हल्द्वानी में देश की पहली रामायण वाटिका का IPS पंकज चौधरी ने किया अवलोकन

राजस्थान कैडर के आईपीएस पंकज चौधरी ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में पहली रामायण वाटिका का अवलोकन किया। वाल्मीकि रामायण में जिन पेड़-पौधों और औषधियों का जिक्र है, उन सभी को लेकर उत्तराखंड के हल्द्वानी में देश की पहली रामायण वाटिका तैयार हुई है। 14 वर्षों के वनवास के दौरान भगवान राम जिन जंगलों से गुजरे, वहां तब के समय मौजूद रहीं वनस्पतियों को यहां संरक्षित किया गया है।

हल्द्वानी में देश की पहली रामायण वाटिका,भगवान श्रीराम के वनवास काल की वनस्पतियां संरक्षित।वाल्मीकि रामायण में जिन पेड़-पौधों और औषधियों का जिक्र है, उन सभी को लेकर उत्तराखंड के हल्द्वानी में देश की पहली रामायण वाटिका तैयार हुई है।

14 वर्षों के वनवास के दौरान भगवान राम जिन जंगलों से गुजरे, वहां तब के समय मौजूद रहीं वनस्पतियों को यहां संरक्षित किया गया है। इस अनूठी रामायण वाटिका को उत्तराखंड वन विभाग की अनुसंधान समिति ने तैयार किया है।

इस आइडिया के पीछे हैं आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी। चतुर्वेदी की पहल पर एक एकड़ में यह वाटिका रामपुर रोड स्थित बायो डायवर्सिटी पार्क में तैयार हुई है।

संजीव चतुर्वेदी बताते हैं कि रामायण के अरण्य कांड में भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास का जिक्र है। अयोध्या से लंका की अशोक वाटिका तक वह भारतीय उपमहाद्वीप के छह प्रकार के वनों से होकर गुजरे थे।

ये छह प्रकार के वन थे-

ऊष्ण कटिबंधीय,उष्णकटिबंधीय पर्णपाती उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती, शुष्क एवं नम पर्णपाती, सदाबहार व एल्पाइन। जानकारी आज भी प्रासंगिक चतुर्वेदी के मुताबिक, रामायण में वनों के बारे में दी गई जानकारी आज भी वानस्पतिक और भौगोलिक रूप से सही है।

चतुर्वेदी ने बताया वर्तमान में इन वनों में घनत्व,वन्यजीव व कुछ वनस्पतियों को छोड़करए बहुत कम परिवर्तन हुआ है।चित्रकूट, दंडकारण्य, पंचवटी, किष्किंधा, द्रोणागिरी आदि जंगलों में तब के समय मौजूद पेड़.पौधों की प्रजातियां आज भी संबंधित क्षेत्र में मिलतीं हैं।

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संजीव चतुवेर्दी की यह रिसर्च रामायण को मिथ कहने वालों को झटका देती है।चित्रकूट के वन मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वनवास के प्रथम भाग में ऋषि भारद्वाज के कहने पर भगवान श्री राम ने मंदाकिनी नदी के दक्षिण में स्थित चित्रकूट के वनों में निवास किया था।

वर्तमान में चित्रकूट के वन, उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले और मध्य प्रदेश के सतना जिले की सीमाओं पर स्थिति है।दंडकारण्य वन वाल्मीकि रामायण के अनुसार, चित्रकूट के वनों में आम, नीम, बांस, कंटकारी, असन, श्योनक व ब्राह्मी की प्रजातियां थीं।

इसी तरह भगवान राम का अगला पड़ाव दंडकारण्य वन रहा। यह क्षेत्र वर्तमान में छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित होने के साथ ओडिशा व तेलंगाना तक फैला हुआ है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यहां पर महुआ, अर्जुन, टीक, पाडल, गौब व बाकली की प्रजातियां थीं।

आज भी यही पेड़-पौधे इस एरिया में मिलते हैं। पंचवटी में अपहरण,भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पंचवटी में भी रहे। इसी स्थान से रावण ने सीता का अपहरण किया था।

नासिक में गोदावरी के तट पर स्थित पांच वृक्षों- अशोक, पीपल, बरगद, बेल और आंवला को पंचवटी कहा गया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, इनके अलावा सेमल, सफेद तिल और तुलसी इस क्षेत्र की मुख्य प्रजातियां थीं।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार किष्किंधा में तब चंदन, रक्त चंदन, ढाक, कटहल, चिरौंजी, मंदारा जैसे वृक्षों की प्रजातियां थीं। वर्तमान में यह स्थान कर्नाटक राज्य के बेल्लारी जिले में स्थित हैं। यहीं पर पम्पा सरोवर भी है। आज भी इस एरिया में उन्हीं प्रजातियों के पौधे भी मिलते हैं।

अशोक वाटिका-
इसी तरह आईएफएस अफसर ने श्रीलंका स्थित अशोक वाटिका क्षेत्र में उपलब्ध नाग केसर, चंपा, सप्तवर्णी, कोविदारा, मौलश्री जैसी प्रजातियों के पौधे को भी रामायण वाटिका में संरक्षित किया है। इन प्रजातियों का जिक्र महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में किया है।

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संजीव चतुवेर्दी ने कहा कि वाल्मीकि रामायण में मौजूद 139 तरह की वनस्पतियों में से कुछ की नर्सरी वाटिका मे तैयार की गई है तो कुछ को संबंधित क्षेत्रों से मंगाया गया है। मकसद है कि लोगों को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पेड़-पौधों से जोड़कर पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाने का।

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उत्‍तराखंड में संरक्षित की जा रहीं रामायण और महाभारत काल से जुड़ी महत्वपूर्ण वनस्पतियां

राजस्थान कैडर के पंकज चौधरी IPS ने हल्द्वानी वन्य अनुसंधान केंद्र का किया अवलोकन। संजीव चतुर्वेदी आईएफ़एस व उनकी टीम के द्वारा किया गया अनोखा, अदभुत प्रयास।

देवभूमि उत्तराखंड में हिमालयी वनस्पतियों का अद्भुत संसार है। इनमें धार्मिक ऐतिहासिक और औषधीय महत्व की औषधियां भी हैं। उत्‍तराखंड में संरक्षित की जा रहीं रामायण और महाभारत काल से जुड़ी वनस्पतियां, देवभूमि उत्तराखंड में हिमालयी वनस्पतियों का अद्भुत संसार है।

इनमें धार्मिक ऐतिहासिक और औषधीय महत्व की औषधियां भी हैं। हल्द्वानी, जेएनएन : देवभूमि उत्तराखंड में हिमालयी वनस्पतियों का अद्भुत संसार है,इनमें धार्मिक, ऐतिहासिक और औषधीय महत्व की औषधियां भी हैं। इन वनस्पतियों को संरक्षित करने का काम वन अनुसंधान केंद्र के हल्द्वानी में किया जा रहा है।

इन वनस्पतियों को संरक्षित करने की मंसा जहां लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत करना है वहीं अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक वन सपंदाओं से लोगों को अवगत कराना भी है।

वन अनुसंधान केंद्र के संरक्षक संजीव चतुर्वेदी बताते हैं कि धार्मिक महत्व की प्रजातियों को संरक्षित व प्रचारित कर लोगों के अंदर पर्यावरण को बचाने की अलख भी पैदा होगी। क्योंकि, धार्मिक महत्व सिद्ध होने पर आम लोगों में भी इन वनस्पतियों के प्रति एक जुड़ाव पैदा होगा।

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भगवान श्री कृष्ण, रामायण काल, आदि गुरु शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद से जुड़ी वनस्पतियों को वन अनुसंधान केन्द्र संरक्षित कर रहा है। भगवान बद्रीनाथ को चढऩे वाली बद्री तुलसी को भी बचाने का प्रयास किया गया है।

आदि गुरु शंकराचार्य व विवेकानंद का तप वृक्ष:

आदि गुरु शंकराचार्य ने जोशीमठ में कल्पवृक्ष के नीचे तप किया था। यह पेड़ आज भी मौजूद है। वन अनुसंधान इसके बीजों का चयन कर रोपित करेगा। वहीं, अल्मोड़ा से 22 किमी पहले काकड़ीघाट में स्वामी विवेकानंद ने पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाया था। पांच साल पहले इस पेड़ का क्लोन तैयार हुआ था।

पंचमुखी रुद्राक्ष:

आदि काल से रुद्राक्ष धारण करना शुभ माना जाता है। वन अनुसंधान केंद्र ने एफटीआइ स्थित नर्सरी में क्लोनल विधि के जरिये इसके पेड़ों को संरक्षित किया है। धार्मिक के साथ औषधीय महत्व का रुद्राक्ष रक्तचाप को निंयत्रित करने में भी असरदार है। इसके अलावा नवग्रह वाटिका में नक्षत्र से जुड़े प्रजातियों को संरक्षित किया गया है।

रामायण व कृष्ण वाटिका:

वाल्मीकी रचित रामायण में अलग-अलग प्रकार की वनस्पतियों का वर्णन है। वन अनुसंधान तीन दर्जन से अधिक रामायण काल में मिलने वाली प्रजातियों को वाटिका में संजो चुका है। इसके अलावा कृष्ण वाटिका में भगवान श्री कृष्ण से जुड़े प्रजातियों को स्थान दिया गया है।

भगवान बद्रीनाथ की तुलसी:

मध्य हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली बद्री तुलसी का औषधीय और धार्मिक महत्व भी है। भगवान बद्रीनाथ के धाम में इसे चढ़ाया जाता है। अत्याधिक दोहन की वजह से यह कम हो रही है। इसलिए देववन में भी इसे संरक्षित किया जा रहा है।