लोहे का गेट तोड़कर कुलपति की टेबल पर कूदने वाला ‘लड़ाका’ 15 साल से सरकार की छाती पर कूद रहा है-

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रामगोपाल जाट।

तब राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव आने वाले होते थे तो छात्रों की समस्याओं को लेकर छात्र नेता विश्वविद्यालय प्रशासन से सीधा टकराव करते थे।

पुलिस का दखल विश्वविद्यालय के भीतर नहीं थी। विश्वविद्यालय प्रशासन के कहने पर पुलिस छात्र नेताओं को विश्वविद्यालय गेट तक रोक सकती थी, विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति से वहीं से गिरफ्तार कर सकती थी।

आज की तारीख में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। विश्वविद्यालय में पुलिस प्रशासन की न केवल खुलेआम दखलअंदाजी है, बल्कि हालात यह हो गए हैं कि छात्र नेता बने रहने और छात्र संघ अध्यक्ष बनने के लिए पुलिस के छोटे-छोटे कर्मचारियों का आशीर्वाद होना भी अपरिहार्य हो चुका है। पुलिस कांस्टेबल्स के सामने भी आज के छात्र नेता असहाय नजर आते हैं।

समय-समय की बात है। तब विश्वविद्यालय छात्रों की समस्याओं को निपटारे के लिए छात्र राजनीति का अखाड़ा हुआ करता था, अब यही स्टूडेंट्स पॉलिटक्स ऊपरी राजनीति की सीढ़ी बची है। नामांकन दाखिल करते हनुमान बेनीवाल-

आज न ऐसे छात्र नेता हैं, जो छात्रों की समस्याओं को लेकर विश्वविद्यालय से टकरा सकें, न ही विवि के मैन गेट पर पुलिस और छात्रों के बीच लाठी-भाटा-जंग होने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन पाती हैं।

यह वह दौर था, जब छात्र नेताओं द्वारा छात्रों की समस्याओं को लेकर होने वाले आंदोलनों पर विधानसभा में घंटों चर्चा हुआ करती थी। कई विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर छात्रों की समस्याओं को लेकर मुखर हो जाया करते थे।

यह वह दौर था, जब एक छात्र नेता छात्रों की दिक्कत, और उनकी मांगों को लेकर कुलपति सचिवालय का लोहे का गेट तक तोड़कर, कुलपति की टेबल पर चढ़कर प्रदर्शन करने की हिम्मत रखा करते थे।

बावजूद इसके विश्वविद्यालय प्रशासन की मजाल कि ऐसे किसी छात्र नेता को पुलिस के हाथों सुपुर्द कर देे।। पुलिस के आला अफसरों की भी छात्र नेताओं पर हाथ डालने से पहले सोचना पड़ता था।

लेकिन समय बदलता गया और आज छात्रसंघ अध्यक्ष विश्वविद्यालय के खिलाफ 1 दिन भी कुलपति सचिवालय के बाहर खड़ा नहीं होता है। ऐसे वक्त में छात्र खुद अपनी समस्याओं को लेकर कुलपति के आगे गिड़गिड़ाते रहते हैं।

ऐसा लगता है छात्र नेता छात्रसंघ अध्यक्ष बनते ही दूसरे ही दिन से छात्र नेता विधायक बनने के सपने देखने लग जाता है। छात्रों की समस्याओं को लेकर छात्र नेताओं के दिल में अब कोई दर्द नहीं है।

वह अपने लिए विधानसभा क्षेत्र की तलाश में लग जाता है, उसको समर्थित राजनीतिक पार्टी के आकाओं के पदचंपी करने लग जाता है, टिकट के लिए ढोक-विनती करना शुरू कर देता है।

खैर! हम बात कर रहे हैं छात्र संघ के उस स्वर्णिम युग कि, जब एक-एक वोट के लिए छात्र नेता हवाई चप्पलों में घूमते हुए विश्वविद्यालय परिसर में दिन भर चक्कर काटता रहता था।

तीन-तीन साल तक लगातार चुनाव लड़ने के बाद भी बड़ी मुश्किल से किसी कद्दावर छात्र नेता को राजस्थान विश्वविद्यालय का छात्र संघ अध्यक्ष बनने का मौका मिल पाता था।

विश्वविद्यालय का छात्र संघ अध्यक्ष बनने के बाद वे खुद को सबसे खुशनसीब मानने लगता था, उसका रुतबा भी ऐसा ही था। जब शहर में छात्रसंघ अध्यक्ष निकलता था, तो किसी कैबिनेट मंत्री से कम उसका रुतबा नहीं था।

कई मंत्री उसके घर तक मिलने के लिए आ जाया करते थे, विधायकों की तो बात ही अलग थी। उनको टिकट देने के लिए पार्टियां लालायित रहती थीं।

सामन्तशाही का अंत बना किसानों के लिए उदय युग

1957 में दूसरे विधानसभा के वक्त राजस्थान, खासकर पश्चिमी राजस्थान में भूमि आंदोलन और सामंतवादी प्रथा के खिलाफ उग्र आंदोलन शुरू हो चुके थे।

जमीन से जुड़े हुए कई सरपंच और छात्र नेता भी अब मुख्यधारा में आने के लिए लालायित थे। आंदोलन में कई लोगों की भीड़ उनके साथ चलना एक आम बात थी। एक आवाज पर हजारों लोगों को इकट्ठा करना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था।

“जो बोए, उसकी जमीन और जो खोए उसकी सामंतशाही का अंत”, इस तरह की बातें गांव-गांव में उछलने लगी थीं। पूरे प्रदेश में मानों एक आंदोलन खड़ा हो गया था।

जोधपुर संभाग में किसान परिवार से निकले परसराम मदेरणा, नागौर बलदेव राम मिर्धा के बाद नाथूराम मिर्धा और रामनिवास मिर्धा ऐसे ही किसान नेता हुआ करते थे, जो किसानों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं थे।

कुंभाराम आर्य इनमें अलग ऐसी छवि रखते थे, जिनके लिए किसान अपनी जान भी देने को तैयार थे। तब राजनीति उनके लिए काफी छोटी चीज हुआ करती थी।

अलबत्ता, नेता राजनीति को किसानों की समस्याओं के लिए माध्यम मानते थे। आज के राजनेताओं की तरह नहीं थे, जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए किसानों की समस्याओं को ही माध्यम मान बैठे हैं।

समय गुजरता गया और राजस्थान में राजनीतिक परिदृश्य भी बदलता गया। साल 1962 में 36 सीट और वर्ष 1967 में 48 सीटों के साथ स्वतंत्र पार्टी सामंतशाही के खिलाफ खड़ी हो चुकी थी। एक मंच पर तीन दिग्गज-

किसान नेता इस पार्टी के साथ जुड़े हुए थे। कांग्रेस पार्टी को खुद को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही थी। ऐसे वक्त में कांग्रेस की केंद्र सरकार ने देश में किसानों को ही जमीन का मालिकाना हक दे दिया।

“जो किसान, जिस जमीन को जोत रहा था”, उसी का मालिक बना दिया गया। इसका सबसे बड़ा इंपैक्ट यह हुआ कि राजस्थान में जो किसान कांग्रेस पार्टी से छिटक चुके थे, वह फिर से जुड़ने लगे।

वक्त बदलता गया और 1970 का समय ऐसा भी वक्त आया, जब राजस्थान में चुनाव से पहले विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया गया।

कई दिग्गज राजनेताओं की सीटें खिसक चुकी थीं, जिसके चलते कईयों का वजूद खत्म होने की कगार पर था, लेकिन इस दौर में भी परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा, शीशराम ओला जैसे नेताओं को कहीं कोई दिक्कत नहीं हो रही थी।

कुछ नए राजनेता, जो कि पंचायती राज से उठकर विधानसभा तक पहुंचने की कगार पर थे, उनके लिए यह परिसीमन बेहद खास बनने जा रहा था।

विद्रोही रामदेव बेनीवाल बने विधायक, और बागी भी हो गए

परिसीमन के बाद 1977 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में जनसंघ की ओर से कद्दावर नेता के रूप में उभरते हुए भैरों सिंह शेखावत ने प्रदेश में 152 सीटों पर विजय हासिल की कांग्रेस। जो कांग्रेस 1972 में 145 सीटों पर थी, उसको आपातकाल ने ऐसी लात मारी कि वह खिसक कर महज 41 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हो सकी।

इन 41 सीटों में कांग्रेस के पास मूंडवा विधानसभा की वह सीट भी थी, जो पहली बार विधानसभा क्षेत्र के रूप में अपना नाम दर्ज करवा रही थी। इस सीट पर जीतने वाले थे बरण के सरपंच रामदेव बेनीवाल।

रामदेव बेनीवाल स्वभाव से ही विद्रोही प्रवृत्ति के आदमी थे, लेकिन आम आदमी, किसान और गरीब के लिए उनके मन में अगाध प्रेम था, जिसके चलते वे कम समय में ही सरपंच से विधानसभा तक पहुंच गए।

1977 में रामदेव बेनीवाल पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़े थे और पहली बार में विधानसभा के गलियारों तक विधायक के रुप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में भी कामयाब रहे थे। लेकिन कांग्रेस की नेत्री और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उसके कुछ ही समय बाद देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।

इसके बाद देश में गैर कांग्रेसी सरकारों को एक के बाद एक बर्खास्त कर दिया गया। स्वभाव से ही बागी विचारों के रामदेव बेनीवाल की ऐसे में कांग्रेस पार्टी के साथ पटरी नहीं बैठी और उन्होंने 1978 में, एक साल बाद ही पार्टी छोड़ दी।

लेकिन 1980 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय रामदेव बेनीवाल को कांग्रेस के मिर्धा परिवार के नौजवान हरेंद्र मिर्धा से 8505 मतों से शिकस्त खानी पड़ी।

रामदेव बेनीवाल अपनी हार को पचा नहीं पा रहे थे, तो दूसरी तरफ किसानों का साथ उनको लगातार उत्साहित रखता था, तो उन्होंने ज़मीनी संघर्ष जारी रखा।

साल 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्हीं हरेंद्र मिर्धा को रामदेव बेनीवाल ने 3885 पदों से शिकस्त देकर बदला ले लिया।

यह चुनाव रामदेव बेनीवाल ने निर्दलीय लड़ा था, जिसके चलते विधानसभा में उनकी ने तो कांग्रेस पार्टी के साथ पटरी बैठी और ना ही नई नवेली भारतीय जनता पार्टी के साथ गलबहियां हुई।

इस दौरान उनकी और भैरों सिंह शेखावत, दोनों में करीबयां बढ़ रही थीं। वर्ष 1977 का बदला लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत फिर से प्रदेश में सत्तासीन होने के लिए कांग्रेस की नीतियों को सड़क पर कोस रहे थे, तो रामदेव बेनीवाल नागौर में अपना रुतबा बढ़ाने में लगे हुए थे।

साल 1990 के विधानसभा चुनाव में मूंडवा से हबीबुर्रहमान मैदान में उतरे। कांग्रेस पार्टी ने उनको टिकट दिया था, तो दूसरी तरफ रामदेव बेनीवाल फिर से निर्दलीय दम ठोक रहे थे।

दोनों के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा था, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार मैदान में होने के कारण रामदेव बेनीवाल का वोट बैंक बंट गया, और उनको हार का सामना करना पड़ा।

यही कहानी एक बार फिर से 1993 के मध्यावधि चुनाव में दोहराई गई है। कांग्रेस के हबीबुर्रहमान विधायक बने और रामदेव बेनीवाल दूसरी बार मैदान में चित हो गए।

रात को 2 बजे खुली सेंट्रल जेल

इधर, रामदेव बेनीवाल हारकर किसानों की राजनीति कर रहे थे, उनकी समस्याओं को लेकर नागौर में प्रशासन के साथ लगातार जूझ रहे थे, तो दूसरी तरफ उनके बेटे राजस्थान विश्वविद्यालय के महाराजा कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव लड़ रहे थे।

1994 में रामदेव बेनीवाल के बेटे हनुमान बेनीवाल महाराजा कॉलेज छात्रसंघ अध्यक्ष बन गए। 1995 दूसरी बार हनुमान बेनीवाल महाराजा कॉलेज से फिर छात्र संघ अध्यक्ष बने।

इसके बाद हनुमान बेनीवाल राजस्थान विश्वविद्यालय के विधि महाविद्यालय से 1996 में छात्रसंघ अध्यक्ष बने। उनका सपना बिल्कुल स्पष्ट था, दृष्टि स्पष्ट थी और छात्रों के लिए दिन रात मेहनत करते रहते थे।

विवि प्रशासन के साथ उनका सीधा टकराव रहता था। कभी पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन से किसी भी मामले को लेकर उन्होंने मात नहीं खाई थी। उन्होंने अपनी दबंगई कायम रखी।

1996 में राजस्थान विश्वविद्यालय के महेंद्र चौधरी छात्रसंघ अध्यक्ष बने थे। उनका कार्यकाल करीब आधा ही बीता था, कि हनुमान बेनीवाल अगले साल की तैयारी के लिए पूरे जोर-शोर से विश्वविद्यालय में छात्रों की समस्याओं को लेकर प्रशासन के साथ टकराने लगे थे।

छात्रों की समस्याओं को लेकर बेनीवाल कुलपति सचिवालय के बाहर लगे लोहे के गेट को तोड़ते हुए कुलपति की टेबल पर चढ़ गए। साथी छात्र रहे लोग बताते हैं कि जब तक कुलपति ने छात्रों की समस्याओं को लेकर उन्हें लिखित में कागज नहीं दिया, तब तक हनुमान बेनीवाल टेबल से नहीं उतरे।

पुलिस प्रशासन का दखल था नहीं, उनको हटाने कौन आता? और ऐसे में कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन के पास दूसरा रास्ता भी नहीं था।

राजस्थान में ज़मीन से उठे भैंरो सिंह शेखावत की सरकार थी, तो दूसरी तरफ राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्र नेताओं की सरकार थी, जो अधिकांश किसान परिवार से आए हुए थे।

नागौर, चूरू, सीकर और झुंझुनूं जिलों के छात्रों और छात्र नेताओं का राजस्थान विश्वविद्यालय में एकछत्र राज था। किसान परिवार से आने वाले छात्रों को राजस्थान विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिए जूझना पड़ता था।

तब भी 12वीं कक्षा पास करने के बाद, उसी में आए अंकों के आधार पर विश्वविद्यालय में उनका एडमिशन होता था। मतलब मेरिट के आधार पर ही प्रवेश होता था।

ऐसे में चुनाव जीतने की तैयारी में जुटे इन छात्र नेताओं ने किसान वर्ग से आए हुए ग्रामीण परिवेश के छात्रों को राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए 5% अतिरिक्त अंक छूट देने की मांग उठाई।

छात्रसंघ अध्यक्ष महेंद्र चौधरी और छात्र संघ अध्यक्ष बनने के लिए तैयारी कर रहे हनुमान बेनीवाल ने मिलकर विश्वविद्यालय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर करीब 3 घंटे तक पुलिस और छात्रों के बीच लाठी-भाटा-जंग चलता रहा। पुलिस और छात्रों के बीच ऐसी लड़ाइयां अब नहीं देखनी होती।

आखिरकार पुलिस प्रशासन ने 5 छात्र नेताओं के गिरफ्तार किया, जिनमें छात्रसंघ अध्यक्ष खुद महेंद्र चौधरी और लॉ कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष हनुमान बेनीवाल भी शामिल थे। दोनों छात्र नेताओं के साथ ही सभी पांचों छात्रों को केंद्रीय कारागृह भेज दिया गया।

एक तरफ राजस्थान असेंबली चल रही थी और उसी वक्त छात्र नेताओं का विद्रोह तेजी से बढ़ रहा था। जेल में बंद छात्र नेताओं को छुड़ाने के लिए छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार को बंद करके वहीं पर धरना दे दिया।

विधानसभा के भीतर ही कई विधायकों ने मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत से अपील कर छात्रों को रिहा करने की मांग की। इसको लेकर काफी हंगामा हुआ।

राज्य सरकार ने विधायकों की बात मानते हुई 5 छात्र नेताओं को जेल से छोड़ने के आदेश जारी कर दिए, लेकिन विद्रोह बढ़ता गया और दूसरे दिन का इंतजार नहीं हो सका।

इसके चलते सरकार को रात को अपना निर्णय केंद्रीय कारागृह भेजना पड़ा। जेल नियमों के मुताबिक अब तक किसी भी कैदी को सूर्यास्त के बाद रिहा नहीं किया गया था, लेकिन पहली बार जेल के दरवाजे रात को 2:00 बजे खुले और बाहर आए महेंद्र चौधरी, हनुमान बेनीवाल समेत पांचों छात्र नेता। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर रात को ही जश्न मनाया गया।

राजनीति में भी नहीं हो सका खुशी से पदार्पण

1998 का विधानसभा चुनाव आ चुका था। सभी के नॉमिनेशन फाइल किए जा चुके थे। रामदेव बेनीवाल मूंडवा विधानसभा से चुनाव लड़ रहे थे।

प्रदेश में 8 दिसंबर को चुनाव होने दे, लेकिन अचानक ही 12 नवम्बर को दिल का दौरा पड़ने से रामदेव बेनीवाल का निधन हो गया।

उनकी जगह समाज के पंचों ने निर्णय किया कि हनुमान बेनीवाल को विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा। लेकिन जब वह नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए गए तो समय बीत गया था, ऐसे में चुनाव नहीं लड़ सके।

सामंतशाही प्रथा के खिलाफ किसानों के लिए लड़ते हुए हनुमान बेनीवाल नागौर में अपना सिक्का जमाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन 10 मार्च 2001 को उन्हीं के इलाके में एक पंचायत हुई। पंचायत में गोली लगने से एक व्यक्ति की मौत हो गई।

पुलिस ने हनुमान बेनीवाल, उनके भाई सहित कई लोगों को आरोपी बनाया और गिरफ्तार कर लिया। युवा हनुमान बेनीवाल 88 दिन तक केंद्रीय कारागृह रहे।

संविधान की धारा 167 के अनुसार 90 दिन में चार्जशीट दाखिल करने का नियम है। जेल अधीक्षक चाहे तो कोई अपराध नहीं बनते देख किसी कैदी को धारा 169 के तहत छोड़ सकता है। इसका फायदा देते हुए हनुमान बेनीवाल को 88 दिन के बाद जेल से रिहा कर दिया गया।

प्रदेश में भाजपा के भैरोंसिंह शेखावत का समय राजस्थान की राजनीति में समाप्ति की तरफ था, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 5 साल के कुशासन को हटाने के लिए वसुंधरा राजे के रूप में एक नई राजनीतिक शक्ति का 2003 में उदय हो रहा था।

इस दौरान बीजेपी की विचारधारा रखने के बावजूद हनुमान बेनीवाल के लिए टिकट की कोई जगह नहीं थी। उन्होंने ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी, लोक दल से टिकट लेकर परिसीमन के बाद बनी नई विधानसभा क्षेत्र खींवसर से ताल ठोक दी।

इस बार हनुमान बेनीवाल को विजय पूनिया की पत्नी और बीजेपी की उम्मीदवार उषा पूनिया के साथ बने त्रिकोणीय सियासी समीकरण के चलते कांग्रेस हबीबुर्रहमान रहमान के सामने 3303 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

भैरों सिंह शेखावत परिवार के साथ रामदेव बेनीवाल की नज़दीकियां थी। ऐसे में शेखावत के सहारे हनुमान बेनीवाल ने बीजेपी ज्वाइन कर ली।

2008 के चुनाव में जीतकर हनुमान बेनीवाल को पहली बार विधानसभा में जाने का मौका हासिल पाया। इसके बाद बेनीवाल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, लेकिन 2009 में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे के साथ अनबन के चलते हनुमान बेनीवाल ने पार्टी छोड़ दी।

उन्होंने 2013 में प्रदेश में आई नरेंद्र मोदी लहर के सामने भी खींवसर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय के रूप में दूसरी बार चुनाव लड़ा और जीतने में कामयाब रहे।

बीते 5 साल में हनुमान बेनीवाल राजस्थान विधानसभा में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी और विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।

कैबिनेट मंत्री यूनुस खान और राजेंद्र राठौड़ के अलावा खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भी हनुमान बेनीवाल ने बीते 5 साल के दौरान जमकर घेरा है।

कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल को लेकर हनुमान बेनीवाल ने राज्य सरकार को हमेशा निशाने पर रखा। किसानों और युवाओं की बात करने वाले बेनीवाल ने पिछले दो साल के दौरान नागौर में ही नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान में अपना वर्चस्व कायम करने में कामयाब रहे।

इस दौरान बेनीवाल ने राजस्थान में पांच बड़ी रैलियां कर के राज्य की सियासत को नई दिशा दे दी। अब राज्य में युवा और किसान राजस्थान में हनुमान बेनीवाल में परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, कुंभाराम आर्य और शीशराम ओला के रूप में किसान नेता देख रहा है।

27 जून 2006 को आनंदपाल द्वारा जीवन राम गोदारा की हत्या करने के बाद बीजेपी नेताओं और बेनीवाल के बीच उपजे विवाद को थामा नहीं गया, जिसके कारण बेनीवाल की बीजेपी से दूरियां बढ़ती गईं।

इन 5 बरसों में कभी भी कैबिनेट मंत्री यूनुस खान और राजेंद्र राठौड़ के साथ हनुमान बेनीवाल की पटरी नहीं बैठी, और इसके चलते राजस्थान सरकार के साथ उनकी अनबन पूरे 5 साल तक बनी रही।

राजस्थान में बेनीवाल ने सबसे पहले नागौर, फिर बाड़मेर, बीकानेर और सीकर में बड़ी रैली की। 29 अक्टूबर को जयपुर में भारी भीड़ के सामने हनुमान बेनीवाल ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी नामक अपने ही राजनीतिक दल का गठन कर लिया।

अब बेनीवाल तीसरा मोर्चा बनाकर प्रदेश से कांग्रेस और भाजपा की 5-5 साल वाली सरकारों को उखाड़ फेंकने का संकल्प ले चुके हैं।

अपनी रैली में हनुमान बेनीवाल युवा और किसानों से आहवान कर चुके हैं, कि अगर इस बार उन्होंने बीजेपी और कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए उनका साथ नहीं दिया, तो प्रदेश में आने वाले 50 साल तक कोई लड़ाका तैयार नहीं होगा।

अपनी गाड़ी में मौजूद रहते 24 घंटे तेजाजी के भजन बजाने, अपने हर कार्यक्रम से पहले, और कार्यक्रम के बाद तेजाजी के देवरे पर जाकर उनको ढोक लगाने वाले हनुमान बेनीवाल केवल तेजाजी को ही अपना इष्ट मानते हैं।

आपको एक बार फिर से याद दिला दें कि 1996 में राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्र नेता के तौर पर तैयारी करते हुए छात्रों की समस्याओं के लिए हनुमान बेनीवाल कुलपति सचिवालय के गेट को तोड़ कर उनकी टेबल पर कूदने लगे थे।

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