चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ क्यों हुआ?

जयपुर। राजस्थान के 12 जिलों की 90 नगर निकाय के चुनाव परिणाम में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि एक प्रकार से कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया है। विशेषकर जबकि राजस्थान में हमेशा सत्ताधारी दल के पक्ष में निकाय चुनाव का परिणाम जाने का ट्रेंड रहा है।

कॉन्ग्रेस की सरकार होने के बावजूद पार्टी भाजपा से केवल 48 बार से ज्यादा जीत पाई है। इस साल है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार के प्रति जनता का विश्वास खत्म हो गया है। अशोक गहलोत की सरकार की विफलताओं को लेकर राज्य की जनता गहरी तौर पर आक्रोशित है।

परिणाम की बात की जाए तो राजस्थान की 3035 वार्ड में से कांग्रेस पार्टी 1194 वार्ड पर जीत पाई है, जबकि भाजपा 1146 वार्ड पर जीतने में कामयाब रही है। इसके अलावा 633 वार्ड निर्दलीयों ने जीते हैं।

राज्य के 90 नगर निकाय में से स्पष्ट तौर पर भाजपा को अब तक 24 जगह पर बहुमत मिला है, जबकि कांग्रेस पार्टी को केवल 19 जगह पर बहुमत मिल रहा है। 46 जगह ऐसी है जहां पर निर्दलीयों के हाथ में सत्ता की चाबी है।

कैसे मिलेगा 50 जगह बहुमत

इधर, कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने दावा किया है कि राजस्थान की इन 90 नगर निकाय में से 50 जगह पर कांग्रेस को बहुमत मिलेगा। जिसपर कटाक्ष करते हुए भाजपा अध्यक्ष सतीश पुनिया ने कहा है कि पूर्व की भांति आप यह करिश्मा कर सकते हैं, किंतु यह जादूगरी करेंगे कैसे?

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले ही जिन 50 नगर निकाय के चुनाव परिणाम आए थे, उनमें कांग्रेस पार्टी को केवल 14 जगह पर बहुमत मिल रहा था, लेकिन निर्दलीयों को अपने पाले में लेकर कांग्रेस ने 36 जगह पर बोर्ड बनाने में कामयाबी पाई थी। भाजपा ने इसको कांग्रेस सरकार की खरीद-फरोख्त और डराने वाली नीति करार दिया था।

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पांच साल पहले भाजपा को मिला था बहुमत

इससे पहले 2015 की बात की जाए तो इन सभी 90 नगर निकाय में से भाजपा को सा जगह पर बहुमत मिला था, जबकि कांग्रेस को 25 जगह बोर्ड बनाने में कामयाबी मिली। साथ ही पांच ऐसी निकाली थी, जहां पर निर्दलीयों को बहुमत मिला था।

कांग्रेस पार्टी के छह मंत्रियों और 22 इस विधायकों की साख इस चुनाव के जरिए दांव पर थी। जिनमें से केवल दो मंत्री सफल हो पाए हैं। चार मंत्री ऐसे हैं, जिनका रिपोर्ट कार्ड पूरी तरह से खराब हो गया है।

कांग्रेस की हार के ये रहे हैं कारण

अमूमन देखा जाता है कि राजस्थान में सत्ताधारी दल ही निकाय चुनाव में बढ़त बना लेता है, लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी ही इन चुनाव में भाजपा से काफी पीछे रह गई है।

कांग्रेस पार्टी की हार के कारणों की बात की जाए तो राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार की नाकामियों सबसे बड़ा कारण रही है। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी में आप से लड़ाई मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच चल रहा शीतयुद्ध थमा नहीं है।

ऐसे में पार्टी अंतर कलह से जूझ रही है। इसके साथ ही पार्टी के द्वारा टिकट बंटवारे को लेकर जो नीति अपनाई गई, वह भी कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हुई है। पार्टी ने विधायकों, विधायक प्रत्याशियों, लोकसभा के उम्मीदवार रहे नेताओं के ऊपर टिकट बंटवारे का जिम्मा सौंप दिया था।

इसी तरह से पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट का इस चुनाव प्रचार से दूर रहना भी कांग्रेस के लिए नकारात्मक परिणाम लेकर आया है। सचिन पायलट के साथ ही उनका पूरा खेमा इस चुनाव में अशोक गहलोत और पार्टी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से नाराज दिखाई दिया है।

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इसके अलावा भाजपा के अध्यक्ष सतीश पूनिया की कड़ी मेहनत उनके द्वारा पार्टी को एकजुट करना और साथ ही कोरोना की वैश्विक महामारी के बावजूद सड़क पर नहीं उतरने की मजबूरी को दरकिनार कर भाजपा अध्यक्ष के द्वारा सरकारी नाकामियों को सोशल मीडिया के माध्यम से जनता के समक्ष रखना भाजपा के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आया है।

साथ ही साथ पार्टी अध्यक्ष सतीश पूनिया के द्वारा दल को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की छत्रछाया से बाहर निकालकर पार्टी के कैडरबैस नेताओं को मैदान में उतारना उनको जिम्मेदारी सौंपना और उनके ऊपर विश्वास जताकर परिणाम पाने के लिए उनको प्रोत्साहित करना बड़ा कारण रहा है।

सतीश पूनिया के इस विश्वास के कारण ही प्रभारियों जिला अध्यक्षों और इन चुनाव में लगाए गए प्रभारियों ने कड़ी मेहनत की है और अपनी क्षमता का परिचय देने का काम किया है।

मोटे तौर पर देखा जाए तो सतीश पूनिया के द्वारा संघ- संगठन के कैडरबेस कार्यकर्ताओं के ऊपर विश्वास जताकर उन्हें पूरी जिम्मेदारी के साथ चुनाव प्रचार में झोंक देना सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है।