यह पूनियां-वसुंधरा की लड़ाई नहीं है, असल में भाजपा-वसुंधरा की है!

-वसुंधरा राजे ने जेपी नड्डा से की मुलाकात तो पार्टी की अंदरूनी सियासत फिर गर्म हो गई।

जयपुर। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara raje) ने सोमवार को पार्टी के शीर्ष अध्यक्ष जेपी नड्डा (JP nadda) से मुलाकात की है। पिछले सप्ताह ही वसुंधरा राजे ने गृहमंत्री अमित शाह (Amit shah) से मुलाकात की थी। इन मुलाकातों को लेकर भाजपा की अंदरूनी सियासत गर्म हो गई है।

इधर, पिछले कुछ दिनों से राजस्थान की भाजपा इकाई में पार्टी अध्यक्ष सतीश पूनियां (Satish poonia) और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच खींचतान की चर्चा खूब सुर्खियां बटोर रही हैं, किन्तु यह सही नहीं है।

असल लड़ाई पूनियां-वसुंधरा के बीच नहीं है, यह केवल दिखने वाली चीज है, पर वास्तव में जिस सियासी तकरार होने का दावा किया जाता है और वसुंधरा राजे खेमे के वर्तमान एवं पूर्व विधायक जिस मुद्दे को हवा दे रहे हैं, वह प्रकरण भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व और वसुंधरा राजे के बीच का है।

जब अक्टूबर 2019 में विधायक सतीश पूनियां को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था, उससे पहले 84 दिन तक भाजपा में अंदरखाने खूब खींचतान मची थी। जिसमें वसुंधरा राजे और पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बीच संगठन में इस अहम पद पर नियुक्ति को लेकर अदावत चली थी।

उससे पहले साल 2018 में, जबकि वसुंधरा राजे सरकार का आखिरी वर्ष था, तब भी अशोक परनामी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद वसुंधरा-शाह के बीच खूब लड़ाई हुई थी।

सियासत के जानकारों का कहना है कि तब राज्य में सत्ता होने एवं 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी किसी बड़े नेता से शीतयुद्ध शुरू कर कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं थी, जिसके कारण वसुंधरा राजे व भाजपा के द्वारा ऐसे व्यक्ति को चुना गया, जिसके नाम पर दोनों पक्ष सहमत हों।

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तत्कालीन राज्यसभा सांसद मदनलाल सैनी को अध्यक्ष बनाया गया, किन्तु लोकसभा चुनाव के बाद उनका निधन हो गया और एक बार फिर अध्यक्ष के लिए चेहरे की खौज शुरू हुई।

किन्तु चूंकि तब वसुंधरा राजे सत्ता में नहीं थीं और ऐसे उनकी नाराजगी से पार्टी पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ने वाला था, जिसके चलते मोदी-शाह के द्वारा संघनिष्ठ सतीश पूनियां, जिनको संगठन में करीब साढ़े तीन दशक का अनुभव था, को अध्यक्ष बनाकर एक तरह से वसुन्धरा खेमे को पहली बार चित्त किया गया।

पार्टी के नेताओं का कहना है कि तभी से वसुन्धरा राजे एवं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच संगठन पर पकड़ को लेकर अदावत चल रही है। इस दौरान सतीश पूनियां ने अपनी कार्यकारिणी, जिलाध्यक्ष, मोर्चों के अध्यक्ष, उनकी कार्यकारिणी का गठन भी संघनिष्ठ लोगों को वरीयता देते हुए किया गया।

पार्टी नेताओं का कहना है कि इसमें वसुंधरा राजे के करीबी लोगों को पूरी तरह दरकिनार करने का काम सतीश पूनियां ने किया तो वसुंधरा राजे को सियासी बेचैनी ने जकड़ लिया।

इसी दरमियान जयपुर, जोधपुर व कोटा के 6 नगर निगमों के चुनाव, जिला परिषद, पंचायत समिति के चुनाव में भी वसुंधरा राजे गुट को टिकटों से महरूम रखकर कमजोर किया गया।

पार्टी के नेता मानते हैं कि सतीश पूनियां भले ही पहली बार विधायक बने हों, किन्तु संगठकर्ता के तौर पर राजनीतिक लंबा अनुभव होने के कारण उन्होंने धीरे-धीरे पार्टी में वसुंधरा राजे खेमे के लोगों को बाहर कर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है।

हद तो तब हो गई, जब पिछले दिनों कोर कमेटी में भी वसुंधरा राजे के लोगों को नहीं लिया गया। जिसकी शिकायत वसुंधरा ने जेपी नड्डा से और अमित शाह से की है।

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अब, जबकि पिछले दिनों ही वसुंधरा राजे ने अमित शाह से मुलाकात की है, तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उनके खेमे के विधायक व पूर्व विधायक प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ खुली बगावत करने पर उतरे हुए हैं?

नाम नहीं छापने की शर्त पर कभी वसुंधरा राजे के बेहद करीबी मंत्री रहे वर्तमान विधायक का कहना है कि वसुंधरा राजे की लड़ाई सतीश पूनियां से नहीं है, बल्कि ताकत हासिल करने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से चल रही है।

वसुंधरा राजे प्रदेश यात्रा के बहाने और अपने करीबी नेताओं से बयान दिलाकर 2008 से 2013 की भांति भाजपा नेतृत्व को दबाव में लेना चाहती हैं, ताकि उनको संगठन में फिर से रुतबा मिल सके, सतीश पूनियां भी उनको पूछकर फैसले करें, किन्तु नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा इस पॉलिटिक्स के आगे झुकने वाले नहीं हैं।

इस नेता का तो यहां तक कहना है कि वसुंधरा राजे को अमित शाह के द्वारा दो टूक शब्दों में जवाब दे दिया गया है, यही कारण है कि अब वह प्रेशर पॉलिटिक्स करने जा रही हैं।

यहां पर यह भी समझने वाली बात है कि जब प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी भी पूरे पौने तीन साल बाकी हैं, तो वसुंधरा राजे के करीबी नेता अभी से उनको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करवाने पर क्यों तुले हुए हैं? तमाम सवालों के जवाब वसुंधरा राजे व शीर्ष नेतृत्व के बीच सतीश पूनियां के माध्यम से तैर रहे हैं।