राज्यसभा के बाद गहलोत अब इस मिशन में जुटे हैं, 23 जून को हो सकता है पूरा!

जयपुर।
प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के द्वारा कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने के तमाम आरोपों के बीच अशोक गहलोत ने एक बार फिर से अपने सभी विरोधियों की चाल को धत्ता बताते हुए कांग्रेस के दोनों राज्यसभा उम्मीदवारों को जिताने में कामयाबी हासिल कर आलाकमान की नजर में हीरो बनने का अवसर पूरा पूर लिया है।

अब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने दूसरे मिशन पर लग गए हैं। माना जा रहा है कि 23 जून को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में वो यह मिशन भी पूरा करने में सफल होंगे।

यदि गहलोत अपने दूसरे मिशन में सफल होते हैं, तो तय मानकर चलिए कि आने वाले 2023 के विधानसभा चुनाव तक उनको मुख्यमंत्री पद पर चुनौती देने वाला कोई नहीं रहेगा।

दरअसल, कहा यह जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव की जीत के बाद अशोक गहलोत बीते 6 साल से बने अपने सबसे बड़े सियासी दुश्मन, यानी पीसीसी चीफ और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को निपटाने की योजना में व्यस्त हैं।

बता दें कि सचिन पायलट का कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर 3—3 साल के दो कार्यकाल पूरे हो चुके हैं। ऐसे में उनका भी मन अब पीसीसी चीफ के लिए नहीं है। बीते दिनों उन्होंने मीडिया से बात करते हुए इसके संकेत भी दिए थे।

देखा जाए तो राज्यसभा चुनाव में अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को पूरी तरह से विलेन बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। और इसमें वो काफी हद तक कामयाब भी हुए हैं, लेकिन गहलोत अपनी फितरत के मुताबिक दुश्मन को कोई मौका नहीं देते हैं।

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सचिन पायलट ने गहलोत को पिछले डेढ़ साल के दौरान अपने बयानों से काफी परेशान किया है। पहले मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में दोनों में लड़ाई, फिर मंत्रीमंडल के मामले में और अंतत: तीन बार गहलोत से पछाड़ खाये पायलट ने अपनी ही सरकार को हमेशा सवालों के घेरे में रखा है।

इससे अशोक गहलोत सरकार की खूब किरकिरी हुई है। गहलोत ने अपने नकारात्मक प्रचार को भी सकारात्मकता का जामा पहनाकर आलाकमान के समक्ष पायलट को विलेन बनाने का पूरा प्रयास किया है।

अब राज्यसभा चुनाव सम्पन्न हो गए हैं और इस दौरान उन्होंने आलाकमान के सामने सचिन पायलट को बागी करार देने में सफलता अर्जित कर ​ली है। माना जा रहा है कि गहलोत अब आलाकमान पर काफी हावी हैं, इसलिए मौके का फायदा उठाते हुए पायलट को राजस्थान से निपटाने की योजना बना डाली है।

क्योंकि 23 को सीडब्ल्यूसी की मीटिंग होगी, तो इस अवसर का लाभ लेते हुए गहलोत ने पायलट को बाहर का रास्ता दिखाने का प्लान बना लिया है। माना जा रहा है कि यदि पायलट को अध्यक्ष पद गंवाना पड़ता है तो यह भी तय है कि उनका उपमुख्यमंत्री पद भी जाएगा।

ऐसे में राज्य की सियासत में कांग्रेस पार्टी की ओर से चुनौती देने वाला कोई नहीं रहेगा। जिसको लाभ लेते हुए गहलोत अपनी मर्जी से सरकार चलाने और विपक्ष से खुलकर दो—दो हाथ करने को स्वतंत्र होंगे।

सचिन पायलट और कांग्रेस के लिए यह सप्ताह काफी महत्वपूर्ण है। इसमें कांग्रेस पायलट को सेंटर में बुलाकर गहलोत का रास्ता साफ कर सकती है। नहीं तो जुलाई के पहले सप्ताह में संभावित मंत्रीमंडल विस्तार में पायलट को झटका मिलना तय है।