मुकेश भाकर-रामनिवास गावड़िया: 2 युवा योद्धा, एक कहानी, एक सी निशानी

जयपुर।

कहते हैं व्यक्ति की किस्मत उसको कहां से कहां ले जा सकती है। आदमी को आसमान से जमीन पर और जमीन से आसमान तक पहुंचाने का काम वक्त और किस्मत ही करती है।

एक अदद असफलता के बाद व्यक्ति हतोत्साहित हो जाता है। जिसके चलते कई बार उसको मिलने वाले संभावित सफलता भी हाथ नहीं लग पाती है। ऐसी ही कुछ हस्तियां हैं जिनको असफलता ही हाथ लगी, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर देखा नहीं और रुकने का नाम नहीं लिया, जिसके चलते आज सफलता उनके कदम चूम रही है।

ऐसी ही दो राजनीतिक हस्तियों से आज हम आपको रूबरू करवाएंगे, जिन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय में लगभग एक ही तरह से असफलता हासिल की, लेकिन उन्होंने अपने अटल इरादों के चलते मेहनत करना नहीं छोड़ा। परिणाम यह रहा कि आज उनको राजस्थान की सबसे बड़ी पंचायत में जगह मिल गई है।

ऐसी ही एक सियासी हस्ती है राजस्थान विश्वविद्यालय का छात्रसंघ चुनाव लड़ चुके मुकेश भाकर। मुकेश भाकर को साल 2010-11 के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवार मनीष यादव के सामने बेहद कम वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

किंतु मुकेश भाकर ने हारने के बाद अपनी राजनीति की यात्रा यहीं खत्म नहीं की और पूरे जुनून के साथ अपने लक्ष्य के लिए जुट गए। नतीजा यह रहा कि उन्होंने तब हार स्वीकार कर खुद को अधिक मजबूत किया। इसके बाद एनएसयूआई में काम किया और 2013 में अध्यक्ष बने।

अगले साल मुकेश भाकर ने अपने दम पर प्रभा चौधरी को छात्र संघ चुनाव के लिए मैदान में उतारा और जबरदस्त जीत हासिल करने में कामयाबी पाई। उल्लेखनीय बात यह है कि प्रभा चौधरी राजस्थान विश्वविद्यालय की पहली महिला छात्र संघ अध्यक्ष बनीं।

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यह मुकेश भाकर की कड़ी मेहनत और दूरदृष्टि सोच का नतीजा था कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ना केवल प्रभा चौधरी ने जीत दर्ज की, बल्कि तब उनको टिकट नहीं देने वाले संगठन एनएसयूआई और प्रतिद्वंदी एबीपी को करारी मात दी। शायद वही मजबूत नींव थी, जिसके दम पर मुकेश भाकर ने आज विधायक बनने में कामयाबी हासिल की है।

लाडनूं विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनकर पहली बार राजस्थान की सबसे बड़ी पंचायत, यानी राजस्थान विधान सभा में पहुंचे मुकेश भाकर ने विधायक के रुप में शपथ लेने के साथ ही इतिहास में ऐसे जनप्रतिनिधि के तौर पर नाम दर्ज करवा लिया, जो राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ अध्यक्ष नहीं बन सके, लेकिन पहली ही बार में विधायक अवश्य बन गए।

मुकेश भाकर की तरह दूसरा नाम है नागौर जिले की तहसील परबतसर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनकर आए रामनिवास गावड़िया। रामनिवास गावड़िया भी राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं।

राजस्थान विवि की छात्र राजनीति में उन्होंने भी दो दो हाथ किए हैं, लेकिन पूरी तैयारी के बावजूद लिंगदोह कमेटी की शिफारिशों के कारण संगठन द्वारा अंत समय में उनको टिकट नहीं दिया गया। जिसके वह चलते विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ सके।

भले ही रामनिवास गावड़िया राजस्थान विश्वविद्यालय की सियासत का चुनाव लड़कर छात्रसंघ अध्यक्ष नहीं बन पाए हो, लेकिन महज 3 साल के भीतर ही उन्होंने नागौर जिले के परबतसर सीट से विधायक का चुनाव लड़ते हुए राजस्थान विधानसभा में पहुंचने में कामयाबी हासिल की है।

राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहते हुए वैसे तो राज्य विधानसभा के भीतर आज करीब एक दर्जन विधायक मौजूद हैं, लेकिन मुकेश भाकर और रामनिवास गावड़िया ऐसे विधायक बने हैं, जो छात्रसंघ का चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन विधायक का चुनाव पहली ही बार में जीतने में कामयाब हुए हैं।

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अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दोनों युवा विधायक किस तरह से जनता की उम्मीदों पर खरे उतरते हुए एक जनप्रतिनिधि के रूप में विधानसभा के भीतर सरकार को जनता की समस्याओं से रूबरू करवाते हैं।

राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव बनने के बाद विधायक का चुनाव जीतने वाले कालीचरण सर्राफ, महेश जोशी, महेंद्र चौधरी, हनुमान बेनीवाल, प्रताप सिंह खाचरियावास, अशोक लाहोटी राजस्थान विधानसभा में विधायक बनकर अगले 5 साल तक राज्य की जनता का प्रतिनिधित्व करेंगे।