गृह मंत्री अमित शाह को हटाने की आवाज उठने लगी है भाजपा में!

नई दिल्ली।

दिल्ली चुनाव से पहले चुनाव प्रचार के आखिरी दिन गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्वोत्तर दिल्ली के सीमापुरी क्षेत्र में एक रोड शो किया था, जिसमें उन्होंने एक भविष्यवाणी की थी जो पूरी तरह गलत साबित होगी उन्होंने कहा था जो लोग भाजपा का विरोध कर रहे हैं, उन्हें 8 फरवरी को एक धक्का लगने वाला है, क्योंकि जब आप कमल के चुनाव चिन्ह वाला बटन दबाएंगे, उसका करंट उन्हें खत्म कर देगा।

जब 11 फरवरी को मतगणना हुई तो धक्का भाजपा को लगा केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को चमत्कारिक रूप से 70 में से 62 सीटें मिली, तथा भाजपा के हिस्से में सिर्फ 8 सीटें आईं। केंद्रीय गृहमंत्री का मतदाताओं को दिया गया यह निंदनीय उपदेश, कि बटन तो इतनी जोर से दबाना कि उसका करंट शाहीन बाग तक महसूस हो, दिल्ली के लोगों को प्रभावित करने में सफल रहा।

भाजपा की लज्जाजनक पराजय को गृहमंत्री अमित शाह के लिए एक जबरदस्त धक्का माना गया। चुनाव के चाणक्य होने का दावा ध्वस्त हो गया। मोदी सरकार के दूसरे सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में उनकी प्रतिष्ठा संकट में आ गई थी।

इसके 15 दिन बाद ही दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों के बाद उनका रूप और छोटा हो गया। जब राजधानी में फंसी हुई थी, उस समय अपेक्षा थी कि वे हिंसा के खिलाफ चलाए जाने वाले अभियान में सबसे आगे होंगे, इसके बजाय उन्हें पीछे धकेल दिया गया।

इसकी परिकल्पना तथा अनुमान को भी बल मिलता है कि दिल्ली पुलिस, जो पूरी तरह से केंद्र को यह निर्देश है कि कोई कार्रवाई नहीं की जाए, इसी का परिणाम है कि सभी राजनीतिक दलों की ओर से सोनिया गांधी से लेकर ममता बनर्जी तथा सुप्रिया सुले तथा अन्य नेताओं तक सभी की ओर से शाह के इस्तीफे की मांग की आवाज आ रही है।

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यह भी बहुत महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने शहर के दंगा पीड़ित क्षेत्रों का दौरा करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को कहा, देश के गृह मंत्री को नहीं। भाजपा के अंदर भी भरोसे के संभावित क्षरण की आहट सुनाई दे रही है।

राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में आयोजित औपचारिक समारोह के दौरान जब अमेरिकन राष्ट्रपति गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण कर रहे थे, उस समय मोदी केबिनेट के सभी वरिष्ठ मंत्री वहां मौजूद थे, शाह वहां नहीं थे।

कारण यही नहीं यही था कि दिल्ली की सड़कों की स्थिति बहुत ज्यादा संगीन थी, तथा उस समय केंद्रीय मंत्री का पूरा ध्यान रहना बहुत जरूरी था, फिर भी ट्रंप के आगमन की महत्ता को ध्यान में रखते हुए उनकी गैरमौजूदगी सबका ध्यान आकर्षित कर रही थी।

कुछ पर्यवेक्षकों ने हालांकि ट्रंप यात्रा के दिन के पहले मोटेरा स्टेडियम में देखा कि देश के दूसरे नंबर के सर्वाधिक ताकतवर व्यक्ति की थी। जब सभी मंत्रियों का परिचय करवाया जा रहा था, सिर्फ तभी अमित शाह को ट्रंप से हाथ मिलाने का अवसर मिला।

इसके अलावा दिल्ली की स्थिति से भी प्रभावशाली तरीके से निपटने के कारण भी अमित शाह की छवि खराब हो रही है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि उनकी ताकत कम हो गई है।

हालांकि, इस निर्णय पर पहुंचा अभी जल्दी होगा, पर संकट से निपटने की उनकी क्षमता पर सवाल पूछे जा सकते हैं। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि तथा गुजरात के बाहर मंत्रालयिक अनुभव नहीं मद्देनजर ऐसे सवाल होने के अकारण नहीं है।

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ऐसा इसलिए भी है कि दिल्ली के चुनाव अभियान में अमित शाह के भाषण भड़काऊ थे और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी की गरिमा के अनुकूल नहीं। मंत्री के रूप में कानून विरोधी आंदोलन की हिचक रहे थे।

उन्होंने न तो सीएए विरोध वालों से वार्ता शुरू की और न ही क्षेत्र को बलपूर्वक खाली करवाने का प्रयास किया। अगर दिल्ली में भाजपा चुनाव जीत गई होती, तो उसका काम आसान हो जाता, पर जब हार के बाद उसके पास अपनी साख बचाते हुए मामला सुलझाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

दिल्ली में आगजनी और हिंसा शुरू होने के बाद जो कुछ अहमदाबाद में 2002 में हुआ था, उससे एकदम अलग स्थिति है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की निगरानी और नागरिकों के बीच संवाद के कारण यह एक-दिन से ज्यादा लंबी अवधि तक उपद्रव होना संभव नहीं था।

इसकी वजह से पुलिस पर मूक दर्शक बने रहने की बजाय कार्रवाई करने का भारी दबाव आ गया। इसी बीच बिहार विधानसभा ने सर्वसम्मति से एनआरसी लागू नहीं करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। यहां तक कि उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के नेतृत्व में भाजपा विधायक भी इसमें शामिल होने को सहमत हो गए।

राजनीतिक रूप से यह अमित शाह की स्थिति उनकी अपनी पार्टी में, उनके लिए करारा झटका है। हालांकि, पिछले 38 साल से अमित शाह नरेंद्र मोदी के सबसे करीबी व्यक्ति हैं।