प्लाज्मा एंटीबॉडी भी कोरोनावायरस को मारने में कामयाब नहीं होगी, क्या कारण है जो डब्ल्यूएचओ ने विश्व को चेताया है?

रामगोपाल जाट

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वैश्विक महामारी कोविड-19, यानी कोरोनावायरस से निजात पाने के लिए अपनाई जा रही प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी को लेकर संदेह जताया है।

डब्ल्यूएचओ ने विश्व के उन सभी देशों को चेतावनी दी है जो प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी के लिए काम कर रहे हैं डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी हमेशा के लिए कोरोनावायरस का उपचार नहीं हो सकती है। इसलिए इसके ऊपर निर्भर रहना समझदारी नहीं है।

दरअसल, भारत समेत अनेक देशों ने प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी पर कार्य शुरू किया है इसको लेकर कहा जा रहा है कि कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को इसके लिए तैयार किया जा सकता है किंतु असलियत कुछ और है।

भारत के करीब आधा दर्जन राज्य प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी पर काम शुरू कर चुके हैं। लगातार बढ़ते मरीजों की संख्या को देखते हुए सरकारों के पास प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी सबसे कारगर उपाय नजर आ रहा है।

क्या है प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी

दरअसल प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी प्रोटीन से बनी कोशिकाएं होती है, जिसको बी लिंफोसाइट कहते हैं। मानव बॉडी में बाहर से होने वाले बैक्टीरिया या वायरस के आक्रमण के बाद एंटी प्लाजमा थेरेपी के तहत एंटीबॉडी जो कोशिकाएं होती है, वो बैक्टीरिया पर आक्रमण कर देती है और इससे मानव के शरीर में संभावित रोग शुरू होने से पहले खत्म हो जाता है।

प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी हर मानव के शरीर में प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध है

डॉक्टरों का कहना है कि प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी केवल एक प्रति माध्यम है, बल्कि प्रत्येक मानव के भीतर शरीर में प्राथमिक तौर पर एंटीबायोटिक्स उपलब्ध होती है। यह एंटीबायोटिक्स हर रोज असीमित वायरस को खत्म करती है और मनुष्य को संक्रमित होने से बचाती है।

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लेकिन प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी कृतिम होने के कारण स्थाई नहीं होगी

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोरोनावायरस से लड़ने के लिए भले ही वर्तमान में प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी तैयार की जा रही हो, लेकिन यह स्थाई इलाज नहीं है। क्योंकि प्लाज्मा एंटीबॉडी थेरेपी कृतिम होने के कारण प्राकृतिक तौर पर हमेशा मानव शरीर में उपलब्ध नहीं रहेगी और कमजोर होती जाएगी, जिसके कारण कोरोनावायरस जैसे संक्रामक वायरस से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाएगी।

भारत के लोगों में होती है ज्यादा एंटीबायोटिक्स

डॉक्टरों का मानना है कि अमेरिका समेत यूरोप के सभी कंट्रीज में संक्रामक रोग एक से लेकर दो दशक बाद कभी-कभी आक्रमण करते हैं। जिसके कारण यहां रहने वाले निवासियों के शरीर में प्राकृतिक एंटीबायोटिक कमी होती है, जबकि भारत जैसे देश में प्रतिवर्ष दर्जनों की संख्या में संक्रामक रोग होते हैं।

इसके चलते मानव बॉडी खुद ही एंटीबायोटिक तैयार कर लेती है। यही कारण है कि कोविड-19 को लेकर भी भारत में प्रभाव काफी कम है, जबकि विकसित और सुविधाओं से लैस होने के बावजूद अमेरिका, स्पेन, जर्मनी, इटली जैसे राष्ट्र कोरोनावायरस के घातक परिणाम को देख रहे हैं।