नीतीश कुमार ना घर के ना घाट के

नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू ख़ुद कि कोई विचारधारा नही है.सिर्फ़ सत्ता का सुख भोगना चाहे थूक कर चाटना ही क्यों ना पड़ जाये.

वैसे मैंने जिस बिहार को देखा है उसमें ना सही से बिज़ली रहती थी ना अच्छी सड़कें थीं और बहुत सी मूलभुत सुविधाएं लेक़िन आज कह सकता हूँ कि बिहार में पिछले 10 या 12 वर्षों में बहुत कुछ बदला है.इसका गवाह मैं ख़ुद हूँ.इसका श्रेय नीतीश कुमार को जाता है और जाना भी चाहिये.

नीतीश कुमार ने ही बिहार में बीजेपी को छोटी पार्टी से बड़ी पार्टी तक बना दिया.लेक़िन अब नीतीश कुमार ख़ुद में महसूस कर रहें होंगे अग़र बीजेपी के साथ वो ज़्यादा दिन तक रही तो उनकी पार्टी के वजूद को ख़तरा होगा.
2015 में विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद बिहार के उनको प्रधानमंत्री कि तरह देखने लगे थे बहुत हद तक मुमकिन था कि अगर वो महागठबंधन में बने रहते तो वो प्रधानमंत्री के संभावित उम्मीदवार होते और देश को बिहार से पहला प्रधानमंत्री मिलता.

लेक़िन उन्होंने अपने पैर में ख़ुद कुल्हाड़ी मार ली.वैसे बीजेपी का इतिहास भी रहा है जहाँ जहाँ वो क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन किया और सरकार बनाई कुछ सालों के बाद वो क्षेत्रीय पार्टी का वजूद ख़त्म होने लगता है.
ग़ोवा एक उदहारण हैं वहाँ बीजेपी महाराष्ट्रवादी गौ माताक पार्टी जिसका ग़ोवा कि आज़ादी में बहुत बड़ा योगदान हैं बीजेपी वहाँ उनके पीठ पर बैठ कर गठबंधन में सरकार चलाती थी लेक़िन आज बीजेपी सत्ता में है वो पार्टी सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गयी हैं.

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फ़िलहाल अग़र बिहार के मौजूदा सियासत को देखें तो आज अग़र चुनाव हुआ तो कल तेजश्वी यादव मुख्यमंत्री बन जाये.पिछले 15 सालों में पहली बार हुआ है कि नीतीश को सीधी चुनौती मिल रही है.वैसे तेजस्वी को परिवक्व करना का श्रेय नीतीश कुमार ही जायेगा क्योंकि उन्होंने बिहार को नया विकल्प दे दिया है.और बहुत हद तक बिहार कि जनता ने इसे स्वकार भी करना शुरू कर दिया है.

क्योंकि जिस तरह से नीतीश कुमार महागठबंधन को तोड़ कर बीजेपी के साथ सरकार बना ली उससे बिहार के अवाम में गुस्सा है.किसी को यक़ीन नही था के नीतीश कुमार इस बार ऐसा करेंगे 2015 के चुनाव में जिस तरह से मोदी और नीतीश के बीच ज़ुबानी जंग चल रही थी डीएनए से लेकर बिहारी अस्मिता और मर जायेंगे लेक़िन बीजेपी से समझौता नही करेंगे.

उसके बाद से किसी को नही लगा था कि नीतीश कुमार ऐसा करेंगे.नीतीश जब पहले बीजेपी के साथ थे तब उनको मुस्लिम वोट बहुत बड़ी संख्या में मिलता था लेक़िन इस बार शायद ऐसा ना हो क्योंकि बिहार के लोग कहीं ना कहीं ख़ुद को ठगा महसूस कर रहें हैं.

लेक़िन नीतीश कुमार के शाख़ कि लड़ाई अब शुरू होगी 2019 लोकसभा में चुनाव में क्योंकि 2014 में मोदी लहर में वो उड़ गये थे 40 में सिर्फ़ 2 सीट मिली थी.लेक़िन इसबार मामला बिल्कुल अलग़ है महागठबंधन vs बीजेपी जदयू ये चुनाव नीतीश कुमार का भविष्य भी तय करेगा.

एक तरफ़ कांग्रेस,राजद,हम,रालोसपा,और शरद यादव कि लोकतांत्रिक जनता दल शामिल है और दूसरी तरफ़ बीजेपी,जदयू,लोजपा शामिल है.फ़िलहाल राजनीती के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर जो जदयू के उपाधयक्ष हैं उनका पिछले दिनों कहना था 2014 वाली मोदी के लिये हवा बनाना मुश्किल है इसमें कोई शक़ नही 2014 में बीजेपी हवा बना कर जीती थी.

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उसमे प्रशांत किशोर का बहुत बड़ा योगदान था.अब वो जदयू में है देखना होगा 2015 विधानसभा चुनाव की तरह वो जदयू या नीतीश के लिये किया कर पाते हैं लेकिन एक बात तय है नीतीश का उत्तराधिकारी प्रशांत किशोर के रूप में ज़रूर मिल गया है.

Zeeshan Naiyer
Student -Mass Communication & Journalism
Maulana Azad National Urdu University Hyderabad