एक किसान का बेटा शहीद हो गया, दूसरे किसान के बेटे ने पिस्टल की परवाह किए बगैर सीना तान दिया….किसान कौम के बहादुरों से भरी है इतिहास की कहानियां

कायर आतंकवादी मोहम्मद शाहरुख से लाठी के द्वारा पिस्टल का मुकाबला करते जांबाज दीपकर दहिया
कायर आतंकवादी मोहम्मद शाहरुख से लाठी के द्वारा पिस्टल का मुकाबला करते जांबाज दीपकर दहिया

नई दिल्ली।
किसान के बेटे आज सीमा पर और सीमा के भीतर बैठे गद्दारों से निपटने में सबसे आगे हैं। दिल्ली में दंगों के दौरान दो किसान पुत्र फिर से मिसाल बन गए। एक ने गोली खाकर बलिदान दे दिया, और दूसरे ने पिस्टल सीने पर तनी होने के बाद पीछे नहीं हटकर जांबाजी का परिचय दे दिया।

सीकर के एक किसान का बेटा हेड कॉन्सटेबल रतनलाल दंगाइयों से लोगों की जान बचाते हुए आतंकवादियों द्वारा की गई फाइरिंग की गोली से शहीद हो गया। रतनलाल की पार्थिव देह का बुधवार को सीकर में उनके पैतृक गांव में अंतिम संस्कार किया गया है।

भाजपा ने शहीद को एक करोड़ रुपए देने का ऐलान किया है, जबकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उसको शहीद का दर्जा देने की घोषणा की है। राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष सतीश पूनियां के प्रयास से यह सब संभव हो सका है।

दूसरे किसान का बेटा दीपक दहिया, जो कि हाल ही में हेड कॉन्सटेबल बने हैं और हरियाणा के सोनीपत जिले के रहने वाले हैं। दीपक ने अपनी जांबाजी का परिचय देकर मिसाल कायम की है। दीपक न केवल आतंकियों के सामने अड़ गए, बल्कि सीने पर पिस्टल तनी होने के बाद भी एक कदम पीछे नहीं हटाया।

दीपक का कहना है कि उनको खुद की जान से ज्यादा लोगों की जान प्यारी है, जो उनको ड्यूटी के दौरान सिखाई जाती है। दीपक ने यह भी कहा कि यदि वो पीछे हटा जाते तो आतंकवादी मोहम्मद शाहरुख उनके पीछे खड़े लोगों को मार सकता था, इसलिए वो सामने सीना तानकर अड़ गए।

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यह कहानी तो हाल ही में हुए दंगों के दौरान सामने आई है। इससे पहले सीमापार से होने वाले आतंकवाद और सीमा के भीतर बैठे गद्दारों से निपटने में भी किसानों के बेटों ने खूब कुर्बानियां दी हैं। इतिहास भी इसका गवाह है कि रक्षक और पालनहार के तौर पर किसान के बेटों से बढ़कर कोई नहीं है।

जब राजा महाराजाओं का समय था, तब भी किसानों के बेटे हमेशा आगे रहते थे, आज भी सबसे आगे हैं, किंतु इतिहास लिखने वाले दोमुंहे लोगों ने हमेशा इस कौम के साथ अन्याय किया है। भगत सिंह के देश के लिए किए गए महान बलिदान को चार पंक्तियों में समेटने वाले इतिहासकार गांधी को महात्मा लिखते हैं।