बेनीवाल-आरएसएस को लेकर इतने आक्रामक क्यों हुए अशोक गहलोत?

ashok gehlot hanuman beniwal
ashok gehlot hanuman beniwal

जयपुर।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लेकर जिस तरह की आक्रामकता राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दिखाई है, वैसी कभी नहीं दिखाई।

इसके कारणों पर अलग अलग तरह से विशलेषण किया जा रहा है, लेकिन जो सबसे मजबूत चीज निकलकर सामने आई है, वह है जोधपुर का चुनाव।

बात तब अचानक हवा में उछली, जब जोधपुर में वैभव गहलोत को हराने के लिए संघ ने कमर कसी। बताने की जरुरत नहीं कि भाजपा के गजेंद्र सिंह शेखावत संघ से निकले हैं।

जोधपुर में विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे, उसके बाद एबीवीपी के सहारे संघ में चले गए। जहां से अनुमति लेकर उन्होंने भाजपा की मुख्यधारा में प्रवेश किया।

संघ के बारे में कहा जाता है कि जो एबीवीपी और संघ से निकले हुए नेता हैं, उनके लिए संघ पूरी जी जान से मेहनत करता है।

इसके साथ ही जिनको लेकर संघ के उपरी आदेश होते हैं, उन नेताओं के लिए भी संघ आंख बंद करके ईमानदारी से मेहनत करते हैं। इसके परिणाम में भी समय समय पर सामने आए हैं।

जोधपुर में भी ऐसा ही हुआ। दरअसल, गजेंद्र सिंह को टिकट मिलने के साथ ही संघ ने कमान संभाल ली थी। इस आग की घी डालने का काम किया भाजपा के पूर्व विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने।

कहा जाता है कि तिवाड़ी ही संघ की जानकारी अशोक गहलोत को दे रहे थे, जिसके आधार पर ही गहलोत संघ पर आक्रामक होते गए।

बताया जाता है कि जैसे जैसे जोधपुर में संघ का काम बढ़ता गया, वैसे ही अशोक गहलोत का गुस्सा भी तेज हो गया। हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि तिवाड़ी ने ‘घर का भेदी लंका ढहाए’ वाली कहावत को चरित्रार्थ करते हुए संघ के सारे भेद गहलोत को सौंप दिए।

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हालांकि, यह केवल चर्चा की बातें हैं, इनमें सच्चाई हो भी सकती है और नहीं भी। बात जोधपुर की। यहां पर संघ ने कमान संभाली तो एक ही दिन में गहलोत को सबसे ज्यादा परेशान करने वाले नेता बने हनुमान बेनीवाल।

रालोपा के हनुमान ने जोधपुर और राजसमंद में एक ही दिन में ताबड़तोड़ ​रैलियां कर अपने समर्थकों को गजेंद्र सिंह के लिए जान की बाजी लगाने का टारगेट दे दिया।

फिर क्या था। जैसे ही हनुमान की सेना को अनुमति मिली तो वह संघ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में जुट गए।

बताते हैं कि अंतिम पांच दिन में ही अशोक गहलोत अपने बेटे को जीत दिलाने में नाकामयाब हो गए। हालांकि रिजल्ट नहीं आए हैं, फिर भी जो संकेत हैं, वह वैभव की जीत के दिखाई नहीं दे रहे हैं।

तो संघ के साथ अशोक गहलोत की नाराजगी असली वजह यही थी। आपको याद ही होगा कि नागौर में जब ज्योति मिर्धा के नामांकन के बाद रैली में गहलोत ने बेनीवाल के लिए क्या—क्या कहा था।

गहलोत ने एक तरह से लाचारी भरे लहजे में कहा था कि उन्होंने तीन तीन बार मंत्री बनने और कांग्रेस के साथ आने का प्रलोभन दिया था, लेकिन वह जिद्दी हैं, नहीं माने, अब पछताएंगे।

यह गहलोत की धमकी भी हो सकती है और भविष्यवाणी भी। लेकिन इतना तय है कि जितना गहलोत संघ के प्रचार से नाराज थे, उससे ज्यादा बेनीवाल के बढ़ते रुतबे से दुखी नजर आ रहे थे।