सचिन पायलट रविवार से टोंक दौरे पर, गहलोत गुट परेशान

जयपुर। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर से हलचल शुरू हो गई है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी में वसुंधरा राजे के बगावती तेवर सामने आने से हड़कंप मचा हुआ है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस में भी प्रदेश कार्यकारिणी की 39 जनों की पहली लिस्ट सामने आने के बाद कई तरह की कयासबाजी शुरू हो चुकी है।

इस बीच प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री एवं विधायक सचिन पायलट 10 एवं 11 जनवरी को टोंक विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायतों के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। पायलट के दौरे से अशोक गहलोत खेमा थोड़ा असहज महसूस कर रहा है, क्योंकि पायलट जनता के माध्यम से अपनी ताकत दिखाने का प्रयास करेंगे।

पहले दिन पायलट रविवार को प्रातः 8.30 बजे जयपुर से सड़क मार्ग द्वारा प्रस्थान कर प्रातः 10.30 बजे टोंक की ग्राम पंचायत चन्दलाई, 11 बजे लवादर, 11.30 बजे घांस, दोपहर 12 बजे हरचन्देडा, 1.30 बजे बमोर, 2 बजे सोनवा, 2.30 बजे अरनियामाल, अपरांह 3 बजे काबरा, 3.30 बजे ताखोली, सायं 4 बजे सांखना, 4.30 बजे छान, 5 बजे दाखिया एवं 5.30 बजे ग्राम पंचायत लाम्बा पहुंचेंगे, जहां किसान बचाओ-देश बचाओ अभियान के तहत जनसम्पर्क करेंगे।

इसके अगले दिन सचिन पायलट 11 जनवरी को प्रातः 11 बजे ग्राम पंचायत सोरण, 11.30 बजे देवपुरा, दोपहर 12 बजे अरनियाकेदार, 1 बजे मण्डावर, 1.30 बजे देवलीभांची, 2 बजे हथोना, 2.30 बजे पराना तथा अपरांह 3 बजे ग्राम पंचायत बरोनी पहुंचेंगे, जहां जहां किसान बचाओ-देश बचाओ अभियान के तहत जनसम्पर्क करेंगे।

माना जा रहा है कि पायलट का यह दौरा उनकी जनता में पैठ, समर्थन, सियासी ताकत और अपने विधानसभा क्षेत्र की जनता का मूड जानने में मददगार साबित होगा। साथ ही लोगों की समस्याओं को नजदीक से देख/सुन पाएंगे।

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इधर, भाजपा में अब बगावत खुलकर सामने आ चुकी है। बीते करीब सवा साल से पार्टी अध्यक्ष डॉ सतीश पूनियां के द्वारा जिस तरह संगठन को मजबूती देने के साथ ही बरसों से सत्ता व संगठन की पर्याप्त बनीं वसुंधरा राजे के खेमे को लगभग दरकिनार किया गया है, उससे भी राजे खासी नाराज बताईं जा रही हैं।

बता दें कि वसुंधरा राजे के इशारे पर “टीम वसुंधरा राजे” नाम से नया संगठन बनाकर उसकी कार्यकारिणी का गठन तक कर लिया गया है। सभी 28 जिलों के अध्यक्षों के अलावा कार्यकरिणी भी बन चुकी हैं। जिसका ध्यान पड़ने से भाजपा का प्रदेश नेतृत्व व राष्ट्रीय नेतृत्व भी परेशान है।

दोनों ही दलों में इस तरह से खेमेबाजी होने के कारण राजस्थान की राजनीति एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। आमतौर पर राजस्थान की राजनीति को शांत और 5 साल तक के लिए चुनाव के वक्त ही राष्ट्रीय लेवल पर याद किया जाता है, लेकिन केवल 2 साल के भीतर ही राजस्थान की राजनीति केंद्रीय मीडिया में कई बार चर्चा का विषय बन चुकी है।