मेरी गुड़िया*********


नई फ्रॉक पहने है गुड़िया।चहके ऐसे जैसे चिड़िया।।
चेहरे पर छाई मुस्कान।गुड़िया में भी आई जान।।
मैं गुड़िया लाई मेले से।बुधई काका के ठेले से।।
काका बोले-“खूब हँसेगी।संग तुम्हारे जब खेलेगी।।”
सच में ये मुस्का देती है।खुश हो गाना गा देती है।।
मेरी सच्ची सखी बनी है।देखो! कैसी बनी-ठनी है।।
कहती हैं यह मेरी दादी।अब कर दो तुम इसकी शादी।।
गुड़िया को भेजूँ ससुराल? रो रो हो जाऊँ बेहाल??
नहीं नहीं जी! माफ करो।थोड़ा तो इंसाफ करो।।
गुड़िया क्या है मुझपे भार?मुझको इससे बेहद प्यार।।


-गौरव वाजपेयी “स्वप्निल”

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