पायलट जैसी हिम्मत वसुंधरा नहीं दिखा सकतीं, दोनों नेताओं और दलों के आधार पर विश्लेषण

पायलट जैसी हिम्मत वसुंधरा नहीं दिखा सकतीं, दोनों नेताओं और दलों के आधार पर विश्लेषण

जयपुर।
कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के द्वारा जिस तरह से कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत कर अपनी ताकत दिखाने का काम किया गया, क्या वैसा बोल्ड डिसिजन लेकर वसुंधरा राजे अपना कौशल दिखा सकती हैं?

कांग्रेस पार्टी की रीति—नीति और भाजपा के संस्कारों में दिन—रात का अंतर तो है ही, इसके साथ ही सचिन पायलट और वसुंधरा राजे की उम्र, अनुभव, पारीवारिक पृष्ठभूमि, पार्टी के भीतर की स्थिति, केंद्रीय नेतृत्व के काम करने का तौर—तरीका समेत अनैक ऐसे उदाहरण हैं, जो वसुंधरा राजे और सचिन पायलट में बड़ा अंतर पैदा करता है।

सचिन पायलट के परिवार की बात की जाए तो उनके पिता को राजनीति में लाने का श्रेय राजीव गांधी को दिया जाता है। लेकिन एक बार स्व राजेश पायलट ने भी सोनिया गांधी के खिलाफ बगावत कर दी थी। हालांकि, उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं हुआ, और जब उनका निधन हुआ, तब तक वो पार्टी कद्दावर नेता कहलाए।

वसुंधरा राजे की बात की जाए तो उनकी मां विजयाराजे सिंधिया भाजपा की संस्थापक सदस्या हुआ करती थीं। उनके द्वारा पार्टी पर बड़े अहसान किये हुए हैं, जिनके बारे में भाजपा के बड़े नेता जानते हैं। कहा जाता है कि जब पार्टी 1982 के चुनाव मैदान में उतरी थी, तब प्रचार करने के लिए कारें नहीं थीं।

विजयाराजे सिंधिया ने अपने खजाने में से पैसे देकर पार्टी के लिए बड़े पैमाने पर कारें खरीदी गई थीं। इसके चलते उनका आजीवन पार्टी बहुत सम्मान किया। उनके निधन के बाद वसुंधरा राजे का कद बड़ा हुआ और उनको राजस्थान में दो बार मुख्यमंत्री बनने का गौरव भी हासिल हुआ।

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कहा जाता है कि वसुंधरा राजे को साल 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा दरकिनार करने का काम किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से उनकी गतिविधियां भी नाराजगी के तौर पर सामने आ रही हैं।

भाजपा सूत्रों का कहना है कि वसुंधरा राजे को पिछले करीब 20 माह के दौरान नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मिलने तक का वक्त नहीं दिया है। हालांकि, जेपी नड्डा से वो दो या तीन मुलाकातें कर चुकी हैं, लेकिन शीर्ष दो नेताओं से आज भी मुलाकात का इंतजार है।

इधर, सचिन पायलट को 2014 में पार्टी ने परिवर्तन के तौर पर राज्य कांग्रेस को 34 साल की उम्र में पीसीसी प्रमुख बनाया गया। दिसंबर 2013 के चुनाव में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस केवल 21 सीट पर सिमट गई थी, जिसको पांच साल सड़क पर संघर्ष कर पायलट ने 2018 में 100 सीटों पर जीत दिलाई।

कहा जाता है कि अशोक गहलोत के द्वारा 1998 और 2008 की तरह ही कांग्रेस आलाकमान के साथ जुगाड़ कर 2018 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने में कामयाबी हासिल की थी। जबकि प्राकृतिक तौर पर सीएम के दावेदार सचिन पायलट थे। इस बात का सबको पता भी है कि पायलट के नाम पर युवाओं और गुर्जर समाज के द्वारा बड़ पैमाने पर कांग्रेस को वोट दिया गया था।

करीब 18 माह तक मुख्यमंत्री बनने की आस लिये सचिन पायलट अपमान के तमाम घूंट पीते रहे, लेकिन कोरोना के दौरान उनको अपमान का घड़ा भरा हुआ दिखाई दिया और उन्होंने अशोक गहलोत सरकार से बगावत कर दी व अपने साथ 19 विधायक लेकर दिल्ली पहुंच गये।

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इसके बाद राज्य में एक माह तक हाई प्रोफाइल ड्रामा चला। सरकार दो होटलों में रही और पायलट के साथी दिल्ली या हरियाणा में रहे। इस दौरान कांग्रेस की फूट का भाजपा ने जमकर फायदा उठाया। भाजपा ने कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए हर संभव प्रयास किया। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के तौर पर डॉ. सतीश पूनियां के द्वारा सरकार को जमकर घेरा गया।

किंतु सबसे बड़ी बात यह है कि दो बार की मुख्यमंत्री और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने एक शब्द भी नहीं बोला। इसपर आरोप लगे कि वसुंधरा ही गहलोत की सरकार बचाने में जुटी हुई हैं। हनुमान बेनीवाल के द्वारा जमकर आरोप लगाए गए।

इस बीच सरकार ने विधानसभा का सत्र बुला लिया और बहुमत साबित करने के लिए प्रयास तेज कर दिये। गहलोत की सरकार गिरती हुई नजर नहीं आ रही थी और सचिन पायलट के विधायकों की विधायकी पर भी तलवार लटक गई थी।

ऐसे में सचिन पायलट के द्वारा आलाकमान के साथ बात कर अपनी शिकायतों का निपटारा करने की गुहार लगाई गई। कांग्रेस आलाकमान ने उनकी बात मान ली और तीन सदस्य कमेटी का गठन कर दिया। इसके साथ ही प्रदेश प्रभारी बदल दिया गया।

सत्र शुरू होने के एक दिन पहले ही अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच सुलह की तस्वीरें सामने आईं। हालांकि, सचिन पायलट का उप मुख्यमंत्री और पीसीसी चीफ के पद जा चुके थे। ऐसे में विधानसभा में भी उनको और उनके साथी विधायकों को दूर बिठाया गया।

पायलट की इस हिम्मत को लेकर लोगों ने खूब प्रशंसा की, लेकिन इसके साथ ही कहा जाता है कि गहलोत ने भाजपा में भी तोडफोड़ करने में कामयाबी हासिल की। भाजपा के चार विधायक बिना बताए सदन से गायब हो गये तो यह बात और पुख्ता हो गई।

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कहा जाता है कि ये चारों विधायक वसुंधरा राजे के इशारे पर ही गायब हुये थे। इसके साथ ही यह बात भी सच हो गई कि वसुंधरा राजे अशोक गहलोत​ की सरकार को पर्दे के पीछे से बचाने में जुटी हुई थीं। इस सवाल को लेकर भाजपा आज भी कतराती रहती है, लेकिन जानकारों का कहना है कि वसुंधरा राजे के कारण ही गहलोत की सरकार बची थी।

अब सवाल यह उठता है कि यदि राज्य में मध्यावधि चुनाव या 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया गया तो क्या वो भी सचिन पायलट की तरह दम दिखा पाएंगी? सवाल भले ही जल्दी का हो, लेकिन सवाल तो है और संभवत: इसका जवाब भी ना में ही होगा!