जयपुर।
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बीजेपी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बन गई हैं। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर वसुंधरा राजे की नियुक्ति के साथ ही पार्टी के इस फैसले की सकारात्मक बातें और नकारात्मक पहलू भी चर्चा में आने लगे हैं।

वसुंधरा राजे अब बीजेपी के केन्द्रीय संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की भूमिका में होंगी। पार्टी की तरफ़ से बड़ी जि़म्मेदारी मिलने के बाद पूर्व मुख्यमन्त्री ने बीजेपी संगठन के साथ ही राष्ट्रीय अध्य्क्ष अमित शाह और प्रधामन्त्री नरेन्द्र मोदी का आभार जताया है।

ट्विटर पर नई ज़िम्मेदारी और केन्द्रीय नेतृत्व की शुभकामनाओं के लिए आभार जताते हुए वसुंधरा राजे ने कहा कि उन पर भरोसा जताते हुए पार्टी ने जो ज़िम्मेदारी दी है, उसका निर्वहन वह पूरी निष्ठा से करेंगी।

पार्टी के इस फैसले के बाद यह बिलकुल स्पष्ट हो गया है कि राज्य में 17 साल से चला आ रहा वसुंधरा राजे का सियासी काल समाप्त हो चुका है। अब बीजेपी नए नेतृत्व को तैयार करने की ओर अग्रसर है।

चर्चा है कि किसी युवा चेहरे को आगे किया जाएगा, ताकि लम्बे समय तक उसके नेतृत्व में पार्टी आगे बढ़ सके। इसके साथ ही ऐसे नेता का आलाकमान के नजदीक होना भी एक शर्त हो सकती है।

समझा जा रहा है कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़, सतीश पूनिया, सुनील बंसल, या ऐसे ही किसी सर्वमान्य नेता को राजस्थान की जिम्मेवारी सौंपी जा सकती है। इसका फैसला जल्द होगा नहीं तो भी संकेत जरूर मिल जाएंगे।

इससे पहले पार्टी की स्थापना से लेकर 2002 तक के कालखंड को भेरूसिंह शेखावत कार्यकाल माना जाता है। कहा जा रहा है कि राज्य की लीडरशिप को पूरी तरह अपने कंधे पर लेकर चलने वाला दूसरा नेता राजस्थान से विदा हो गया है।

आपको बता दें कि वसुंधरा राजे ने सबसे पहले 1985 में विधानसभा का चुनाव लड़ा था। उसके बाद झालावाड़ से लोकसभा में गईं। जहां लगातार सांसद रहीं। नवम्बर 2002 में उनको राजस्थान की कमान सौंपी गई।

जिसके बाद झालरापाटन से 2003 में विधायक बनीं और उसी समय 120 सीटें जीतकर भाजपा ने सत्ता प्राप्त की। पार्टी राजे के नेतृत्व में 2008 का चुनाव हार गई। किन्तु वसुंधरा राजे नेता प्रतिपक्ष बनीं। साल 2013 में मोदी लहर पर सवार भाजपा ने ऐतिहासिक रूप से 163 सीटें जीतीं, और वसुंधरा राजे दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं।

लेकिन हाल ही में पार्टी उनके नेतृत्व में फिर चुनाव हार गई। हालांकि 2008 और 2018 की हार भाजपा के लिए कांग्रेस की तरह शर्मनाक नहीं रही। पार्टी ने 10 साल पहले 78 और अब 73 सीटों पर जीत दर्ज की।

इधर, वसुंधरा राजे के केन्द्र में जाने के साथ ही पार्टी में इस बात की चर्चा भी शुरू हो गई है कि इस फ़ैसले से बीजेपी को फायदा होगा या नुकसान?

वसुंधरा राजे केंद्र में जाने से क्या होंगे सकारात्मक बदलाव?

  1. चुनाव से पहले पार्टी का एक धड़ा मानता था कि वसुंधरा राजे के नेतृत्व के चलते राजस्थान में बीजेपी के प्रति नकारात्मक माहौल बन रहा है और संगठन को अब वसुंधरा राजे की ज्यादा जरूरत नहीं है। लेकिन केंद्र ने राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर यह संकेत दिया है कि बीजेपी में अभी भी वसुंधरा राजे अहम भूमिका में रहेंगी।

  2. वसुंधरा राजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने से राजस्थान की गतिविधियों में उनका दखल कुछ हद तक कम हो सकता है। ऐसे में पार्टी का जो धड़ा वसुंधरा राजे की सक्रियता के चलते बीजेपी के संगठन से दूर चल रहा था वह अब पार्टी में फिर से सक्रिय होता दिखाई देगा।

  3. वसुंधरा राजे के केंद्र में प्रमोशन के साथ ही राजस्थान का महत्व बीजेपी के संगठन में बढ़ा है। अब बीजेपी में राजस्थान से दो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हो गए हैं। वसुंधरा राजे और ओम माथुर दोनों बीजेपी को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएंगे।

  4. वसुंधरा राजे के दिल्ली जाने से यह भी साबित हो गया है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अभी भी बड़े चेहरों की जरूरत है।

  5. वसुंधरा राजे की मौजूदगी में प्रदेश में बीजेपी नेताओं की दूसरी लाइन मजबूती से नहीं उभर पाई थी। ऐसे में अब वसुंधरा केंद्र में जाती हैं तो राजस्थान में भी नए नेताओं की संभावनाएं बनेंगी।

  6. वसुंधरा राजे के दिल्ली जाने से प्रदेश में बीजेपी का नेतृत्व मजबूत हो सकेगा। अभी तक वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री या नेता प्रतिपक्ष रहते प्रदेश अध्यक्ष का पद कमतर समझा जाता था, लेकिन अब प्रदेश अध्यक्ष के पद की गरिमा बहाल हो सकेगी।

  7. वसुंधरा समर्थकों के एक धड़े का मानना है कि अब तक नारा लगाते हुए पार्टी कार्यकर्ता कहते थे कि, ‘केसरिया में हरा-हरा, राजस्थान में वसुंधरा’, लेकिन अब यह नारा बदल जाएगा और इसमें “हिन्दुस्तान में वसुंधरा” जुड़ जाएगा।

  8. इस फ़ैसले ने 15 साल बाद एक बार फिर वसुंधरा राजे के लिए केन्द्रीय राजनीति का रास्ता खोल दिया है।

वसुंधरा राजे के जाने से राजस्थान में क्या होगा असर?

  1. वसुंधरा राजे के केंद्र में जाने से राजस्थान बीजेपी में बड़े चेहरे की कमी हो सकती है। अभी तक प्रदेश बीजेपी में वसुंधरा राजे भीड़ खींचने वाले एकमात्र चेहरे के रूप में पहचानी जाती थीं।

  2. दो बार मुख्यमंत्री और एक बार नेता प्रतिपक्ष रहते वसुंधरा राजे ने बीजेपी के विधायक दल को बांधे रखा। अब नए नेता प्रतिपक्ष के लिए विपक्ष को बांधे रखना भी चुनौती का काम होगा।

  3. वसुंधरा राजे के दिल्ली जाने के बाद अगर राजस्थान में उनका दखल रहा तो प्रदेश बीजेपी में आपसी प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की स्थिति बढ़ सकती है।

  4. वसुंधरा राजे के राष्ट्रीय संगठन में जाने से केंद्रीय नेतृत्व को भी कुछ हद तक चुनौती मिल सकती है।

  5. वसुंधरा राजे ने 15 साल में अपने समर्थकों और वसुंधरा फेन क्लब के रूप में एक बड़ी फैन फॉलोइंग तैयार की थी। अगर यह फेन फॉलोइंग और वसुंधरा के समर्थक बीजेपी से छिटकते हैं तो पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

  6. पार्टी से दूर हो चुके या हासिये पर चले/धकेल दिए गए हैं, उनके दिन फिरेंगे।

  7. पार्टी के पूर्व नेता और शिक्षा मंत्री रहे घनश्याम तिवाड़ी की बीजेपी में वापसी की संभावना बढ़ गई है। बीते पांच साल से तिवाड़ी वसुंधरा राजे के खिलाफ झंडा बुलंद करते रहे हैं।

  8. तिवाड़ी ने भले ही वसुंधरा राजे को लेकर भाजपा की तीखी आलोचना की हो, लेकिन उन्होंने कभी भी भाजपा आलाकमान, नरेंद्र मोदी, अमित शाह या आरएसएस को भला-बुरा नहीं कहा है।

  9. कभी वसुंधरा राजे के धुर विरोधी रहे राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा का कद भी बढ़ने की संभावना हो रही है।

  10. अब तक जो नई लीडरशिप केवल वसुंधरा राजे को रोल मॉडल मानकर बीजेपी का प्रचार प्रसार करते रहे हैं, तो ऐसे नेता केंद्रीय नेतृत्व के द्वारा तैयार किए जाने वाले नेता के मुताबिक तैयार होंगे।

  11. पार्टी की राजस्थान इकाई में 17 साल से चल रही ‘वसुंधरा ही बीजेपी और बीजेपी ही वसुंधरा’ की थ्योरी भी बदल जाएगी।