सचिन पायलट बिना पस्त हो गई गहलोत-डोटासरा की कांग्रेस!

sachin pilot ashok gehlot
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जयपुर। इस वर्ष के मध्य जुलाई माह में 13 तारीख को सचिन पायलट (Sachin pilot) ने अशोक गहलोत (Ashok gehlot) की सरकार से हाथ खींच लिये थे, तभी से सचिन पायलट राजस्थान की राजनीति में केवल टोंक जिले की सीमाओं तक सिमट कर रहे गये हैं, परिणाम यह हुआ है कि विधानसभा चुनाव के बाद सबसे बड़े चुनाव, यानी पंचायत समिति चुनाव (Panchayat samiti chunav 2020) में कांग्रेस भाजपा से बुरी तरह मात खा गई है। जबकि ट्रेंड यह रहा है कि राज्य में जिसकी सरकार होती है, पंचायत समिति चुनाव वही दल जीतता रहा है।

अब सवाल यह उठता है कि पंचायत समिति के इस महत्वपूर्ण चुनाव में सचिन पायलट ने कहीं पर भी प्रचार क्यों नहीं किया? जानकारों की मानें तो अशोक गहलोत चाहते थे कि पंचायत समिति चुनाव सचिन पायलट के बिना जीतकर यह साबित करें कि पार्टी उनके बिना भी दिसंबर 2018 (Rajasthan Assembly Election 2018) का चुनाव जीत सकती थी, लेकिन इस परिणाम के कारण अशोक गहलोत की सारी मंशा धरी रह गई।

अब पार्टी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की बात की जाये। डोटासरा वैसे तो गहलोत के ‘यश मैन’ हैं, किंतु वो भी अंदर खाने चाहते थे कि अध्यक्ष के तौर पर उनकी जयकार हो। ऐसे में मन ही मन डोटासरा भी प्रदेश के अध्यक्ष पद पर अपने को स्थापित करने के लिये अशोक गहलोत के अनुसार ही मंशा रखकर चल रहे थे, जो रिजल्ट के बाद उलट पड़ गई।

गहलोत सरकार से हटने के बाद ऐसा नहीं है कि सचिन पायलट ने कहीं पर प्रचार किया ही नहीं, अपितु मध्यप्रदेश के उपचुनाव में प्रचार किया, जहां पर सचिन पायलट के द्वारा प्रचार की गई सीटों पर कांग्रेस जीत गई, तो दूसरी ओर बिहार में भी प्रचार किया, जहां पर भी कांग्रेस को काफी लाभ मिला और उसका परिणाम भी उल्लेखनीय रहा।

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इसके बाद सचिन पायलट कोरोना की चपेट में आ गये और उनको दिल्ली एम्स में भी भर्ती होना पड़ा। इसके बाद राज्य में पंचायत समीति के चुनाव भी आ गये। किंतु कहा जाता है कि उनको चुनाव प्रचार के लिये गहलोत—डोटासरा ने बुलाया ही नहीं और खुद पायलट भी चाहते थे कि यह चुनाव उनके बिना ही लड़ा जाये और सरकार की नाकामी जनता के द्वारा वोट के माध्यम से जाहिर की जाये, जो बिलकुल वैसे ही हुआ।

साफ है कि गहलोत—डोटासरा की मंशा क्या रही होगी? किंतु अब इसका जवाब भी उनको केंद्रीय आलाकमान को देना है। बताया जा रहा है कि डोटासरा की रिपोर्ट ही कांग्रेस नेतृत्व को भेजी जायेगी, जिसके जिम्मेदार भी मुख्यमंत्री गहलोत के बजाय पार्टी अध्यक्ष डोटासरा खुद ही होंगे। यदि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस रिपोर्ट को ध्यान से देख लेंगी और किसी तरह का एक्शन हुआ तो निश्चित ही डोटासरा को भारी पड़ेगा, क्योंकि अध्यक्ष होने के नाते उनकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है।

इस चुनाव की हार या जीत से सचिन पायलट की सियासी सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह ना तो सत्ता में हैं और ना ही संगठन मुखिया। ऐसे में उनकी कोई जिम्मेदारी भी नहीं बनती है। रही बात टोंक के परिणाम की तो वहां पर पायलट जब चाहें मैदान में उतरकर समीकरण बिठा सकते हैं। प्रदेश में उनके चाहने वाले युवाओं की एक बड़ी फौज है, जो अशोक गहलोत या गोविंद डोटासरा से उनको कोसों आगे करती है।

किंतु सवाल यह उठता है कि क्या अशोक गहलोत सचिन पायलट को सत्ता और संगठन से दूर रखने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं? क्या सचिन पायलट को दूर रखने के लिये सीएम अशोक गहलोत को कांग्रेस की बुरी हार भी मंजूर है? तो इसका मतलब यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत कांग्रेस हितैषी नहीं हैं, वो हमेशा की तरह इस बार भी कांग्रेस की लुटिया डुबोना चाहते हैं!