निकाय चुनाव का नफा-नुकसान: भाजपा-कांग्रेस के लिये अलार्मिंग हैं ये चुनाव

जयपुर।
राजस्थान के 90 निकाय के चुनाव के आए नतीजे एक बार फिर सियासी नजरिए से चौंकाने वाले हैं, क्योंकि एक बार फिर कांग्रेस ने शहरी चुनावों में बढ़त बनाई है। परिणाम में कांग्रेस पार्टी ने 1197 एवं भाजपा ने 1140 वार्डों में जीत दर्ज की है।

हालांकि, दोनों दलों के बीच अंतर केवल 57 का रहा है, किंतु 57 वार्डों का अंतर छोटा नहीं है, बल्कि कांग्रेस द्वारा शहरी वोट बैंक में सेंध लगाना बड़ा मसला है। इसके साथ ही 634 वार्डों पर निर्दलीयों ने कब्जा किया। एनसीपी के 46 वार्ड पार्षद और आरएलपी के 13 पार्षद चुने गए हैं।

एनसीपी ने निवाई और नोखा में भारी जीत दर्ज की है। इससे पहले जयपुर, जोधपुर और कोटा में हुए नगर निगम चुनाव में 6 में 4 जगह अपने मेयर जिताने सहित पूर्व में सम्पन्न हुये 50 निकायों में से कांग्रेस ने 36 जगह शानदार जीत दर्ज की थी। हालांकि, निर्दलीयों के सहारे ही बोर्ड बने थे, किंतु अंतिम परिणाम ही सर्वोपरी है।

कांग्रेस के लिए सियासी और जातिगत समीकरणों के तहत यह बहुत जीत कही जा रही है, क्योंकि जनरल कास्ट और व्यापारी वर्ग भाजपा का परंपरागत वोट बैंक रहा है। यही वजह है कि अबतक राजस्थान के शहरों में जमकर कमल खिलता आ रहा था।

चर्चा यह शुरू हो गई है कि क्या शहरों के लोगों में भाजपा की नोटबंदी-जीएसटी लागू करने जैसी आर्थिक नीतियां और पेट्रोल-डीजल के लगातार बढ़ते दामों से नाराजगी पैदा हुई है? क्योंकि परिणामों का ट्रेंड तो यही कहता है।

अगर ऐसा है तो भाजपा के लिए यह अलार्मिंग होगा! हालांकि जीत की वजह कांग्रेस का सत्तारूढ़ दल होना और परिसीमन के दौरान अपने वोट बैंक के हिसाब से वार्डों का गठन करना जैसे अहम फेक्टर भी हैं, लेकिन इससे पहले हुए 21 जिलों में हुए पंचायत समिति एवं जिला परिषद के चुनाव में उल्टी गंगा बहती हुई देखी गई है, जहां पर रिकॉर्ड तोड़ कमल खिला था।

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इसका मतलब क्या यह है कि ग्रामीण क्षेत्र और किसान जातियों को भाजपा का उग्र राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का एजेंडा रास आ रहा है? राज्य में अभी 12 जिलों के जिला प्रमुख और प्रधान के चुनाव बाकी हैं, उसके बाद ही पुख्ता तौर पर स्थिति साफ होगी कि आखिर माजरा क्या है?

अभी के चुनाव में अजमेर में महापौर का चुनाव भी हुआ है, जहां पर भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है, जो कांग्रेस सरकार के कार्यों पर सीधे सवाल खड़ा कर रहा है।

वैसे विफल साबित मानी जा रही अशोक गहलोत सरकार की नीतियों के खिलाफ भी इस वोटबैंक को बंटने के तौर पर देखा जा रहा है। क्योंकि हमेशा से राज्य में निकाय चुनाव का परिणाम उसी दल को मिलता है, जो कि सत्ता में होता है।

और कांग्रेस को बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है, ऐसे में कहना सही ही होगा कि गहलोत सरकार की नीतियों से जनता खुश नहीं है।

अब निगम मेयर व बोर्ड अध्यक्ष बनने हैं तो उससे पहले निर्दलीयों के सहारे कांग्रेस कहां पर अपनी सत्ता बना पाती है, यह देखना भी दिलचस्प होगा।

इधर, भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां के नेतृत्व में भाजपा जिस तरह का प्रदर्शन कर रही है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में होने वाले 4 विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में अशोक गहलोत सरकार के लिए काफी मुश्किल रास्ता है।