फौजदारी मामलों की चुनाव शपथ पत्र में जानकारी न देने का क्या दंड होगा?

-सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस द्वारा यह जानकारी छुपानी के मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रखा

नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1 अक्टूबर 2019 के फैसले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125 ए के तहत फडनवीस को आपराधिक कृत्य के लिए अभीयोजित करने का आदेश दिया था।

यह आदेश फडनवीस द्वारा उनके विरुद्ध 1996 और 1998 में कथित धोखाधड़ी एवं जालसाजी के लिए दर्ज मुकदमे का विवरण अपने 2014 के चुनाव के शपथ पत्र में नहीं देने के कारण दिया गया था।

वर्तमान याचिका में फडनवीस ने कोर्ट से अपने इस आदेश पर पुनर्विचार करने का आवेदन किया है।

मुंबई हाई कोर्ट ने यह मानते हुए कि अधिनियम के अंतर्गत कथित अपराध के लिए मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं है।

फडनवीस को क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 2014 से इस मामले के पीछे लगे हुए वकील सतीश उकी की इस याचिका पर दिए उक्त फैसले को पलट दिया और नागपुर के एक ट्रायल कोर्ट को मुकदमा चलाने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट 24 जनवरी को पुनर्विचार याचिका सुनने के लिए सहमत हो गया था। वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली एक पीठ को बताया कि कानून में केवल आरोप तय होना या दोष सिद्ध होने पर भी आपराधिक मुकदमों की जानकारी उजागर करने का प्रावधान है। किंतु उनके मुवक्किल फडनवीस के मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

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उन्होंने कहा कि 2014 का निर्णय न केवल उनके मुवक्किल फडणवीस को किस्मत का फैसला कर देगा बल्कि कोर्ट द्वारा अपने 2019 के फैसले का पुनर्परीक्षण नहीं करने की दशा में चुनाव लड़ने वाले अन्य प्रत्याशियों के लिए इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

जस्टिसेज दीपक गुप्ता व अनिरुद्ध बॉस इस बेंच के अन्य जज थे। वे उस पीठ से भी थे जिसने नागपुर के प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा फडनवीस के खिलाफ दिए गए आदेश को रद्द करने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया था।

रोहतगी ने कहा कि फिर भी फडनवीस के विरुद्ध आरोप ऐसे मामले से संबंधित हैं जहां केवल संज्ञान लिया गया है और आर.पी.एस को धारा 35 ए के अनुसार इसे शपथ पत्र में प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद के तहत अपने मुवक्किल के अधिकारों का उल्लेख करते हुए कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया।

उन्होंने कहा कि फडनवीस ने अपने नामांकन दस्तावेजों में अन्य कोई सूचना नहीं छुपाई है। उन्होंने अनुरोध किया कि लेकिन मामलों को उजागर न करने के लिए अन्य कोई पेनल्टी हो सकती है किंतु आर.पी.ए के तहत अभियोजन नहीं हो सकता गत वर्ष अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने “बेहिच” माना था कि चुनावी शपथ पत्र में उनके विरुद्ध दो लंबित मामलों को छुपाने के लिए फडनवीस के अभियोजन के लिए मामला सिद्ध कर दिया गया है।

आर.पी.ए. को धारा 33 (1) तथा (2) के अनुसार उनके लिए ऐसे किसी भी लंबित आपराधिक मुकदमों को जानकारी प्रकट करना आवश्यक है। जिसमें 2 साल या अधिक कारावास की सजा हो।

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उनका दावा यह है कि फडनवीस ने इन दो धाराओं के तहत आवश्यक जानकारी प्रकट नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले के बाद मामला ट्रायल कोर्ट को उसी जगह से सुनवाई करने के लिए भेज दिया गया था जहां पर इसे रोका गया था।