Jawahar lal Nehru
Jawahar lal Nehru (file photo from Google)

New Delhi News.

जैश ए मोहम्मद के आतंकी सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी (Global terrorist list) सूची में शामिल कराने के भारत के प्रयास को चीन ने वीटो करके संयुक्त राष्ट्र (UN) में धराशाई कर दिया।

इसके बाद भारत ने एक बार फिर से नई बहस छिड़ चुकी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर इसको कटाक्ष के तौर पर लिखा है, ‘यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मित्र शी जिनपिंग का तोहफा है।’ दूसरी तरफ बीजेपी भी इतिहास के पन्नों के साथ कांग्रेस के ऊपर हमलावर हो गई है।

दोनों तरफ से इतिहास की गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। केंद्र सरकार में मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा है कि चीन पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की वजह से यूनाइटेड नेशंस (UN) में स्थाई सदस्य है।

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इस मामले को लेकर इतिहास के पन्नों में देखा जाए तो 1955 की बात है, जब चीन को संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्य बनाने के लिए कवायद की गई थी।

बताया जाता है कि तब भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सभी प्रदेशों की सरकारों को एक चिट्ठी लिखकर इसका समर्थन किया था।

इतिहास की कुछ किताबों में इस बात का भी दावा किया जाता है कि यूनाइटेड नेशंस (UN) के द्वारा एशिया के एक देश को स्थाई सदस्य बनाने का प्रस्ताव दिया गया था, जिसमें भारत पहले स्थान पर था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू की ‘हिंदी चीनी भाई-भाई की नीति’ के चलते चाइना को वह स्थान मिल गया।

BJP नेता रविशंकर प्रसाद ने एक चिट्ठी का हवाला देते हुए कहा कि का जिक्र किया है। जिसमें लिखा था कि, ‘अनौपचारिक तौर पर अमेरिका (USA) ने सलाह दी है कि चीन को संयुक्त राष्ट्र (UN) में जगह दी जाएगी।’

‘भारत सुरक्षा परिषद में चीन की जगह लेगा हम निश्चित रूप से इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि इसका मतलब है चीन को अलग करना होगा, और यह एक महान देश के लिए बहुत अनुचित होगा कि चीन सुरक्षा परिषद (UN) में नहीं है।’

मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 9 जनवरी 2004 को प्रकाशित एक अंग्रेजी पुस्तक का हवाला दिया है, जो कि तत्कालीन कांग्रेसी नेता और संयुक्त राष्ट्र में अवर सचिव रहे शशि थरूर ने लिखी थी। ‘नेहरू द इन्वेंशन आफ इंडिया’ में लिखा है कि ‘साल 1953 के करीब भारत को यूएन की स्थाई सदस्यता देने की बात आई थी, लेकिन नेहरू ने ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।’

हालांकि, 27 दिसंबर 1955 को संसद सदस्य डॉ. जेएल पारेख के एक सवाल के जवाब में नेहरू ने संसद को बताया था कि ‘सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य बनने के लिए भारत के पास कोई प्रस्ताव नहीं आया है, जो भी संदिग्ध संदर्भ बताए जा रहे हैं, वे गलत हैं।’

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