पैसा, जाति, कैंडिडेट और आखिर में पार्टी के नाम पर पड़े हैं वोट

जयपुर। वैसे तो शहर के लोगों को शिक्षित होने के कारण पैसा जाती और इसी तरह की बाकी अफवाह से दूर रहने के रूप में जाना जाता है, लेकिन जयपुर, जोधपुर और कोटा के छह नगर निगम के चुनाव में जिन चार चीजों को ध्यान में लेकर वोटिंग हुई है उसमें सबसे पहला पैसा, दूसरा जाति, तीसरा कैंडिडेट और आखिर में पार्टी के नाम पर मतदान किया गया है।

तीनों जिलों के एक-एक नगर निगम में पहले चरण के दौरान 29 अक्टूबर को मतदान किया गया था, जिसमें औसतन 58% वोटिंग हुई।

तीनों ही जिलों के दूसरे नगर निगमों में रविवार को मतदान किया गया है, जिसमें भले ही मत प्रतिशत कम रहने की संभावना हो, किंतु दोनों ही चरण के मतदान में जिन चार चीजों का ऊपर जिक्र किया गया है, उन्हीं पर मतदाताओं का फोकस रहा है।

जयपुर ग्रेटर के 150 वर्षों पर मतदान के दौरान देखने को आया कि अधिकांश जगह पर उम्मीदवारों की जाति उनके मतदाताओं के सिर चढ़कर बोल रही थी। दूसरे नंबर पर पार्षद प्रत्याशियों ने पैसे को पानी की तरह बहाया है।

जिस दिन टिकट मिला था, उसी दिन से पैसा बेतहाशा मात्रा में खर्च किया गया अधिकांश जगह पर शराब की बिक्री बड़े पैमाने पर हुई तो सुबह और शाम का खाना दिन में नाश्ता, चाय, पानी, लग्जरी गाड़ियों में मतदाताओं को रिझाने के लिए रैलियां निकलीं, पोस्टर और बैनर बेहिसाब छपवा गए, चिपकाए गए।

टिकट प्राप्त करने के लिए दलालों को पैसा खिलाने, खासतौर से कांग्रेस के विधायकों और विधायक प्रत्याशियों के ऊपर आरोप लगा कि अधिकांश टिकट पैसा लेकर दिया गया है।

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भाजपा के भी दो विधायकों पर पैसे के बल पर अपने समर्थकों को टिकट देने का और दिलवाने का आरोप खूब लगा है। कुछ जगह पर पार्षद प्रत्याशियों के द्वारा आपसी प्रतिस्पर्धा अधिक होने के चलते कोई 2 से लेकर 3 करोड रुपए तक खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।

सबसे ज्यादा शेर के आउटसाइड जिन प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा है, उनको टिकट लेने के लिए और उसके बाद मतदाताओं को रिझाने के लिए भी बड़े पैमाने पर पैसे को पानी की तरह खर्च किया गया है।

इन चुनाव में पार्षद प्रत्याशियों की जाति भी काफी महत्वपूर्ण रही है। खासतौर से स्थानीय होने के कारण जाति और धर्म मतदाताओं के जहन में पहले स्थान पर रहा है।

परकोटे में जहां मुस्लिम मतदाताओं की कई वार्डों में अधिकता होने के कारण वहां पर मुस्लिम प्रत्याशियों की जीतने की पहले ही संभावना जताई जा चुकी है, तो इसके बाद चाहे जयपुर हेरिटेज हो या फिर जयपुर ग्रेटर सभी जगह पर प्रत्याशियों की जाति को ध्यान में रखते हुए भी मतदाताओं ने वोटिंग की है।

कई जगह पर चुनाव होने से पहले ही दो या दो से अधिक जातियों के बीच आपसी वैमनस्य फैलने जैसी खबरों के कारण इंटेलिजेंस और पुलिस के लिए भी सिरदर्द ही पैदा हो रही थी, किंतु आखिरकार शांतिपूर्वक मतदान होने के कारण पुलिस प्रशासन के द्वारा भी राहत की सांस ली गई है।

भारतीय जनता पार्टी ने 65 साल से अधिक के किसी भी व्यक्ति को उम्मीदवार नहीं बनाए जाने की गाइडलाइन और स्थानीय व्यक्ति को टिकट दिए जाने के नियम बनाने के चलते चेहरे पर भी मतदान हुआ है।

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भाजपा ने जहां अधिसंख्य जगह पर स्थानीय व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया है तो इसके चलते हैं कांग्रेस को भी दबाव में लगभग यही रणनीति अपनानी पड़ी है, नतीजा यह हुआ है कि स्थानीय प्रत्याशी होने के कारण लोगों को चुनाव करने में भी आसानी रही है।

ऐसा नहीं है कि इन चुनावों में पार्टी का महत्व खत्म हो गया हो और पार्टी के नाम पर मतदाताओं ने वोटिंग नहीं की हो। मोटे तौर पर देखा जाए तो नगर निगम के इन चुनावों में जाति और धर्म के बाद दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा वोटिंग पार्टी के सिंबल पर हुई है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो स्थानीय पार्षद के चुनाव में जिन चीजों को सबसे ज्यादा तो जो दी गई है उनमें पैसा, जाति, स्थानीय उम्मीदवार, पार्टी और प्रत्याशी का चेहरा काफी महत्वपूर्ण है।