भारत-चीन युद्ध में भारत को कम आंकना चीन की सबसे बड़ी भूल साबित होगी, देखिये आंकड़ों की जुबानी

नई दिल्ली।

क्या भारत और चीन की युद्ध की कगार पर हैं? क्या भारत को चीन के साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल और पाकिस्तान के साथ एलओसी पर दो मोर्चों पर युद्ध छेड़ना होगा? क्या भारत अभी भी उतना ही कमजोर देश है, जितना वर्ष 1962 के भारत चीन के युद्ध के दौरान था?

क्या चीन अपना शक्ति प्रदर्शन इसलिए कर रहा है, क्योंकि वह ऐसा महसूस करता है कि सैन्य रूप से भारत से कहीं बेहतर है या वह जानबूझकर आक्रामक हिंसा का जोखिम लेकर सीधे भयभीत कर रहा है।

ये वे प्रश्न है, जिनके गुणावगुण की चर्चा भारतीय जनमानस कर रहा है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक दलों और देशवासियों को आश्वस्त करना चाहेगी।

भारत किसी भी राज संभावित परिस्थिति के लिए तैयार है और वह अतिक्रमी को अपनी 1 इंच भी भूमि नहीं देगा और यह की रक्षा बलों को किसी भी प्रतिकूल स्थिति से निबटने के लिए खुली छूट दे दी गई है।

प्रधानमंत्री का कथन निसंदेह भारतीय रक्षा सेनाओं के प्रमुख अधिकारियों के देश की युद्ध तैयारियों के जमीनी स्तर के आकलन पर आधारित है।

वास्तविकता यह है कि सीमावर्ती सड़क विकास की बढ़ोतरी के बाद हाल के वर्षों में भारत बड़े परिश्रम से अपनी सीमाई इंफ्रास्ट्रक्चर और अपनी शक्ति को मजबूत कर रहा है और अपने दुश्मन को परास्त करने के लिए तैयार है।

अब यह स्पष्ट हो रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाता है तो भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यहां तक कि ताइवान जैसे सैन्य रूप से सशक्त देशों के खुले समर्थन पर भरोसा कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत को यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और अधिकांश यूरोपीय देशों का बिना शर्त समर्थन प्राप्त होगा, क्योंकि यह देश अपने यहां चाइना वायरस से आई अनचाही विपदा को लेकर गुस्से में हैं।

यह भी पढ़ें :  डोनाल्ड ट्रम्प पर ईरान ने रखा 8 करोड़ डॉलर का इनाम, काटकर सिर मंगवाया

क्षेत्र की एक अन्य दूसरी बड़ी ताकत रूस को चीन का मित्र माना जाता है, लेकिन वह निश्चित रूप से भारत का दुश्मन नहीं है, क्योंकि उसका भारत के साथ सामरिक रक्षा सहयोग है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि मोदी को अब अपने दावों के अनुरूप कार्रवाई करने की जरूरत है। एक बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं और अब तक भारत के पक्ष में किसी तरह का परिणाम ना आए।

वह अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। चीन के उकसावों की खिलाफत करने में दशकों तक कोई स्थर मानस नहीं बनाने के बाद देश ने ढोकलाम में यह जान लिया कि हम आक्रामक रूप से रखेंगे और रणनीति का उपयोग करेंगे।

परिणाम यह हुआ कि चीनी पीछे हट गए देशभर से अब ये आवाजें उठ रही है कि यही भारत का नया मंत्र होना चाहिए, अन्यथा चीनी हमेशा कितने यही कल्पना करते रहेंगे कि उनके देश की सीमा भारतीय क्षेत्र में आगे तक है।

रक्षा विश्लेषक खुलासा करते हैं कि चीनियों की प्रवृत्ति सुर्खियों में बने रहने की है। हिमालय के उच्च क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष सर्दियां कम होती हैं, तब उनकी सेना इसमें आती है और एलएसी के आसपास वहीं दम से बैठकर दावा करती है कि यह उनका क्षेत्र है।

उपरोक्त सभी वर्षों में उन्होंने वर्षों में उन्होंने एलएसी के अपने दावों पर मानचित्र का मुद्दा उठाने को काफी मनोयोग से डाला है, ताकि वे जब चाहें उन क्षेत्रों में अपनी सीमाओं को सेना बना सकें, जहां पहले किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं है रहा है। भारतीय विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं में चीन के इस बार किए करते इसके संभावित कारणों को लेकर काफी अटकलें हैं। इनमें से कुछ है, भारत अमेरिका से मेलजोल बढ़ रहा है।

यह भी पढ़ें :  Absolutely crystal & clear, इमरान खान के सपोर्ट में उतरे शाहीद अफरीदी

उसकी भारत की चेतावनी है कि चीन में कोरोनावायरस के उद्गम की स्वतंत्र जांच की मांग का डब्ल्यूएचओ में समर्थन ना करें, श्योक नदी से दौलत बाग ओल्डी से लगते भारतीय क्षेत्र में भारत के सड़क निर्मित करने से चीन नाराज हैं। गत 5 अगस्त 2019 को जम्मू एवं कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने और अक्साई चीन पर दावा करने भी चीन चिढ़ा हुआ है।

ये सभी सामरिक दृष्टिकोण अटकलें और अनुमान चीनियों की गहरी सामरिक सोच और उनकी रणनीति को मान्यता देते हैं, लेकिन क्या भारत को चीन की धमकियों के आगे झुकने की जरूरत है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि यदि दोनों देशों के बीच स्थिति गंभीर होती है तो वर्ष 1962 की नाकामयाबी के किसी स्तर को टालने के लिए भारत की चीन पर एक परंपरागत बढ़त है।

हार्वर्ड केनेडी स्कूल के वेलफेयर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स द्वारा प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में भारत और चीन की सामरिक क्षमताओं के तुलनात्मक आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इसमें ध्यान दिलाया गया है कि भारतीय संदर्भ में भारत की परंपरागत बढ़त को हमेशा कम आंका गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारा अनुमान है कि भारत की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण कमतर आंकी गई परंपरागत बढ़त है जो चीन की चुनौतियों को और हम लोगों के समक्ष उसकी कमजोरी को कम करती है। भारतीय चर्चाओं में जैसा माना जाता है उसके खिलाफ अपनी स्थिति के प्रति बेहतर आत्मविश्वास के कारण हैं, जो परमाणु पारदर्शिता और संयम के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में देश को नेतृत्व का अवसर देते हैं।

यह भी पढ़ें :  कल्याण सिंह फिर बनेंगे भाजपा के कद्दावर नेता

रिपोर्ट आगे पीएलए की परंपरागत क्षमताओं का गहराई से अध्ययन करते हुए कहती है कि उसकी भारत के थल सेना के साथ बराबरी बताना भ्रामक है। भारत के साथ युद्ध भी हो जाए तो उसकी थल सेना का महत्वपूर्ण भाग अनउपलब्ध होगा। इस भाग को या तो उसके लिए शिंजियांग और तिब्बत के ऊपर पार पाने के लिए भारतीय सीमा से दूर है।

रिपोर्ट कहती है कि सीमावर्ती क्षेत्र में पीएलए एयरफोर्स तथा आईएएफ में संख्यात्मक रूप से काफी समानता है। पीएलएएएफ की संख्या काफी कम है। भारत का सामना करने वाली चीन की जमीनों के संगठनात्मक विभाजन के विपरीत वेस्टर्न थिएटर कमांड के क्षेत्रीय प्रहार करने वाले सभी विमानों को अपने कब्जे में ले लिया है।

इनका एक भाग रूस के लिए आरक्षित है। दोनों वायु सेनाओं की तुलना करते हुए रिपोर्ट कहती है, तुलनात्मक रूप से इंडियन वेस्टर्न एयर कमांड चीन के खिलाफ करीब 101 लड़ाकू विमानों को काम में ले सकती है।

चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तुलना के अधिकृत आकलन का कहना है कि तकनीकी रूप से चीन के लड़ाकू विमानों की तुलना भारत की जा सकती है।

भारत का सुखोई-30 एमकेएल, जे-11, सुखोई-28 मॉडलों सहित चीन के सभी लड़ाकू विमानों की तुलना में बेहतर हैं। चीन के पास कुल मिलाकर करीब 101 चौथी पीढ़ी के के लड़ाकू विमान हैं, जिसका एक हिस्सा डिफेंस के लिए सुरक्षित रखना है, भारत के पास इसकी समकक्षता वाले 122 विमान हैं, जो सब के सब चीन के खिलाफ काम में ले जा सकते हैं।