‘संसदीय लोकतंत्र की मजबूती का मीडिया सारथी’

‘ संसदीय लोकतंत्र की मजबूती में मीडिया सारथी है, मीडिया विधानसभा सत्रों में सिर्फ दर्शक नहीं है बल्कि लोकतंत्र का दिग्दर्शक है। ‘

कुलदीप शर्मा
नर्मदा के तीर पर केवडिया में सरदार पटेल की विराट प्रतिमा के तले विधायी निकायों के 80वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन का आयोजन इस 25 व 26 नवंबर को किया गया। यह इस सम्मेलन का शताब्दी वर्ष भी है, पहला सम्मेलन 14 सितंबर 1921 को दिल्ली में हुआ था।

अस्सी वें सम्मेलन का विषय ‘ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का सामंजस्यपूर्ण समन्वय – एक जीवंत लोकतंत्र की कुंजी ‘ रखा गया। गुजरात भारतीय लोकतंत्र के प्रेरणा-पुंज महात्मा गांधी की जन्मभूमि भी है। गांधीजी ने युवा वकील वल्लभ भाई में वह चिंगारी जाग्रत कि जिसने उन्हें ‘ सरदार पटेल ‘ बनाया। गांधी-पटेल की धरती पर यह आयोजन प्रेरक है।

इस सम्मेलन में राजस्थान विधानसभा के स्पीकर डॉ. सीपी जोशी के संबोधन को सोशल मीडिया पर सुना। उनका दृष्टिकोण व्यापक और संसदीय अनुभव बेहद समृद्ध है।

आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि व्यक्ति को निर्भीक, निर्वेर, निष्पक्ष होना चाहिए और डॉ. जोशी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। एक स्पीकर के रूप में उन्होंने सरकार, सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष सभी को उनके कर्तव्य-बोध का हमेशा अहसास कराया है।

उन्होंने विधानसभा में कई नवाचार लागू किए हैं, जैसे कि यूट्यूब पर सदन की कार्यवाही का प्रसारण।

केवडिया के सम्मेलन में उन्होंने अपने संबोधन में दल-बदल निरोधक कानून के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए संविधान के 52वें संशोधन अधिनियम,1985 से अस्तित्व में आयी दसवीं अनुसूची से उत्पन्न विसंगतियों की बेबाकी से विवेचना की।

दल-बदल निरोधक कानून के लागू होने के बाद स्पीकर की शक्तियों और न्यायिक पुनर्विलोकन को लेकर अंर्तविरोधों के हालात को भी रेखांकित किया। विगत दिनों राजस्थान में उपजी परिस्थितियों की भी उन्होंने चर्चा की।

संसदीय लोकतंत्र की मजबूती को लेकर डॉ.सीपी जोशी ने जो सुझाव दिए, उसे सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और सभी उपस्थित पीठासीन अधिकारियों ने बेहद गंभीरता से सुना। जोशी एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो नई दिशा दिखाने का सामर्थ्य रखते हैं।

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उन्होंने कहा कि प्रस्ताव पारित करने भर से कुछ नहीं होगा बल्कि नये और पुराने प्रस्तावों की अनुपालना भी करानी होगी। उनके इस सुझाव को नवाचारों के लिए प्रतिबद्ध लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने तत्काल नोट भी किया।

इसी तरह डॉ. सीपी जोशी ने राजनीतिक दलों के आंतरिक निर्वाचन का मुद्दा भी उठाया तथा विधानसभाओं को केन्द्रीय स्तर से ही स्वतंत्र बजट आवंटन की भी महत्वपूर्ण बात कही।

वहीं कोरोना काल में वर्चुअल विधानसभा सत्र और वर्चुअल प्रश्नकाल के आयोजन जैसे बिंदुओं पर अपनी बेबाक राय रखी। इसी के साथ उन्होंने यूट्यूब पर राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही के प्रसारण का उल्लेख करते हुए विधानसभा में सत्रकाल में मीडिया के प्रवेश के मुद्दे का जिक्र भी किया।

मीडिया के संबंध में मैं विनम्रता से अपना मत रखना चाहूंगा। संसदीय लोकतंत्र में निर्वाचित विधायिका जनता और संविधान के प्रति आबद्ध होती है। भारत के संविधान की उद्देशिका में ‘ हम, भारत के लोग, दृढ़ संकल्प होकर इस संविधान को अंगीकृत करते हैं।

‘ यह ध्येय वाक्य अंकित है। मीडिया इसी जनता यानी भारत के लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रतिध्वनि है। जो संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के जरिए मौलिक अधिकार के रूप में भारतीय नागरिकों को मिली है। प्रेस की स्वतंत्रता इसी में निहित है।

भारतीय लोकतंत्र जो कि परंपराओं से प्रेरित है, उसमें मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है। ‘ अग्निधर्मा पत्रकारिता ‘ यह शब्द लोक-मान्यता में मीडिया के लिए ही रचित है, क्योंकि ‘ अग्निधर्मा सियासत ‘ नहीं होती, वह समावेशी व समन्वयकारी होती है। लेकिन मीडिया अग्निधर्मा, समावेशी और समन्वय तीनों तत्वों का संवाहक बन संसदीय लोकतंत्र की उन्नति का सारथी है।

लोकसभा की पहली बैठक जो कि 13 मई 1952 को आहूत की गई थी। तभी से सदन की कार्यवाही के बारे में देश की जनता को जानकारी देने के लिए मीडिया को सदन की कार्यवाही का साक्षी बनने तथा प्रेस गैलरी को महत्व देने पर सहमति जताई गई।

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देश के सभी विधानमंडलों में भी मीडिया और विधायिका का जीवंत रिश्ता एक परंपरा और संस्कृति रही है।
राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो यहां संसदीय लोकतंत्र की खुशबू को मीडिया ने बीते दशकों में ना केवल महकाया है बल्कि सदन की कार्यवाही वृतांत को, सदन के गलियारों की सियासी गुफ्तगू को प्रदेश के हर अंचल तक अखबारों के पन्नों ने सभी वर्गों तक विस्तार से पहुंचाया है।

आधुनिक दौर में न्यूज चैनल और वेबसाइट भी यह काम बखूबी कर रहे हैं, वैकल्पिक मीडिया ने संसदीय लोकतंत्र की मजबूती में इजाफा ही किया है। जनता के लिए समर्पित एक कल्याणकारी राज्य में मीडिया की तादाद भी बढ़ना लाजिमी है और जिम्मेदारियां भी। इसी परिदृश्य के साथ समन्वय एक जीवंत लोकतंत्र की कुंजी है।

विधानसभा सत्रों में मीडिया की भूमिका दिन-प्रति-दिन बढ़ी है। प्रश्नकाल में विधायकों की ओर से पूछे गए तारांकित प्रश्नों और उसमें से उपजे अनुपूरक प्रश्नों पर सरकार किस तरह घिरती है। इस दृष्टांत को अपनी लेखनी में पिरोकर पत्रकार ही जनता-जनार्दन तक पहुंचाते हैं।

वहीं, अतारांकित प्रश्नों के लिखित जवाब आम जन तक पहुंचाने का मीडिया एक सशक्त माध्यम है। पर्ची और सदन में वाद-विवाद की जीवंतता आम अवाम तक बनाये रखने में मीडिया भी एक प्रमुख सहभागी है।

विधायक जनता की आवाज सदन में पहुंचाता है और सदन में विधायक की आवाज मीडिया के जरिए जनता तक पहुंचती है। अखबारों व टीवी पर लोग टकटकी लगाये रहते हैं कि उनके वोट से चुने विधायक सदन में क्या कर रहे हैं।

बजट सत्र में तो मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मीडिया प्रतिपक्ष के प्रतिरोध और जन आकांक्षाओं का दृढ़ स्वर भी है। इसलिए संसदीय लोकतंत्र और मीडिया एक दूसरे के पूरक हैं।

नये दौर में यूट्यूब सिर्फ एक सहायक तत्व है, वह मीडिया के आयामों का विकल्प कभी नहीं बन सकता। अब तो विधानसभा की सीढ़ियों पर मीडिया को बीफ्रिंग की एक जीवंत परंपरा पिछले कुछ सालों में भी बन गई है।

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यही जीवंतता मीडिया की सार्थकता और संसदीय लोकतंत्र की मजबूती की एक बानगी है। डीपीआर और सरकारी अमला संसदीय लोकतंत्र की इस महक और महत्व को रेखांकित नहीं कर सकता, उनकी अपनी सीमाएं हैं।

यह काम तो स्वतंत्र मीडिया ही कर सकता है और पिछले सात दशक में करता आया है।

राज्यसभा के सभापति वैंकेया नायडू, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, राजस्थान विधानसभा के स्पीकर डॉ.सीपी जोशी संसदीय लोकतंत्र में नवाचारों के समर्थक हैं।

उम्मीद करते हैं कि पीठासीन अधिकारियों का आगामी सम्मेलन भविष्य में जयपुर में भी होगा क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष का यह गृह प्रदेश है तथा इसमें ‘ संसदीय लोकतंत्र की मजबूती में मीडिया के साथ सामंजस्यपूर्ण समन्वय ‘ का मुद्दा भी जुड़ेगा।

अपनी उदारता, समन्वय तथा परंपराओं के लिए विख्यात संसदीय लोकतंत्र की प्रगति में मीडिया की सहधर्मी भूमिका रही है। इस पर नव संदर्भों में खुलकर संवाद होना चाहिए क्योंकि मीडिया अपने आयामों और विकास के साथ लोकतंत्र का सशक्त स्तंभ है।

संसदीय प्रणाली की प्रक्रिया और गौरवशाली विरासत पर मीडिया के साथ कार्यशालाओं का क्रम बनना चाहिए। सदन की कार्यवाही वृतांत में दर्ज चुनिंदा कालजयी भाषण पुस्तकों की शक्ल में नई पीढ़ी के अधिकारियों, मीडियाकर्मियों, शोधार्थियों तक पहुंचने चाहिए क्योंकि ये सिर्फ भाषण नहीं हैं बल्कि प्रदेश की विकास यात्रा का इतिहास एवं दिग्दर्शन हैं।

राजस्थान तो लोकतंत्र के पुरोधा मोहनलाल सुखाड़िया, हरिदेव जोशी, रामनिवास मिर्धा, निरंजन नाथ आचार्य, मास्टर आदित्येन्द्र, भैरोंसिंह शेखावत, शिवचरण माथुर, परसराम मदेरणा, कुंभाराम आर्य, प्रोफेसर केदार, माणिकचंद सुराणा, भीखा भाई, श्योपत सिंह सहित प्रघुम्न सिंह, पं.रामकिशन, हरिशंकर भाभड़ा, सुमित्रा सिंह जैसे अनेक मूर्धन्य राजनेताओं का प्रदेश रहा है, स्वयं डॉ. सीपी जोशी एक प्रखर संसदीय विज्ञ हैं।

इसलिए विधायी निकायों के आगामी सम्मेलनों में मीडिया के सह-अस्तित्व पर भी कभी चर्चा होगी। यह अपेक्षा है।