विधानसभा तक मोदी सरकार की योजनाओं की जमकर प्रशंसा करते हुये राज्य की गहलोत सरकार को जनहित के मुद्दों पर घेरते हैं।


विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, उपनेता राजेन्द्र राठौड़ राज्य की गहलोत सरकार से भिड़ते हुये नजर आते हैं, जबकि वसुंधरा राजे सदन से ज्यादातर दूर रहती हैं, ना कोई मुद्दे उठाती हैं और कई अवसरों पर मुख्यमंत्री गहलोत की प्रशंसा करने से भी नहीं चूकती हैं।

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वैसे यहां पर जिक्र करना जरूरी होगा कि नागौर के सांसद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल पिछले 2 साल के दौरान कई बार अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के गठजोड़ का दावा करते रहे हैं।

बेनीवाल तो यहां तक कहते रहे हैं कि वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।


भाजपा सूत्रों का दावा है कि पंचायत एवं निकाय चुनावों से लेकर लगातार पार्टी को कमजोर करने के सियासी षड़यंत्र कर रहीं वसुंधरा विधानसभा में भी विधायक दल में चिट्ठी प्रकरण सहित अन्य मामलों में पार्टी को विभाजित करने की कोशिश कर इसी तरीके के संकेत दे चुकी हैं।


पूर्व सीएम राजे के जन्मदिन पर 8 मार्च को भरतपुर में महुआ के निर्दलीय विधायक ओमप्रकाश हुडला, बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर कांग्रेस में शामिल हुये उदयपुरवाटी विधायक राजेन्द्र गुढ़ा की मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है।


वसुंधरा राजे के जन्मदिन के कार्यक्रम में तमाम पूर्व विधायक एवं पूर्व सासंदों का पहुंचना सियासी गलियारों में एक राज्य में एक नये दल की गठन की आहट महसूस करवा रहा है। क्योंकि, वर्तमान सांसद एवं विधायकों में से 10-15 ही वहां मौजूद रहे, फिर भी राजे अपने जन्मदिन के संबोधनों से केन्द्रीय नेतृत्व को इशारों में खुली चुनौती भी दे रही हैं।

इधर, पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने पूरी ताकत पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में झोंक रखी है और राज्य के अन्य कई प्रमुख नेता उपचुनाव वाले क्षेत्रों में लगातार दौरे कर रहे हैं, जिनमें केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर पश्चिम बंगाल में, केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल पाण्डिचेरी में और प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां स्वयं प्रदेश के चार उपचुनाव क्षेत्रों सहित आदिवासी क्षेत्र के दौरे पर हैं।

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सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर वसुंधरा राजे जैसी कद्दावर नेता को भाजपा पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस्तेमाल क्यों नहीं कर रही है? सवाल यह भी उठता है कि क्या राजे खुद ही बंगाल चुनाव से दूर हैं?

भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि वसुंधरा गुट द्वारा दवाब डालकर लोगों को जबरन बुलाया जाना भी सवाल खड़े करता है। राजे के जन्मदिन कार्यक्रम का उद्देश्य क्या है, वह क्या दिखाना चाहती हैं?

पोस्टरों पर सिर्फ स्वयं के फोटो, खुद के नारे लगवाना, भाषण में खुद एवं अपनी मां का ही जिक्र करना। फिर बता दें कि आरएलपी संयोजक एवं सांसद हनुमान बेनीवाल कई बार वसुंधरा-गहलोत गठजोड़ के आरोप भी लगा चुके हैं।


भाजपा के कार्यकर्ता चर्चा करते हैं कि क्या वसुंधरा ने अपने जन्मदिन के कार्यक्रम से पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को चुनौती, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा के निर्देश की पूरी तरह अनदेखी की गई?

इससे पहले वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय मंत्रिमंडल के गठन के समय भी वसुंधरा राजे ने दिल्ली में राजस्थान हाउस में प्रदेश के कई सासंदों की लामबंदी कर नरेन्द्र मोदी पर भी सियासी दवाब बनाने की कोशिश कर चुकी हैं, लेकिन कहा गया कि केन्द्रीय नेतृत्व ने इनको कोई तवज्जो नहीं दी।

भाजपा के लोगों का कहना है कि विपक्ष में रहने के दौरान 2008 में भी वसुंधरा कई बार नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश अध्यक्ष को दवाब में लेकर और केन्द्रीय नेतृत्व पर दवाब डालकर खुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिये दवाब की राजनीति करती रही हैं और इस बार भी ऐसा ही करने के लिये दवाब डाल रही हैं।

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वैसे 8 मार्च को जन्मदिन का जश्न वसुंधरा हर बार मनाती रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस बार जन्मदिन के बहाने सीधे-सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व को चुनौती दे रही हैं? खासकर ऐसे मौके पर जब पार्टी पश्चिम बंगाल और उपचुनाव में पार्टी पूरी तैयारी के साथ लगी हुई हैं?