नेपाल की संसद में सर्वसम्मति से पारित हुआ विवादास्पद नक्शा, पर क्या है वास्तविकता?

नई दिल्ली।

नेपाल की संसद ने देश के नए राजनीतिक नक्शे को अपडेट करने के लिए संविधान में संशोधन को लेकर शनिवार को सर्वसम्मति से मतदान किया।

संशोधन में दोनों परंपरागत निकट पड़ोसी देशों की सीमा रेखा से लगते सामरिक रूप से महत्वपूर्ण लिपुलेख, कालापानी और लिपियाधूरा क्षेत्रों पर दावा करते हुए 6 वर्ष पुरानी इस मोदी सरकार को एक गंभीर और निर्णय के झटका दिया है।

जो उस देश के साथ संबंधों को सुधारने के दावे के साथ सत्ता में आई थी, जिसके साथ भारत के ऐतिहासिक समृद्ध सांस्कृतिक और दीर्घकालिक पारिवारिक संबंध रहे हैं।

भारत -नेपाल संबंध संबंधों के लंबे समय के लिए विशेषज्ञ रहे लोगों को जिस बात ने चौंकाया है, वह यह है कि प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया है।

इसका स्पष्ट अर्थ है कि नेपाल के पूरे राजनीतिक तंत्र ने काठमांडू की वामपंथी सरकार को अपना समर्थन दिया है।

नेपाल ने घटनाक्रम एक तगड़ा झटका है, क्योंकि नई दिल्ली ने मूल्यवान समय खोया और इस मुद्दे पर काठमांडू के साथ द्विपक्षीय वार्ता के लिए कोई कदम नहीं उठाए।

नेपाल के नए विवादास्पद मानचित्र को सम्मानित करते हुए राष्ट्रीय प्रतीक को अपडेट करने के लिए संविधान की तीसरी अनुसूची में संशोधन को लेकर सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयक को समर्थन में नेपाली कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी सहित बड़ी विपक्षी पार्टियों को वोट दिया है।

गत 9 जून को नेपाल की संसद ने भारत के साथ सीमा विवाद के बीच नए राजनीतिक मानचित्र के समर्थन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर विचार करने के लिए प्रस्ताव को मंजूर किया गया था।

अब इस विधेयक को नेशनल असेंबली में भेजा जाएगा, जहां इसे ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरना होगा। सत्तारूढ़ नेपाल का पार्टी के पास नेशनल असेंबली में दो तिहाई बहुमत है।

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नेशनल एसेंबली सांसदों को इस विधेयक के प्रावधानों के विरुद्ध संशोधन यदि कोई है तो प्रस्तुत करने के लिए 72 घंटे का समय दे कर नेशनल असेंबली के विधेयक को पारित करने के बाद इसे प्रमाणित करने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा, उनकी मंजूरी के बाद इसे संविधान में शामिल कर लिया जाएगा।

भारत सरकार ने इन क्षेत्रों से संबंधित ऐतिहासिक तथ्य और साक्षी जुटाने के लिए बुधवार को विशेषज्ञों की एक 9 सदस्य टीम का गठन किया है।

कूटनीतिज्ञ और विशेषज्ञों ने यह पूछते हुए सरकार के इस कदम पर प्रश्न उठाए हैं कि जब मानचित्र को पहले ही जारी किया जा चुका है और वहां की कैबिनेट से मंजूरी दे चुकी है, तो टास्क फोर्स का गठन किया गया है।

नेपाल और भारत के संबंधों में खटास आ गई थी, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने धारचूला को लिपुलेख से जोड़ने वाली सामरिक रूप से महत्वपूर्ण एक 80 किलोमीटर लंबी सड़क का गत 8 मई को उद्घाटन किया।

नेपाल ने यह दावा करते हुए इस सड़क के उद्घाटन पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी कि सड़क को नेपाल के क्षेत्र से गुजारा गया है। भारत ने उसके इस दावे को निरस्त करते हुए जोर देकर कहा था कि सड़क पूर्ण रूप से उसकी सीमा के भीतर है।

नेपाल ने गत महादेश का संशोधित राजनीतिक एवं प्रशासनिक मानचित्र जारी करते हुए सामरिक रूप से अहम माने जाने वाले क्षेत्रों पर अपना दावा जताया था। भारत यह कहता रहा है कि ये 3 क्षेत्र उसके हैं।

काठमांडू के नए मानचित्र जारी करने के बाद भारत ने नेपाल को कठोरता पूर्वक कहा था कि वह क्षेत्रीय दलों के किसी भी कृत्रिम विस्तार पर उतारू ना हो।

गत माह सार्वजनिक किए गए मानचित्र में काली नदी के पूर्व में एक चमकीली भूमि को दर्शाया गया है, जो कि नेपाल के उत्तर पूर्वी मुहाने से बाहर की ओर है इस क्षेत्र में उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा तथा लिपियाधूरा, कालापानी भी शामिल हैं।

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यह काफी महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र हैं, जिनके भारत वर्ष 1962 के चीन युद्ध के बाद ही चौकी करता रहा है। नई दिल्ली का मानना है कि यह क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने गत माह का था, क्षेत्रीय दावों के इस प्रकार से करते विस्तार भारत को स्वीकार्य नहीं होंगे।

उन्होंने आगे जोड़ा था कि इस मामले पर भारत की स्थिति से नेपाल भलीभांति परिचित है और हम नेपाल की सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इस प्रकार के गैर निर्वाचित नक्शानवीसी अदाओं से बाज आएं और भारत को संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का आदर करें।

थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवाने ने गत 15 मई को कहा था कि उत्तराखंड में चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रा तथा नवनिर्मित भारतीय सड़क के विरुद्ध नेपाल की आपत्ति किसी और के इशारे पर है।

उनके बयान का व्यापक रूप से यह अर्थ लगाया जाता है कि नेपाल ऐसे वक्त में परोक्ष रूप से चीन के लिए काम कर रहा है।

जब लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) चीन की और भारतीय सेना के बीच तनाव रूप से बढ़ा हुआ है। जनरल ने आज कहा कि भारत-नेपाल के साथ मजबूत संबंध है।

हमारे भौगोलिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक जुड़ाव है। हमारे और वहां के लोगों के संपर्क काफी प्रबल हैं, उनके साथ हमारे संबंध हमेशा मजबूत रहे हैं और भविष्य में भी मजबूत रहेंगे।

थल सेना प्रमुख को ऐसे शब्द बोलने चाहिए थे जो उन्होंने 15 मई को बोले और इन शब्दों ने नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी को सभी विपक्षी दलों को भारत के खिलाफ लामबंद करने का मौका दिया। यह एक प्रश्न है, जिसे आज पूछने की जरूरत है।

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प्राय सशस्त्र सेनाओं से अपनी बारी के बिना बोलने की उम्मीद नहीं की जाती, तब ही बोलती है, जब सत्तारूढ़ सरकार उन्हें कुछ बोलने के लिए कहती है। क्या जनरल ने भारत सरकार की मंजूरी के बिना अपनी तरफ से बोले।

जनरल ने की टिप्पणी के बावजूद नई दिल्ली को काफी पहले से पता था कि काठमांडू में वर्तमान में स्वतंत्र रूप से काम करने वाली एक मुख्य सरकार सत्ता में है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के अपने दौरे में उनके साथ धार्मिक संबंधों पर जोर देकर हिंदू कार्ड खेल में स्पष्ट रूप से काम नहीं आया।

वामपंथी प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मोदी के हिंदू संबंधों पर जोर देने को शुरुआत में बड़ी चतुराई से स्वीकार किया था, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से ऐसा नहीं किया, बल्कि एक युक्ति के तहत ऐसा किया था।

नेपाल के प्रधानमंत्री ने व्यावहारिक कारणों से ऐसा किया था, क्योंकि विपक्ष यह संबंध दोनों देशों की जनता के रोजमर्रा के जीवन से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन जब मौका मिलते ही उन्होंने प्रहार कर मोदी सरकार को असमंजस में डाल दिया है।

निसंदेह भारत और नेपाल संबंधों में वर्ष 2015 से 2019 के बीच आमूलचूल परिवर्तन आया है। खासतौर से वर्ष 2015 के दीर्घ इकोनामिक ब्लॉकेड के बाद जिस दौरान नेपाल संबंधों में बदलाव हुए।

क्योंकि काठमांडू के मधेशी आंदोलन और उग्र के लिए नई दिल्ली को जिम्मेदार ठहराया और वर्ष 2015 के बाद से चीन के साथ संबंध सुधारने में भारी निवेश किया। वर्ष 2016 में सरकार ने इनके साथ एक संरचनात्मक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जो नई दिल्ली के लिए एक संदेश था।