privet hospital
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आजकल देश में प्राइवेटाइजेशन की खबरों का बोलबाला खूब है। केंद्र की सरकार ने कई सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में सौंप दिया है, या सौंपने की तैयारी शुरू कर दी है। सरकार ने 2019 के शुरुआत में देश के 6 हवाई अड्डों को निजी हाथों में सौंपा है। सरकारी कर्मचारी तो इसका विरोध कर ही रहे हैं, उनके साथ जिनको सरकारी नौकरी लगने की उम्मीद है और जिनको सरकार का तीखा विरोध करना है, उन सबने भी निजीकरण के विरोध का बीड़ा उठा रखा है। इंदिरा गांधी के जमाने में कई प्राइवेट बैंकों का सरकारीकरण किया गया था। टाटा समूह को तब सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था, क्योंकि जितने उपक्रमों का सरकारीकरण किया गया था, उनमें अधिकांश इसी समूह के थे।

किंतु आज जमाना बदल गया है। सरकार ने तब जिन निजी संस्थानों को टेकओवर किया था, उनमें से ही कई निजी हाथों में दिये जाने की तैयारी में है, या सौंपी जा चुकी हैं। इन संस्थाओं के कर्मचारी खूब विरोध कर रहे हैं, लेकिन राजहठ इन विरोधों से टलता नहीं है। सरकार जो चाहती है, वो करके ही मानती है, चाहे उसके लिये कितने भी लोगों की बलि चढ़ानी पड़े। आजकल विरोध करने वालों के साथ जो हो रहा है, वह भी इस बात को इंगित करता है। सवाल यह उठता है कि सरकार आखिर इन संस्थानों के निजीकरण करने पर तुली क्यों है?

इस सवाल के पक्ष और विपक्ष में खूब मत हैं, लेकिन कोई भी मत पूर्ण नहीं हैं। कुछ तथ्य हैं, जो मैदान में उतरने पर सोशल मीडिया की भड़ास और विरोध के मत से एकदम उलट नअर आते हैं। यह काम आजकल काफी हद तक मीडिया कर रहा है, यह बात और है कि इस अविश्वसनीय मीडिया की अनैक रिपोर्ट देखने के बाद ही आप तय कर सकते हैं कि आखिर माजरा क्या है? वैसे अब मीडिया पर भरोसा करने वालों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। लोग एक अखबार, एक टीवी चैनल देखकर कन्फर्म नहीं हो पाते हैं कि अमुक खबर सही है, या नहीं?

फिर भी यदि किसी को सही रिपोर्ट पता करनी हो, तो अखबार और टीवी चैनल देखने के बजाये इन संस्थानों के ग्रांउड पर काम करने वाले पत्रकारों से की जा सकती है। ये पत्रकार जिस संस्थान में काम करते हैं, वहां तो खबर लिखना और दिखाना, सब संस्था पर निर्भर करता है, लेकिन यदि कोई चाहे तो उनके अनुभव से ग्रांउड का सच जान सकता है।

आजकल मेरे जैसे कुछ पत्रकार सोशल मीडिया पर या डिजीटल मीडिया पर अपने निजी अनुभव को शेयर कर इस माध्यम का बेहतरीन इस्तेमाल कर रहे हैं। हां, यह बात जरुर है कि इस तरह से क्रांतिकारी और इमानदारी वाले अनुभव को सावर्जजनिक तौर पर लिखने या बोलने के बाद किसी भी संस्थान में नौकरी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। फिर भी इस माध्यम पर आप अपने अनुभव लिखकर, बोलकर लोगों को सच बता सकते हैं।

खैर! मुद्दे पर लौटते हैं। दरअसल, सरकारी संस्थाओं का कमजोर होना और निजी संस्थानों का लगातार पनपना, इस बात का संकेत है कि किसी न किसी रुप में सरकार में बैठे हुये प्रधानमंत्री, मंत्री, जनप्रतिनिधि और सबसे अधिक ब्यूरोक्रेट्स खुलकर ऐसा होने के लिये सपोर्ट करते हैं। आजकल तो नेताओं और अधिकारियों का भी गठजोड़ हो गया है, जो उनकी पोल खोलने वाले मीडिया को या तो खरीद चुका है, या खरीदने, ब्लैकमेल करने और कुप्रचारित करने का खेल कर रहा है, ताकि उनकी सच्चाई जनता नहीं जान सकें।

​बात करते हैं अस्पतालों के निजीकरण की। ठोस ग्रांउड स्टडी के बाद मेरा निजी अनुभव यह कहता है कि आज की तारीख में सरकार में बैठे हुये नेता और अधिकारी निजीकरण के लिये जितने जिम्मेदार हैं, उससे अधिक उनके अंतर्गत काम करने वाले कर्मचारी हैं। मजेदार बात यह है कि इन नेताओं और अधिकारियों ने तकरीबन सभी निजी अस्पतालों में अपनी हिस्सेदारी बना ली है, या फिर इन अस्पतालों के मालिक नेताओं और ब्यूरोक्रेसी में पार्टनर हो गये हैं।

अब कोई भी व्यक्ति यह बात आसानी से समझ सकता है कि जब बड़े कॉर्पोरेट प्राइवेट हॉस्पिटल में नेताओं और अधिकारियों की हिस्सेदारी होगी, तो ये जिम्मेदार लोग सरकारी अस्पतालों के प्रति वफादार क्यों होंगे? इसका परिणाम यह हो रहा है कि जो पॉलिसी सरकारी अस्पतालों को संसाधन मुहइया करवाकर सरकारीकरण को बढ़ावा देनी चाहिये, वो—येन—केन—प्रकरेण प्राइवेट अस्पतालों को पनपाने के लिये बन रही है। लगभग चार साल पहले राजस्थान सरकार ने प्रदेश के तकरीबन सभी छोटे अस्पताल पीपीपी मोड पर निजी हाथों में सौंप चुकी है। बोला तो यह गया कि जो डिस्पेंसरी मरीज विहीन हैं अथवा बेहद कम संख्या में रोगी आते हैं, उनको ही प्राइवेट लोगों को चलाने के लिये दिया जायेगा, किंतु हुआ यह कि जो छोटे अस्पताल मरीजों से भरे पड़े थे, उनको भी निजी हाथों में सौंप दिया गया।

अब खेल देखिये इसके पीछे का। जिनको ये अस्पताल सौंपे गये थे, वो ‘मेडिकल लाइन के हाथी’ थे। यानी छोटे चिकित्सकों या संस्थाओं को जो अस्पताल सौंपकर सुविधायें बढ़ाने का दावा था, वह धरा ही रह गया। अब हो यह रहा है कि जो मरीज इन डिस्पेंसरीज में आते हैं, उनको वहां पर बैठे प्राइवेट अस्पतालों के एजेंट पूरी तरह से कटने के ​लिये मुख्य अस्पताल में रैफर कर देते हैं। साफ है कि ये छोटे अस्पताल ही उन साझेदारों के लिये एजेंट की तरह हो गये हैं, जहां से उनकी मृतप्राय: या बंद हो चुकी दुकानें चल पड़ी हैं, मुफ्त में प्रचार हो रहा है जो बोनस है।

और जिन बड़े निजी अस्पतालों ने इन छोटे सरकारी चिकित्सालयों को पीपीपी मोड पर लिया है, उन अधिकांश में बड़े सभी नेताओं और अधिकारियों की हिस्सेदारी है। राजस्थान में बीते 21 साल में पांच मुख्यमंत्री बने हैं। चर्चा आम है कि जयपुर का एक 17 साल पुराना बड़ा निजी अस्पताल, जो सीतापुरा में ‘महात्मा गांधी अस्पताल’ के नाम से जाना जाता है, उसमें अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे, दोनों की हिस्सेदारी है। कहें तो इसका सबूत यह है कि दोनों ही नेता सत्ता में रहते विभिन्न अवसरों पर उद्घाटन करने महात्मा गांधी अस्पताल जाते रहे हैं, जबकि पूरे राजस्थान में ऐसा कोई दूसरा उदहरण नहीं मिलता है।

अब बात करते हैं सरकारी कर्मचारी क्यों है निजीकरण को बढ़ावा देने के लिये जिम्मेदार? बीमारी से तड़पता एक आम मरीज सरकारी अस्पताल बड़ी आस से पहुंचता है। किंतु लंबी कतारों और वे​टिंग के चलते अस्पताल में उसको पर्ची कटवाने में ही दो—दो घंटे लग जाते हैं। जहां पर मरीज और उसके परिजनों को बार—बार इस बात का अहसास करवाया जाता है कि वह फ्री उपचार करवाने आया है। उसको कई बार बेइज्जती का सामना करना पड़ता है। फिर डॉक्टर को दिखाने के लिये उसके एक से दो घंटे खप जाते हैं। इनसे निपटने के बाद यदि कोई जांच करवानी हो तो उसको बिल की पर्ची कटवाने में लग गये एक—आधा घंटे। वहां धक्के खाने के बाद मरीज जब फिर से डॉक्टर को जांच दिखाने जाता है, तब तक डॉक्टर अपनी सीट से घर जा चुका होता है।

अब इतने एपिसोड में यह बात साफ हो गई है कि अगर आपको सस्ता या फ्री इलाज करवाना है तो पहले तो दिनभर धक्के खाओ, और इसके बाद भी अपनी थोड़ी बहुत इज्जत, अगर बची है तो सरकारी कर्मियों के द्वारा की जाने वाली बेइज्जती का सामना कर उसको पूरी तरह गरीब बना दिया जाता है? सवाल यह है कि अगर कोई मरीज कुछ पैसे बचाने के लिये सरकारी अस्पताल जायेगा, तो क्या पूरा दिन लुटाकर आयेगा? यही करने के लिये सरकारी अस्पताल खुले हैं? यह बात सही है कि सरकारी अस्पतालों में इलाज मुफ्त हो जाता है, किंतु क्या इतना मुफ्त होता है कि मरीज अपनी ​इज्जत भी वहीं लुटा आये? क्या सारे दिन धक्के खाने के बाद उसको दुत्कारा जाये और इतना बेसकीमती वक्त खराब कर दिया जाये कि उसकी मानसिकता को ही बर्बाद कर दिया जाये?

निजी अस्पतालों में जहां उपचार महंगा होता है, तो वहां पर आपका स्वागत करने के लिये नौजवान युवा और युवतियां तैयार रहती हैं। वहां आपको जांच के लिये भटकना नहीं पड़ता है, वहां आपको पर्ची के लिये घंटों कतार में खड़ा नहीं रहना होता है, वहां आपको डॉक्टर के कमरे के बाहर इंतजार नहीं करवाया जाता है। वहां पर आपको जांच दिखाने के लिये डॉक्टर से पुन: प्रार्थना नहीं करनी पड़ती है। प्राइवेट अस्पताल में आपको बैठने ​के लिये जगह, खाना खाने के लिये स्थान, लेटने की सुविधा और यहां तक की टहलने की भी जगह मिल जाती है। कुछ छोटे अस्पताल इसके अपवाद हो सकते हैं, लेकिन आजकल तो कई कॉर्पोरेट अस्पतालों ने अपने यहां पर परिजनों को अलग से कमरा देना भी शुरू कर दिया है, जहां पर कुछ पैमेंट कर वह आराम से दिनरात रह सकता है।

आप इन दोनों की सेवाओं में अतंर तो देखिये? सरकारी अस्पताल में मरीज और परिजन जहां दिनभर धक्के खाने के बाद भी संतुष्ट नहीं होने के कारण रोते हुये मुंह बनाकर बाहर निकलते हैं, तो दूसरी तरफ निजी अस्पतालों में बेइज्जती सहे बिना और दिनभर का वक्त खर्च करने के बजाए कुछ अधिक पैसा खर्च कर मरीज और परिजन जब अस्पताल से डिस्चार्ज होते हैं तो उनके चेहरे पर एक अलग ही खुशी होती है। भले ही उनके पैसे खर्च हो गये हों। यह बात सही है कि इसमें 25 प्रतिशत के आसपास अपवाद भी होते हैं, किंतु कुल मिलाकर देखा जाये तो अधिकांश सरकारी अस्पतालों से 100 गुणा बेहतर होते हैं।

आजकल एक सोच पैदा हो गई है कि सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों में केवल गरीब ही जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीज धक्के खाते हैं और सरकारी स्कूलों में गरीबों के बच्चे घिसटते हुये आगे बढ़ते हैं। यह बात और है कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर और कर्मचारी निजी अस्पतालों से कई गुणा योग्य होते हैं। सरकारी शिक्षक अधिक योग्य होते हैं, किंतु अपनी सरकारी मानसिकता और नौकरी की गांरटी ने इनको इतना अयोग्य बना दिया है कि सरकारी शिक्षक का बेटा प्राइवेट स्कूल में पढ़ता है और सरकारी अस्पताल के डॉक्टर के परिजनों का इजाल निजी अस्पतालों में करवाया जा रहा है।

सरकारी अस्पताल का डॉक्टर अपने ड्यूटी टाइम में से समय चुराकर निजी अस्पतालों में शल्य क्रिया करते हैं। इसी तरह से उनको सुबह शाम अपने घर पर भी प्रैक्टिस करनी पड़ती है। इसका भी एक कारण है। निजी अस्पतालों में डॉक्टर को खूब पैसा मिलता है, कमाने का मौका मिलता है, जबकि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर उनके मुकाबले चौथाई भी वेतन नहीं पाते हैं। किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने पेशे से ही गद्दारी करने लग जायें? मरीज को अपने डॉक्टर पर भगवान की तरह भरोसा होता है, लेकिन आजकल हर दूसरे मरीज या परिजन से सुन सकते हैं कि, ‘डॉक्टर तो लूटते हैं’, जब यह बात आम हो जाये तो उसके पीछे कहीं न कहीं खुद डॉक्टर जिम्मेदार हैं।

सवाल यह है कि सरकारी की यह भयावह तस्वीर बनाई किसने? उपर लेख पढ़ने के बाद कोई भी समझ सकता है कि इस भयावह तस्वीर के लिये जितने नेता और अफसर ​जिम्मेदार होते हैं, उससे ज्यादा इन संस्थाओं के कर्मचारी हैं। अगर ड्यूटी टाइम में, अपनी क्षमता को इस्तेमाल करते हुये सरकारी डॉक्टर और कर्मचारी इमानदारी से सेवा करने लग जायें, तो कुछ ही दिनों में निजी अस्पताल सूने हो जायेंगे। इसी तरह अगर शिक्षक इमानदारी से पढ़ाने लग जायें तो निजी विद्यालय अगले दो साल के भीतर बंद हो जायेंगे।

देश के एयरपोर्ट निजी हाथों में जा रहे हैं। राजस्थान रोडवेज कब प्राइवेट चली जाये, बिलकुल भी भरोसा नहीं है। आधी से ज्यादा लॉ फ्लोर बसों के पहिये थमे पड़े हैं, यह प्राइवेट हाथों की तरफ बढ़ जायें, आप समझ सकते हैं। जयपुर में दो अस्पताल सरकार पहले ही बनाकर प्राइवेट हाथियों को बेच चुकी है। आपके करीब 4 सौ करोड़ की लागत से बनाया हुआ एक बड़ा मेडिकल कॉलेज अस्पताल कभी भी निजी ठेकेदारों को दिया जा सकता है।

रेलवे के भ्रष्टाचार का आलम यह है कि टीटी टिकट देने के बजाये नहीं देकर आधे पैसे में सवारी को गंतव्य तक पहुंचाने का तरीका ढूंढते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि केंद्र सरकार ने रेलवे में निजी लोगों को घुसा दिया है। बीएसएनएल के कर्मचारी इतने निकम्मे हैं कि नई सोच तो दूर की बात है, वो ग्राहक से बात करना ही नहीं चाहते हैं। देश का नेटवर्क प्रयोग करना चाहता था, लेकिन इनकी नाकामी के कारण मुझे बेहद कठिनाई पार करते हुये 90 दिन में वापस बीएसएनएल छोड़ना पड़ा। सरकार कब तक इनको तनख्वाह बैठे—बैठे देती रहे। इसलिये बीएसएनएल कभी भी जियो या एयरटेल अथवा वोडाफोन बन सकती है।

राजस्थान के आधे से ज्यादा सरकारी अस्पताल पीपीपी के नाम पर ‘मेडिकल के निजी हाथियों’ को सौंपे जा चुके हैं। वसुंधरा राजे सरकार ने 22 हजार सरकारी विद्यालय बंद कर दिये थे, तभी साफ हो गया था कि सरकार ने निजीकरण की तरफ हाथ बढ़ाया है। सत्तासीन होने से पहले कांग्रेस ने कहा था कि सभी बंद स्कूलें शुरू की जायेगी, किंतु 2 हजार को चिन्हित किया गया है, खोला किसी को नहीं गया है।

राजस्थान में टोल देने की प्रक्रिया फिर शुरू हो गई है। क्योंकि यह पहले से ही प्राइवेट हाथों में है। अगर यह सरकारी होते तो फिर निजी लोगों द्वारा ही शुरू किये जाते। किसानों को बिजली सब्सिडी के नाम 10 हजार का झुंझुना पकड़ाया गया था, वह भी छीन लिया गया है। पावर ग्रिड बेचने के लिये कई बार निविदा आमंत्रित की जा चुकी है। आजकल राजस्थान के मुख्यमंत्री, सीएम कम, प्रोपर्टी डीलर ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। सरकारी जमीन को 50 फीसदी और 37 प्रतिशत डिस्काउंट के साथ बेचने के लिये बड़े बड़े विज्ञापनों से शहर अटा पड़ा है।

राज्य या केंद्र सरकार के अधिकांश प्रोजेक्ट तो पहले ही प्राइवेट कंपनियां कर रही हैं। बचे हुये काम भी ठेके पर या निजी ठेकेदारों को बेच दिये जायेंगे, इसके बाद चिल्लाते रहना सरकारी नौकरी पाने के लिये। अभी जो सरकारी कर्मचारी हैं, उनको सोचना चाहिये कि हम आने वाली पीढ़ियों के किये कुआं खोदकर क्यों जा रहे हैं।

भले ही प्राइवेट होने पर आप चिल्लाते रहें, लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में जब तक सरकारी कर्मचारी नाकारा रहेंगे, तब तक यह जारी रहेगा, इसको कोई नहीं रोक सकता। एक दिन ऐसा आयेगा कि सरकार चीन की तरह स्थाई हो जायेगी और कर्मचारी गुलाम बनकर 8 घंटे के बजाये वर्तमान वेतन के आधे से भी कम में 18 घंटे काम करेंगे।

आज जो लोग ​सिलेक्टिव विरोध करते हैं और खुद पर आते ही चुप हो जाते हैं, ऐसे स्वयंभू निष्पक्षों को भी इसपर विचार करना चाहिये। नौकरी नहीं लगने तक देवी—देवताओं को सवामणी बोलने वाले युवा—युवतियां नौकरी लगने पर जब एक साल के भीतर ही रिश्वत लेने में पकड़ जाये, तो सहज ही समझ सकते हैं कि इन युवाओं को माता—पिता ने क्या सिखाया होगा। इन युवाओं को इस स्थिति में जाना ​कोई सरकार नहीं सिखाती, यह परिजन और गुरुजन सिखाते हैं या सीखने के लिये खुले छोड़ दिये जाते हैं।

जब सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ता है तो निजीकरण की राह तेजी से खुलती जाती है। अंतत: प्राइवेट अस्पताल, निजी विद्यालय, जियो, वोडाफोन, एयरटेल, अडानी के एयरपोर्ट, अंबानी की रेल बननी शुरू होती है। कहने का मतलब यह है कि पहले अपने काम को इमानदारी से करिये, ताकि कोई आपके उपर उंगली नहीं उठा सके और आपकी कर्मभूमि निजी हाथों में देने की सोच भी नहीं सके।

कहने का मतलब और निष्कर्ष यही है कि आज जितने भी सरकारी उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है, या होने की कगार पर है, उसके लिये अगर 30 प्रतिशत नेता और अधिकारी जिम्मेदार हैं, तो 70 फीसदी जिम्मेदारी खुद डॉक्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों की है। हां, यह मेरा निजी अनुभव है, किसी टीवी चैनल की बहस का हिस्सा नहीं है, किसी अखबार में ​लिखी सूचनात्मक खबर पर आधारित नहीं है, किसी से सुनी हुई कहानी नहीं है। इसलिये पढ़ने वाले इस लेख को खुद लेखक मानकर या अपने अनुभव इस लेख के साथ जोड़कर देखेंगे तो मेरी बात से सहमत जरुर होंगे!

रामगोपाल जाट
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)