चुनाव-दर-चुनाव सिकुड़ते निर्दलीयों के दायरे के बीच भाजपा ने किया आशानुकूल जीत का दावा

जयपुर। प्रदेश में 20 जिलों के 90 निकायों में गुरुवार को मतदान सम्पन्न हो गया है। अब हर किसी की नजर 30 जनवरी को आने वाले 90 निकायों के वार्डों के नतीजे पर होगी। सवाल यही है कि क्या भाजपा इस चुनाव में अपने शहरी वोटर को बचाने में कामयाब रहती है या फिर सत्ताधारी दल कांग्रेस एक महीने पहले हुए 12 जिलों की तरह इस बार भी भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रहती है।


दरअसल, एक महीने पहले हुए चुनाव में कांग्रेस 12 जिलों के 50 निकायों में से 14 जगह जीतने के बाद निर्दलीयों के सहारे 36 निकाय पर अपने अध्यक्ष बनने में कामयाब हुई थी, जबकि भाजपा को 14 जगह सफलता मिली थी।

हकीकत यह है कि शहरी वोटर पर हमेशा से ही भाजपा का कब्जा रहा है और अगर भाजपा सत्ता में भी नहीं रही है तो भी कांग्रेस के या तो आसपास रहती है या उससे भी ज्यादा निकायों में अपने अध्यक्ष बनाने में कामयाब रही है।


राजस्थान में सम्पन्न हुए 20 जिलों के 90 निकाय चुनाव में निर्दलीयों पर भी नजर होगी, जो इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का खेल बनाते और बिगाड़ने का काम कर सकते हैं।

चाहे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ही पार्टियों ने करीब 300 वार्ड में पार्टी के सिंबल पर प्रत्याशी नहीं उतारे हैं। भाजपा ने इसको अपनी रणनीति बताया है, तो कांग्रेस कुछ नहीं बोली है।

कहा जा रहा है कि इनको उचित उम्मीदवार मिले ही नहीं हैं। ऐसे में दोनों की नजर निर्दलीय प्रत्याशियों पर है, जिन्हें जीत मिलने के बाद कांग्रेस एवं भाजपा अपनी पार्टी में शामिल करना चाहेंगी।

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हालांकि, पार्टियों का वर्चस्व जैसे-जैसे बढ़ा है, वैसे-वैसे निर्दलीयों का वर्चस्व लगातार घटता जा रहा है। साल 1995 के निकाय चुनाव में 35 निर्दलीय बोर्ड बनाने में कामयाब हुए थे।

वहीं, साल 2000 में 33 निर्दलीयों ने बोर्ड बनाने में बाजी मारी थी। इसके बाद साल 2005 में 29 निर्दलीय जीते तो साल 2010 में 21 निर्दलीय सफल हुए। ऐसे ही साल 2015 में 14 जगह ऐसी थीं, जहां निर्दलीयों के बोर्ड बने थे।

अब देखना होगा कि इस बार निर्दलीय कितनी जगह बोर्ड बनाने में कामयाब होते हैं। बता दें ऊपर वर्णित आंकड़ों से साफ हो जाता है कि साल दर साल निर्दलीयों की जीत के आंकड़ों में कमी आती जा रही है। इधर, भाजपा-कांग्रेस ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया है।