Swine flu के साएं में JLF, पहले ही दिन हादसा, पूर्व विदेश सचिव समेत 4 गंभीर घायल, 3 साल पहले चेताया था

जयपुर।

प्रदेश में भयावह होते स्वाइन फ्लू के साएं में गुरुवार को शुरू हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन फेस्टिवल परिसर में लगे हुए पुराने पेड़ के गिरने से पूर्व विदेश सचिव समेत चार जनों को गंभीर चोटें आई है।

दरअसल दोपहर के भोजन के वक्त दिल्ली गेट परिसर में एक पुराना पेड़ गिर गया। हादसे में पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन समेत चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए जिनके ऊपर पेड़ आ गिरा।

इसी हादसे में जयपुर के सीनियर फोटोजर्नलिस्ट पारस जैन भी चपेट में आ गए उनके सिर और कंधे में गंभीर चोटें आई है। सभी घायलों को अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया है।

बीते कई बरस से जयपुर में आयोजित होने वाले इस लिटरेचर फेस्टिवल की सूरत-ए-हाल बिगड़ चुकी है। पहले के मुकाबले यहां पर ने तो लिटरेचर की बातें होती है और ना ही किसी साहित्य पर किसी आगंतुक का फोकस होता है, जिसके चलते युवा जबरदस्त भ्रमित हो रहे हैं।

एक तरफ जहां पूरा राजस्थान स्वाइन फ्लू की भयानक चपेट में है, तो दूसरी तरफ राजधानी जयपुर के बीचो-बीच लाखों लोगों के शिरकत करने वाले इस साहित्य मेले में सरकार या फेस्टिवल के आयोजकों द्वारा आगन्तुकों को स्वाइन फ्लू से बचाने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया है।

इस दुर्घटना की गंभीरता इसलिए भी दिखाई दे रही है, क्योंकि करीब 3 साल पहले ही डॉ संजीव गुप्ता ने राजस्थान हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें संभावित दुर्घटनाओं समेत कई बिंदु शामिल थे।

बतौर डॉ गुप्ता, जिस बात का अंदेशा था, वही घटना हो गई। इसीलिये मैंने सन 2016 में रजस्थान हाइकोर्ट मे पीआइएल, यानि जनहित याचिका लगाई थी, जो कि मेरी मजबूरी थी। आम जनता की सुरक्षा हेतु हाईकोर्ट ने कहा था कि आयोजक व सरकार जनता की सुरक्षा के समस्त बिंदुओं का ध्यान में रखकर पालन करें।

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डॉ गुप्ता आगे बताते हैं कि पहले दिन की यह दुर्घटना हाईकोर्ट की अवमानना है। कोर्ट की शरण में जाना, जयपुर जैसे शांत शहर में एक बार फिर एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के नाम पर, जो कि धन कमाने के लिए एक होटल व इसके संचालकों द्वारा आयोजित किया जाता है।

वो आगे बताते हैं कि इसमें कुछ साहित्यकार जान बूझकर सस्ती लोकप्रियता के नाम पर जाति के नाम पर या राष्ट्र गान का समय कम करके या कुछ उट-पंटांग लिखते-बोलते हैं। फिर माहोल को खराब करते हैं, जैसा कि पहले कई बार हुआ है। अब लाखों की इस भीड़ को कौन संभालेगा?

पूरा का पूरा शहर जाम में फंस जाता है। पास में राज्य के सबसे बड़े सवाई मान सिंह और ट्रोमा अस्पताल में मरीजों के आने-जाने का रास्ता ब्लोक हो जाता है। कई गंभीर मरीजों की जान पर बन आती है ?

सवाल भरे लहजे में याचिकाकर्ता डॉ गुप्ता कहते हैं, है कोई इस शहर का रखवाला? क्या इस तरह के आयोजन इतनी सी छोटी जगह में होने चाहिए? अब आप पिछले साल की तस्वीरों और खबरों को पढ़कर अंदाजा लगाएं कि क्या होना चाहिए?

बकौल डॉ. गुप्ता यह कितना गंभीर सवाल है कि एक सीनियर फोटोजर्नलिस्ट को सिर में एक दर्जन टांके आते हैं और उनको फेस्टिवल के आयोजन कर्ताओं द्वारा एक निजी अस्पताल में करीब 12 किलोमीटर दूर ले जाकर भर्ती करवाया जाता है, जबकि 1 किलोमीटर के दायरे में उत्तर पश्चिमी भारत का सबसे बड़ा सवाई मानसिंह अस्पताल में मौजूद है, जहां देश दुनिया से मरीज उपचार के लिए आते हैं। क्या यह फेस्टिवल लूट का अड्डा नहीं बन गया है?

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